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जून 25, 2011

उपभोक्तावाद को ललकारती कविता का शंखनाद

इससे पहले कि
उपभोक्तावाद
तुम्हे
बहरा
गूंगा
और
अन्धा कर दे
और तुम कुछ
सुन
बोल
और
देख न सको
मैं कर रहा हूँ
उपभोक्तावाद को
ललकारती कविता का
शंखनाद—–
ताकि
इसकी ध्वनि
तुम्हारे
अंतर्मन के
अंतरिक्ष में
हमेशा
गूंजती रहे
और
तुम
एक निर्जीव वस्तु की तरह
एक कोने में पड़े हुए
उपभोक्तावाद के
इस खूंखार तांडव को
चुपचाप
देखते न रह जाओ
इसलिए यह
छटपटाते हुए भी
तुम्हे हमेशा
यह जिन्दा अहसास
करवाती रहे कि
तुम वस्तु के लिए नहीं
वस्तु तुम्हारे लिए है
और
यह अहसास भी कि
तुम अकेले नहीं
मैं सत्य की
ऊँची पताका लिए
इस युद्ध में
तुम्हारे साथ
हमेशा खड़ा हूँ !

© अश्विनी रमेश

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