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फ़रवरी 28, 2012

लिखती होगी नाम मेरा वो

जिन यादों को नींद न आये

उन्हें सुलाना बहुत कठिन है

दिल कि दुनिया जिन्हें बसाए

उन्हें भुलाना बहुत कठिन है|

लिखती होगी नाम मेरा वो

आज भी अपने तकिये पर

यह तो केवल सुई ही जाने

चली वो कितना बखिए  पर |

दोनों की इस व्यथा कथा को

आज सुनाना बहुत कठिन है|

बहुत ज़मीनी दूरी है पर

रहती है वो पास ही मेरे

उसकी यादों में गुजरे जों

वे पल  हैं सब खास ही मेरे|

क्यों मैं उसकी कसमें खाऊं

जिसे बुलाना बहुत कठिन है |

सच कहता हूँ तुमसे यारों

मेरी तरह ही जीती होगी

मेरे बिना ज़िंदगी को वह

ज़हर समझकर पीती होगी|

उसका नाम बता देता पर

सच झुठलाना बहुत कठिन है|

{कृष्ण बिहारी}

 

अक्टूबर 8, 2011

मेहँदी रची उंगलियां

गुज़री रात
गहरी नींद में
सोया देख कर
सवेरे
बिस्तर बोला-
उसको भूल गए क्या?

कोई कैसे बताये
कमीज़ के एक टूटे बटन ने
कितने अफ़साने
याद दिलाए हैं,
इस वक्त भी
धुंधला गयी आँखें
सुंई में डोरा पिरोती
देख रही हैं
वही
मेहँदी रची उंगलियां

(रफत आलम)

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