Posts tagged ‘Sulagta’

फ़रवरी 2, 2014

खूबसूरत रात…

कल रात बहुत खूबसूरत थीakhiri-001

आँखों में गुजरी

फिर भी  बहुत छोटी थी

कल रात

मेरा चाँद मेरी बाँहों में पिघला था

सुलगते बदन में

कैसे कोई कैसे रह सकता है?

सर्द चांदनी की अगन तब से तारी है हम पे

ये रात इतनी कम क्यों थी?

Rajnish sign

जनवरी 5, 2014

आतप्त कर छोड़ जाती हो…

बहुत आतप्त कर जाती हो तुमsilentlove-001

मुस्कान तुम्हारी हौले से छू जाती है

मन के तार झंकृत कर के जैसे

मौसमी बयार पत्तों की वीणा बजाये

और चली जाए उन्हें कम्पित छोड़ के

ऐसे ही चली जाती हो तुम

मुझे हर सिरे से बजता छोड़ के

सुलगता और तपता छोड़ के…

कितने प्रश्न तुम तक मुड़ते हैं

कितने स्वप्न तुमसे जुड़ते हैं

हर प्रश्न के…

हर स्वप्न के

अंतिम सिरे…

नहीं नहीं पहले सिरे पे तुम

मध्य तक आते आते…

नेह-दग्ध छोड़ जाती हो तुम

बहुत आतप्त करके मुझे छोड़ जाती हो तुम

कभी जब इंच भर दूर रहता है मधु-कोष मुझसे

मेरे दरकते हुए होंठ जब छूने को होते हैं

हर बार वापिस फेर देती हो क्यूँ?

मुझे यूँ छोड़ देती हो क्यूँ?

Rajnish sign

नवम्बर 11, 2013

बाहों के घेरे में बचूँगा क्या?

रख दो अपने आरक्त लबों कोtitan-001

मेरे चिर प्यासे लबों पे

सुलगते जिस्म को पिघला दो

समेट के अपनी बाँहों में

बरस जाओ मेरे तन मन पे

जैसे

कोई आवारा बादल बरस जाता है

युगों से तपते सहरा पे

बदल दो इसे एक छोटे हरे टुकड़े में

न रहने दो खुद को ‘खुद’,

न मुझे ‘मैं’ रहने दो

शायद तुझ में मिल के

मुझे ‘मैं ‘ मिल जाऊं…

सोचता हूँ कि मैं रहूँगा क्या

जब तेरी बाहें मेरे गिर्द होंगीं…

(रजनीश)

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