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अगस्त 26, 2015

स्वेच्छा-मृत्यु का अधिकार हो, आत्महत्या का नहीं, : ओशो

oshoमेरा एक और सुझाव है:

स्वेच्छा-मरण, युथनेसिया

जिस प्रकार हम जन्म को नियंत्रित कर रहे हैं संतति निरोध के द्वारा, मैं तुम्हें एक और शब्द देता हूं: मृत्यु-निरोध, डेथ-कंट्रोल। लेकिन कोई भी देश मृत्यु निरोध के लिए तैयार नहीं है। एक विशिष्ट उम्र के बाद जब कोई व्यक्ति अपना जीवन भरपूर जी चुका हो, उसकी कोई जिम्मेवारी न हो और अब वह मरना चाहता हो…एक तरह से वह अपने आप पर एक बोझ ही है, फिर भी उसे मजबूरन जीना पड़ता है क्योंकि कानून आत्महत्या के खिलाफ है।

मेरा सुझाव है, यदि तुम मरने की औसतन आयु सत्तर या अस्सी या नब्बे साल मानते हो तो आदमी को चिकित्सा समिति से यह पूछने की स्वतंत्रता होनी चाहिए: “मुझे अपने शरीर से मुक्त होना है।” यदि वह और जीना नहीं चाहता क्योंकि उसने काफी जी लिया है, तो ऐसा करने का उसे पूरा हक है। जो भी करना था वह सब उसने कर लिया। और अब उसे कैंसर या टी.बी. से नहीं मरना है, उसे बस विश्रामपूर्ण ढंग से मरना है।

प्रत्येक अस्पताल में एक विशेष स्थान हो, उसका खास कर्मचारी वर्ग हो, जहां लोग आ सकते है और तनाव-रहित होकर, सुंदरता से, बिना किसी रोग के, चिकित्सा व्यवसाय के सहारे मृत्यु में लीन हो सकते हैं।

यदि चिकित्सा समिति सोचती है कि वह व्यक्ति कीमती है या वह अत्यंत महत्वपूर्ण है, तब फिर उससे और कुछ समय तक जीने का अनुरोध किया जा सकता है। केवल थोड़े से लोगों से ही यहां कुछ देर अधिक रहने की प्रार्थना की जा सकती है क्योंकि उनसे मानवता को इतनी मदद मिल सकती है, अन्य लोगों की इतनी सहायता हो सकती है। लेकिन वे लोग भी यदि जीने से इनकार कर दें तो वह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। तुम उनसे पूछ सकते हो, प्रार्थना कर सकते हो। और यदि वे स्वीकार करते हैं तो ठीक है,लेकिन अगर वे कहें, “नहीं, अब हमें और नहीं जीना है”, तो निश्चित ही उन्हें मरने का पूरा अधिकार है।

किसी बच्चे की जान बचाना समझ में आता है, लेकिन तुम वृद्ध लोगों को क्यों बचा रहे हो जो जी चुके हैं, काफी जी चुके हैं, दुख भोगा, सुख भोगा, सब तरह के अच्छे-बुरे काम किए? अब समय आ गया है-उनको जाने दो।

लेकिन डाक्टर उन्हें नहीं जाने देते क्योंकि वह अवैध है।

उनका आक्सीजन और अन्य जीवनदायी उपकरण वे लोग निकाल नहीं सकते। इसलिए तुम मरणासन्न या अधमरे लोगों की जान बचाए चले जाते हो।

कोई पोप आदेश जारी नहीं करता कि इन लोगों को शरीर से मुक्त होने की अनुमति दी जाए। और उनके शरीरों में बचा ही क्या है? किसी के पैर कटे हैं, किसी के हाथ कटे हैं, किसी का हृदय काम नहीं कर रहा है इसलिए उसकी जगह बैटरी काम कर रही है, किसी के गुरदे काम नहीं कर रहे हैं इसलिए उनके लिए यंत्र लगे हैं। लेकिन इन लोगों का मकसद क्या है? अगर तुम उन्हें इस ढंग से बनाए रखोगे तो भी वे क्या करने वाले हैं?

हां, ज्यादा से ज्यादा वे कुछ लोगों को काम दिलाते हैं, बस। लेकिन वे कौन सा रचनात्मक जीवन जीने वाले हैं? और उनके साथ जो किया जा रहा है उससे उन्हें क्या सुख मिलने वाला है? उन्हें निरंतर इंजेक्शन दिए जा रहे हैं। उन्हें नींद नहीं आती इसलिए नींद की गोलियां दी जा रही हैं। वे जाग नहीं सकते इसलिए उनके खून में एक्टिवेटर (उत्तेजक)दिए जा रहे हैं ताकि वे जाग जाएं। लेकिन किसलिए? उस पाखंडी शपथ के लिए? पाखंडी भाड़ में जाएं। उसे कुछ खयाल नहीं था कि उसकी शपथ क्या गजब ढाने वाली है।

दवाइयों की बजाय, उस मरते हुए आदमी को ध्यान सिखाने के लिए ध्यानी चाहिए क्योंकि अब दवा की नहीं, ध्यान की जरूरत है-कैसे शिथिल हो जाए और शरीर से विदा हो जाए।

प्रत्येक अस्पताल में ध्यानी होने चाहिए, वे अत्यंत आवश्यक हैं-उतने ही जितने कि डाक्टर।

अब तक ध्यानियों की जरूरत नहीं थी क्योंकि एक ही काम था: जान बचाना। अब काम दोहरा हो गया है: लोगों की मरने में सहायता करना। हर विश्वविद्यालय में एक विभाग हो जहां ध्यान सिखाया जाए ताकि लोग स्वयं तैयार हों। जब मरने का समय आ जाए तो वे पूरी तरह से तैयार हो जाएं-आनंद से, उत्सव मनाते हुए।

लेकिन आत्महत्या अपराध है। इसे आत्महत्या समझा जाएगा और लोग कहेंगे कि मैं सबको गैर-कानूनी बातें सिखा रहा हूं।

मेरी उत्सुकता है सत्य में, कानून में नहीं।

सत्य यह है कि तुमने प्रकृति को, जीवन को असंतुलित किया है। उसका संतुलन उसे वापस लौटा दो।

मेरा सुझाव है, एक आंदोलन शुरू किया जाए ताकि जब लोग काफी जी चुके हैं और वे अपने शरीर से मुक्त होना चाहते हैं तो अस्पतालों में सुविधापूर्ण, सुखद मृत्यु का प्रबंध हो सके। यह बिलकुल स्वस्थ दृष्टिकोण है कि हर अस्पताल में एक विशेष कक्ष होना चाहिए जहां सब सुविधाएं हों ताकि मृत्यु एक सुखद, आनंदपूर्ण अनुभव बन जाए।

[ओशो]

नवम्बर 6, 2014

जिंदगी और मौत की जंग के फोटो ने फोटोग्राफर से आत्महत्या करवाई…

FamineSudanसाउथ अफ्रीकन फोटो जर्नलिस्ट Kevin Carter 1993 के मार्च माह में अकाल को कवर करने के सूडान गये थे, जहां यू.एन के फूडिंग कैम्प के बाहर एक दिल चीरने वाला  दृश्य देखकर उन्होंने दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर लिया|

सूडान में अकाल के कारण भूखमरी से कृशकाय हो चुकी एक बालिका जमीन पर घिसट घिसट कर यू.एन के फूडिंग कैम्प की ओर जा रही है और एक गिद्ध उसके पीछे आकर बैठ गया है इस इंतजार एन कि जल्द ही ज़िंदगी बालिका का साथ छोड़ देगी और उसके लिए भोजन का इंतजाम कर देगी|

इस फोटो को 1994 में अप्रैल माह में पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया और यह फोटो दुनिया भर के अखबारों और पत्रिकाओं में छपा और चर्चा का केन्द्र बना|

भूख से कंकाल बन चुकी अभागिन बालिका का क्या हुआ?  क्या वह बच पाई?

27 July 1994 को Kevin Carter  ने आत्महत्या कर ली|

उनकी कहानी 2010 की Canadian-South African फिल्म – The Bang Bang Club में दर्शाई गई है|

Kevin Carter के सुसाइड नोट में लिखा था –

“I’m really, really sorry. The pain of life overrides the joy to the point that joy does not exist… depressed … without phone … money for rent … money for child support … money for debts … money!!! … I am haunted by the vivid memories of killings and corpses and anger and pain … of starving or wounded children, of trigger-happy madmen, often police, of killer executioners …”

 

दिसम्बर 31, 2013

16 दिसम्बर की सर्द रात…

oldman-001बर्फ गिरती है हिमाचल प्रदेश और कश्मीर में, और दांत किटकिटाने लगते हैं दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक के इलाके में रहने वाले जीवों के| इस बरस भी दिसम्बर की दस तारीख क्या निकली सर्दी ने अपना प्रकोप दिखाना शुरू कर दिया था| मजबूरी न हो तो कौन सर्दी की रातों में घर की नर्म-गर्म शरण छोड़कर बाहर सडकों पर ख़ाक छानेगा?

‘समय से मीटिंग खत्म हो जाती तो घर पहुँच जाता’|  बस से उतर कर बस स्टॉप पर चढ़ते हुए अमित भुनभुनाया|

भूख अलग परेशान कर रही थी| उसने समय देखा|

साढ़े नौ बजने ही वाले थे| दुकानदार दुकानें बंद कर अपने अपने घर जाने लगे थे| कुछ ही मिनटों में बस स्टॉप सुनसान लगने लगा| अमित को एहसास हुआ कि वह अकेला ही बस स्टॉप पर मौजूद था| यही तो वक्त रहा होगा पिछले बरस की 16 दिसंबर की रात जब ऐसे ही एक बस स्टॉप से दामिनी और उसके मित्र को कुछ वहशी दरिंदों ने भुलावा देकर अपनी बस में बैठा लिया था और हैवानियत की सभी हदें पार करके एक खिल उठने की भरपूर संभावना लिए हुए जीवन को कुचल दिया था| उस रात भी वह सड़क पर ही था और उस हादसे की खबर उसे सुबह उठने पर टीवी पर आ रहे समाचारों के जरिये ही हुयी थी|

बस स्टॉप पर हल्की सी आहट से उसकी विचार श्रंखला टूटी| उसने देखा कोट पहने और मंकी कैप और मफलर में ढके हुए एक बुजुर्गवार बस स्टॉप पर आ पहुंचे थे| उन्होंने कोट की जेब से एक मोमबत्ती और माचिस की एक डिबिया निकाली और माचिस की एक तिल्ली निकाल कर मोमबत्ती जलाने की कोशिश करने लगे, पर हवा चलने के कारण मोमबत्ती जल पाती उससे पहले ही माचिस की तिल्ली बुझ गई| उन्होंने दूसरी तिल्ली जलाई, इस बार मोमबत्ती जल गई और वे उसे बस स्टॉप के एक कोने पर लगाने लगे पर हवा ने इस बार भी काम दिखा दिया और मोमबत्ती बुझ गई|

अमित ने देखा कि कोई पिज्ज़ा खाकर उसका डिब्बा बस स्टॉप में लगी एकमात्र बैंच पर छोड़ गया था| उसने डिब्बा उठाकर बुजुर्गवार से कहा,” सर, इसकी ओट में जलाइए मोमबत्ती शायद काम बन जाए|”

कैप और मफलर से लगभग पूरी तरह ढके बुजुर्गवार के चेहरे से झांकती उनकी आँखों में मुस्कान की झलक सी दिखाई दी|

‘ले आओ बेटा इसे इधर ले आओ, यहाँ कोने में लगा देता हूँ’

अमित गत्ते का डिब्बा लेकर बस स्टॉप के एक कोने पर खड़े बुजुर्गवार के पास चला गया| उसने डिब्बे को खोल दिया और अब वह काफी बड़े हिस्से को गत्ते की दीवारों से रोक सकता था| उसे एहसास हो गया था कि बुजुर्गवार दामिनी की याद में मोमबत्ती जला रहे हैं|

बुजुर्गवार ने मोमबत्ती जलाई और एक कोने में थोड़ा मोम टपका कर फर्श पर टिका दी और आँखें बंद करके हाथ जोड़कर कुछ बुदबुदाने लगे| मिनट भर ऐसे ही प्रार्थना जैसा कुछ करके वे पीछे हटे तो अमित ने गत्ते के डिब्बे को मोमबत्ती के सामने इस तरह टिका दिया जिससे हवा का प्रवाह रोका जा सके|

बुजुर्गवार ने बैंच पर बैठ हल्की आवाज में कहा,” बहुत बुरा हुआ था उसके साथ”|

“जी”, अमित के मुँह से सिर्फ इतना ही निकल सका|

बुजुर्गवार कुछ देर सड़क पर दूर कुछ देर देखते रहे| अमित को अब तक बस आने का इन्तजार था पर अब बुजुर्गवार के आने से अकेलेपन का एहसास खत्म हो चला था|

‘बहुत साल हो गये…ऐसी ही एक रात थी…पर सर्दी अभी आने को थी| नवंबर के शुरुआती दिन होंगे|’

बुजुर्ग ने धीमे स्वर में मानों अपने आप से कहा हो| अमित ने उनकी तरफ ध्यान से देखा तो उन्हें कहीं खोया हुआ पाया| उसकी समझ में नहीं आया कि वे उससे कह रहे थे या खुद से ही बुदबुदा कर बात कर रहे थे|

कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद उन्होंने कहा,” तीसरी मंजिल पर स्थित घर में अकेला था, बीमार भी था,  रात का खाना खाकर बालकनी में टहल रहा था| रात के कोई साढ़े नौ बजे होंगे| कमरे और बालकनी की बत्तियाँ बंद करके घूम रहा था| नीचे कुछ दूर स्ट्रीट लाईट जल रही थी| एक कार आकर रुकी और उसमें से दो नौजवान उतरे| उन्होंने देखा उनकी पार्किंग की जगह कोई कार खड़ी हुयी थी| पार्किंग को लेकर झगडा होना लगभग रोजमर्रा की बात थी वहाँ| उन्होंने कुछ देर अपनी कार का हार्न बजाया जिससे कि जो भी वहाँ कार खड़ी करके गया हुआ है वह झाँक कर देख सके| पर कहीं कोई हलचल न देख कर उन्होंने वहाँ खड़ी कार को धक्का लगाकर हटाना चाहा पर उसमें हेण्ड ब्रेक लगा हुआ था| क्रोधित होकर उन्होंने आपस में कुछ बात की और एक नौजवान अपने घर में अंदर चला गया| वापिस आया तो उसके हाथ में गुप्ती, या बर्फ तोड़ने वाले सुए जैसा कुछ चमक रहा था| उन्होंने इधर उधर देखा, ऊपर आसपास के सब घरों की ओर देखा| अन्धेरा होने के कारण वे मुझे नहीं देख सकते थे पर मैं उनकी सभी हरकतें देख सकता था|’

अमित को उनके वृतांत में रस आने लगा था| वह उत्सुकता से उनकी बातें सुनने लगा| आखिर पार्किंग की समस्या तो शहर में ज्यों की त्यों बनी हुयी थी, बल्कि हालात पहले से बदतर ही हो रहे थे| स्कूटर खड़े करने वाले फ्लैटों में एक एक घर में रहने वाले लोग दो से चार कारें  रखने लगे थे|

‘एक युवक ने अपनी पार्किंग की जगह खड़ी कार की ड्राइविंग सीट की तरफ वाले दरवाजे में खिड़की के कांच के पास अपना हथियार घुसा दिया और कुछ पल बाद ही उसने कार का दरवाजा खोल दिया| उसने हेण्ड ब्रेक खोला और दोनों युवकों ने कार को आगे धकेल कर बाड़ के पास लगे पाइप से सटाकर खड़ा कर दिया और हेण्ड ब्रेक पहले की तरह लगा कर दरवाजा बंद कर दिया| एक युवक ने कार के दोनों साइड मिरर हाथ मारकर तोड़ दिए|  दूसरे युवक ने उस कार के पीछे अपनी कार पार्क कर दी| अब आगे वाली कार न पीछे निकल सकती थी और न ही आगे जा सकती थी| युवकों ने कार को अपनी कार और बाड़ के बीच ट्रैप कर दिया था|

दोनों युवक अपने घर के अंदर चले गये|

सब तरफ शान्ति थी| सड़क पर कोई दिखाई नहीं दे रहा था| मैं भी घर में चला गया| टीवी देखने लगा| पर मन नीचे सड़क पर ही लगा हुआ था| किसकी कार होगी, कैसे निकालेगा? क्या इन् लोगों में झगडा होगा…जैसे प्रश्न दिमाग में उठ रहे थे| बीच बीच में बालकनी में जाकर नीचे झाँक लेता था| कार अभी भी सेंडविच बनी खड़ी थी| तकरीबन चालीस-पैंतालीस मिनट बाद बाहर गया तो देखा कि एक युवती उस कार के पास खड़ी इधर उधर देख रही थी| उसने देख ही लिया था कि उसकी कार के साइड मिरर तोड़ दिए गये थे और कार को खिसका कर आगे कर दिया गया था| ऐसा लगता था कि वह किसी से मिलने वहाँ आयी थी और खाली जगह देख कर कार यहाँ खड़ी कर गई थी| सड़क पर अब भी कोई नहीं था| लगभग निश्चित था कि जिस घर में वह मिलने आई थी वह उस ब्लॉक में न होकर पास वाले किसी ब्लॉक में था| तभी उसे छोड़ने कोई नहीं आया था, वह अकेली ही वहाँ आई होगी, अपने मेजबानों से उनके घर के बाहर ही विदा लेकर|

युवती ने अपनी कार के पीछे खड़ी कार का मुयायना करना शुरू किया| उसे पीछे वाले शीशे पर मकां नंबर वाला स्टीकर दिख गया होगा| उसने अपने पर्स से छोटी से टार्च निकाल कर उसे पढ़ा और इधर – उधर  मकानों के नंबर पढकर वह युवकों के घर की तरफ चल पड़ी|

मेरी बालकनी के एकदम नीचे ग्राउंड फ्लोर पर युवकों के घर का दरवाजा होने की वजह से मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था| पर दरवाजा खुलने और कुछ पल के बाद ऐसी अस्पष्ट आवाजें आईं जिससे लगा कि युवती और उन युवकों के बीच बहस जैसा कुछ घटित होता प्रतीत हो रहा था| कुछ पल ऐसी ही अस्पष्ट आवाजें आती रहीं और फिर दरवाजा बंद होने की आवाज आई और फिर सब शांत हो गया| युवती वापिस अपनी कार के पास नहीं आई| मैं काफी देर वहाँ खड़ा रहा पर युवती को आते नहीं देखा|

एक घंटे बाद भी युवती की कार वहीं फंसी खड़ी थी| रात के लगभग बारह तक भी कार वहीं खड़ी थी| मैं टीवी देखते देखते किसी समय सो गया| सुबह पांच बजे नींद खुली तो सबसे पहले बालकनी में जाकर नीचे झांका तो देखा कार वहाँ नहीं थी| युवकों की कार भी वहाँ नहीं थी| मतलब वे भी या तो रात में ही या सुबह सुबह ही कहीं चले गये थे|  पर अगर युवकों ने बारह बजे के आसपास भी अगर युवती को कार निकालने दी होगी तब भी एक घंटे से ज्यादा समय वह उनके घर में उपस्थित रही होगी| मुझे ऐसा ख्याल आया कि युवती के साथ कुछ न कुछ गलत तो कल रात हुआ था|

दिन में नीचे सड़क पर गया तो ऐसे ही युवकों के घर की तरफ झाँक लिया पर वहाँ ताला लगा था| शाम को और फिर रात को भी उनकी कार नीचे नहीं दिखाई दी| इसका मतलब था वे घर नहीं लौटे थे| उससे अगले रोज भी उनकी कार नहीं दिखाई दी|

तीन-चार दिन बाद मैं शहर से बाहर चला गया पर उस रात की घटना मेरे जेहन में समाई रही| दस-बारह दिन बाद लौटा तो पता चला कि चार-पांच दिन पहले एक रोड एक्सीडेंट में ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाले युवक मर गये|

मुझे हमेशा लगता रहा कि उस रात कुछ न कुछ गडबड तो युवकों ने उस युवती के साथ की थी और शायद उस एक्सीडेंट के पीछे भी उस रात की घटना का कोई हाथ हो| घर आकर मैंने उस रात के बाद के दिनों के सारे अखबार खंगाल डाले…क्योंकि मुझे आशंका थी कि कहीं न कहीं शायद किसी युवती की आत्महत्या या ह्त्या की कोई खबर जरुर छपी होगी| खबर मुझे पढ़ने को मिली उस रात के बाद वाले पांचवे दिन के अखबार में जिसमें जिक्र था एक सभ्रांत परिवार की युवती की आत्महत्या का| खबर के मुताबिक़ पिछले कुछ दिनों से वह बेहद परेशान थी|

इतने सालों में मैंने कभी इस बात का जिक्र किसी से नहीं किया| पर पिछले साल निर्भया कांड के बाद उस रात की स्मृतियाँ मेरे दिमाग में बार बार उथल पुथल मचाने लगीं| आज जाने क्यों तुमसे सब कह दिया|’

अमित उनकी कहानी में खोया हुआ था कि बस आकर रुकी और उसका ध्यान बस की ओर गया| वह बस में चढ़ने के लिए बैंच से उठा तो देखा कि बुजुर्ग बस स्टैंड से उतर कर सड़क पर चलने लगे थे| वह बस में चढ़ गया और पीछे देखा तो अँधेरे में एक साया जाता हुआ दिखाई दिया|

“हैलो, भाईसाहब उतरना नहीं है क्या| बस इससे आगे नहीं जायेगी|”

अमित हडबडा कर उठा तो पाया कि वह बस में बैठा हुआ था और कंडक्टर उसे झिंझोड कर उठा रहा था| वह पसीने से तरबतर था|

ओ माई गॉड!

तो क्या वह सो गया था? सपना देख रहा था? यह सब कुछ सपने में घटा? बस से उतर कर उसने इधर उधर देखा मानो अभी भी महसूस करने की कोशिश कर रहा हो कि बुजुर्गवार सपने में नहीं वास्तव में उससे मिले थे|

  …[राकेश]

जून 5, 2013

आत्महत्या : जीने की इच्छा (ओशो)

osho dancingकहा जाता है कि अभिनेता-निर्देशक गुरुदत ने आत्महत्या की थी, और इस बात को मानने वाले इस बात को स्वीकार नहीं करते कि शराब और नींद की गोलियों के मिश्रण से यह एक दुर्घटना मात्र भी हो सकती थी पर तब भी यह प्रश्न उठना तो वाजिब है ही कि वे शराब और नींद की गोलियों के नशे के आदि क्यों बने| इन नशों की लत कहीं न कहीं यह दर्शाती ही है कि वे जीवन का मूल्य कम करके आंकने लगे थे और कहीं न कहीं उनकी नशे की लत उनके जीवन को समय पूर्व ही मौत की ओर ले जा रही थी| ऐसे बहुत से कलाकार हुए हैं जिन्होने आत्महत्या की और ऐसा नहीं कि इनमे वे लोग हैं जिनके जीवन में असफलता ज्यादा थी| ऐसे ऐसे कलाकारों ने भी आत्महत्या का सहारा लेकर जीवन का परित्याग कर दिया जो बेहद सफल थे| इससे यही साबित होता है कि कुछ लोगों में कहीं न कहीं जीवन को त्यागने की इच्छा का बीज छिपा रहता है और किसी भी तरह की समस्याओं से घिरने पर वह बीज अंकुरित हो उठता है और ऐसे लोगों में से कुछ लोग आत्मघात की ओर चले जाते हैं वरना ऐसे लोग भी देखने में आ सकते हैं जिनके दुखों की दास्तान सुनकार रोंगटे खड़े हो जाएँ और सुनने वाला सोचने पर मजबूर हो जाए कि यह आदमी जी कैसे रहा है?
ज्योतिष और अध्यात्म के संबंध पर बोलते हुए ओशो ने जीने की इच्छा और मरने के लिए बहाना ढूँढने की प्रवृत्ति पर भी एक बेहद अच्छी कथा के माध्यम से प्रकाश डाला है|

उन्होने महावीर स्वामी, कभी उनके शिष्य रहे गोशालक और जीने की इच्छा के बारे में एक कथा कही है। इस कथा में सुसाइडल इंस्टिक्ट और जीने की प्रबल इच्छा पर बेहद गहरी समझ उन्होने दुनिया को देकर उसे समृद्ध बनाया है।

प्रस्तुत है वही अनूठी कथा।

महावीर एक गांव के पास से गुजर रहे हैं। और महावीर का एक शिष्य गोशालक उनके साथ है, जो बाद में उनका विरोधी हो गया। एक पौधे के पास से दोनों गुजरते हैं।

गोशालक महावीर से कहता है कि सुनिए, यह पौधा लगा हुआ है। क्या सोचते हैं आप, यह फूल तक पहुंचेगा या नहीं पहुंचेगा? इसमें फूल लगेंगे या नहीं लगेंगे? यह पौधा बचेगा या नहीं बचेगा? इसका भविष्य है या नहीं?

महावीर आंख बंद करके उसी पौधे के पास खड़े हो जाते हैं।

गोशालक पूछता है कि कहिए, आंख बंद करने से क्या होगा? टालिए मत।

उसे पता भी नहीं कि महावीर आंख बंद करके क्यों खड़े हो गए हैं। वे एसेंशियल की खोज कर रहे हैं। इस पौधे के बीइंग में उतरना जरूरी है, इस पौधे की आत्मा में उतरना जरूरी है। बिना इसके नहीं कहा जा सकता कि क्या होगा।

आंख खोल कर महावीर कहते हैं कि यह पौधा फूल तक पहुंचेगा।

गोशालक उनके सामने ही पौधे को उखाड़ कर फेंक देता है, और खिलखिला कर हंसता है, क्योंकि इससे ज्यादा और अतर्क्‍य प्रमाण क्या होगा? महावीर के लिए कुछ कहने की अब और जरूरत क्या है? उसने पौधे को उखाड़ कर फेंक दिया, और उसने कहा कि देख लें। वह हंसता है, महावीर मुस्कुराते हैं। और दोनों अपने रास्ते चले आते हैं।

सात दिन बाद वे वापस उसी रास्ते पर लौट रहे हैं। जैसे ही महावीर और वे दोनों अपने आश्रम में पहुंचे जहां उन्हें ठहर जाना है, बड़ी भयंकर वर्षा हुई। सात दिन तक मूसलाधार पानी पड़ता रहा। सात दिन तक निकल नहीं सके। फिर लौट रहे हैं। जब लौटते हैं तो ठीक उस जगह आकर महावीर खड़े हो गए हैं जहां वे सात दिन पहले आंख बंद करके खड़े थे। देखा कि वह पौधा खड़ा है। जोर से वर्षा हुई, उसकी जड़ें वापस गीली जमीन को पकड़ गईं, वह पौधा खड़ा हो गया।
महावीर फिर आंख बंद करके उसके पास खड़े हो गए, गोशालक बहुत परेशान हुआ। उस पौधे को फेंक गए थे। महावीर ने आंख खोली।

गोशालक ने पूछा कि हैरान हूं, आश्चर्य! इस पौधे को हम उखाड़ कर फेंक गए थे, यह तो फिर खड़ा हो गया है!

महावीर ने कहा, यह फूल तक पहुंचेगा। और इसीलिए मैं आंख बंद करके… खड़े होकर इसे देखा! इसकी आंतरिक पोटेंशिएलिटी, इसकी आंतरिक संभावना क्या है? इसकी भीतर की स्थिति क्या है? तुम इसे बाहर से फेंक दोगे उठा कर तो भी यह अपने पैर जमा कर खड़ा हो सकेगा? यह कहीं आत्मघाती तो नहीं है, सुसाइडल इंस्टिंक्ट तो नहीं है इस पौधे में, कहीं यह मरने को उत्सुक तो नहीं है! अन्यथा तुम्हारा सहारा लेकर मर जाएगा। यह जीने को तत्पर है? अगर यह जीने को तत्पर है तो…मैं जानता था कि तुम इसे उखाड़ कर फेंक दोगे।

गोशालक ने कहा, आप क्या कहते हैं?

महावीर ने कहा कि जब मैं इस पौधे को देख रहा था तब तुम भी पास खड़े थे और तुम भी दिखाई पड़ रहे थे। और मैं जानता था कि तुम इसे उखाड़ कर फेंकोगे। इसलिए ठीक से जान लेना जरूरी है कि पौधे की खड़े रहने की आंतरिक क्षमता कितनी है? इसके पास आत्म-बल कितना है? यह कहीं मरने को तो उत्सुक नहीं है कि कोई भी बहाना लेकर मर जाए! तो तुम्हारा बहाना लेकर भी मर सकता है। और अन्यथा तुम्हारा उखाड़ कर फेंका गया पौधा पुनः जड़ें पकड़ सकता है।

गोशालक की दुबारा उस पौधे को उखाड़ कर फेंकने की हिम्मत न पड़ी; डरा।

पिछली बार गोशालक हंसता हुआ गया था, इस बार महावीर हंसते हुए आगे बढ़े।

गोशालक रास्ते में पूछने लगा, आप हंसते क्यों हैं?

महावीर ने कहा कि मैं सोचता था कि देखें, तुम्हारी सामर्थ्य कितनी है! अब तुम दुबारा इसे उखाड़ कर फेंकते हो या नहीं?

गोशालक ने पूछा के आपको तो पता चल जाना चाहिए कि मैं उखाड़ कर फेंकूंगा या नहीं।

तब महावीर ने कहा, वह गैर अनिवार्य है। उखाड़ कर फेंक भी सकते हो। अनिवार्य यह था कि पौधा अभी जीना चाहता था। उसके पूरे प्राण जीना चाहते थे, वह अनिवार्य था। वह एसेंशियल था। यह तो गैर अनिवार्य है, तुम फेंक भी सकते हो, नहीं भी फेंक सकते हो। यह तुम पर निर्भर हे। लेकिन तुम पौधे से कमजोर सिद्ध हुए हो—हार गए।

महावीर से गोशालक के नाराज हो जाने के कुछ कारणों में एक कारण यह पौधा भी था।

जिस ज्‍योतिष की मैं बात कर रहा हूं उसका संबंध अनिवार्य से एसेंशियल से फाउण्‍ड़ेशनल से है। आपकी उत्‍सुकता ज्‍यादा से ज्‍यादा सेमी एसेंशियल तक आती है। पता लगाना चाहते हे कि कितने दिन जियूंगा, मर तो नहीं जाऊँगा, जीकर क्‍या करूंगा। जी ही लुंगा तो क्‍या करूंगा, आपकी उत्‍सुकता नहीं पहुँचती। मरूंगा तो मरने के बाद क्‍या करूंगा। इस तक भी आपकी उत्‍सुकता नहीं पहुँचती। घटनाओं तक पहुँचती है, आत्‍माओं तक नहीं पहुँचती। जब मैं जी रहा हूं तो यह तो घटना है सिर्फ—जीकर मैं क्‍या हूं। वह मेरी आत्‍मा होगी। हम सब मरेंगे। मरने के मामले में सबकी घटना होगी। लेकिन मरते क्षण में मैं क्‍या होऊंगा, क्‍या करूंगा। मरने के क्षण में हमारी स्‍थिति सब से भिन्‍न होगी। कोई मुस्कराते हुए भी मर सकता है।

ओशो (ज्योतिष और अध्यात्म)

सितम्बर 22, 2011

खुदकशी – मर्ज़ और दवा

बिखरे हुए सपने अपनी जिंदगी से गए
बूढ़े कुछ चश्मे आँख की रोशनी से गए
झुका हुआ एक दरख्त ठूंठ हुआ बेचारा
बेरुते फल थे टूट कर खुद-खुशी से गए

दुःख को साथी मानते कट जाता दुःख
कबीर-गालिब को पढ़ते बट जाता दुःख
तुम मोल तो करते अमूल्य जीवन का
बिन अश्रु आँखों में सिमट जाता दुःख

जलते दीपक से सीख जीने का करीना
दुनिया के आगे हँसना पीछे अश्रु पीना
सोच ये हो तेरे साथ बिताये पल जीलूँ
ये सोच गलत है तेरे बिना क्या जीना

टूटे आस तो खुदा का आसरा है बहुत
हो भरोसा तो स्वयं का सहारा है बहुत
सपनों के साथ आँखे नहीं मरा करती
देख तो सही आगे अभी रास्ता है बहुत

नफा-नुकसान, दुख-सुख, मिलना–बिछड़ना
अनुभव है जिंदगी के, इनसे सीख समझ
समय का शिकारी तो खुद तेरी टोह में है
उसके जाल में न आ, फंदों में न उलझ

(प्रेम में असफलता पाने से की गई आत्महत्या की खबर से जन्मा ख्याल)

(रफत आलम)

जून 9, 2010

प्रकृति के रंग में भंग डालता आत्महंता मनुष्य

सब नाटकों से बड़ा
बहुत बड़ा
एक नाटक जीवन में रचा जाता रहता है हर पल
जहाँ कुछ तो जाना पहचाना होता रहता है
और कुछ एकदम अनज़ाना घटता रहता है

इस नाटक का निर्देशन प्रकृति करती है
प्रकृति के इस नाटक के पात्र हमेशा बदलाव की तलाश में लगे रहते हैं

आकाश के असीमित नीलेपन को
हमेशा धरती को घूरने का काम मिला हुआ है

और धरती तो इतनी रंगीली है कि
बरस भर में जाने कितने तो रंग बदल लेती है

धरती और आकाश के मध्य बहने वाली हवा की तो बात ही क्या ?
कभी तो सूरज से दोस्ती करके तपा देती है पूरा चमन
और कभी ठंडी ठंडी साँसे भरा करती है

चाँद को भी अच्छी भूमिका मिली है
समुद्र से मिलकर अच्छी जुगलबंदी करता है रात भर
और समुद्र के पानी को उछाल उछाल कर मज़े में ख़ुश होता रहता है
पर सूरज आया नहीं कि चाँद गायब हुआ अंधकार की चादर साथ लिए

पानी को ही कहाँ चैन है?
भाप बनकर उड़ उड़ पहुँचता रहता है आसमान में
पर शांति से वहाँ भी नहीं टिक पाता
और फिर से बरस पड़ता है वापिस धरती पर

पहले तो प्रकृति के सब पात्र अपने निर्धारित समय पर ही
प्रवेश करते थे समय के मंच पर
और संयमित अभिनय ही किया करते थे
पर कभी किसी समय हम दर्शक
इतने शक्तिशाली और उपद्रवी हो गये कि
ये सब कलाकार अपना पात्र ढंग से निभा पाने में बाधा महसूस करने लगे
और अब ये बड़े ही अनियमित हो गये हैं
कभी कम तो कभी ज्यादा मेहनत कर डालते हैं

प्रकृति के नाटक से
मनुष्य की सामन्जस्यता गायब होती जा रही है।
प्रकृति के गाये गीत अब उतने सुरीले नहीं रहे
प्रकृति के बनाये इंद्रधनुष धुंधले पड़ते जा रहे हैं
प्रकृति अब गुस्सा दिखाने लगी है
पर गलती तो सौ प्रतिशत
मूर्ख इंसान की ही है।

चल रही हैं
सज रही हैं
कुछ समय और महफिलें
अंत में मनुष्य को
आत्म हत्या करने से तो
स्वयं प्रकृति भी नहीं बचा सकती।

 

…[राकेश]

अप्रैल 22, 2010

आशा

मैं निराशा को स्वीकार नहीं कर सकता,

चिंता को अंगीकार नहीं कर सकता,

क्योंकि चिंता चिता के समान होती है

और मैं चिंता करके

खुद को पल पल मार नहीं सकता

क्योंकि वह भी आत्महत्या का ही एक रूप है

आत्मा परमात्मा का अंश है अगर,

तो कैसे परमात्मा को कष्ट दूँ?

…[राकेश]

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