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अप्रैल 13, 2011

मुफलिस बचपन

रसोई में बरतनों की धोवन की तरह
जिंदगी गुजरी अपनी जूठन की तरह

चंद सिक्के मोल है गरीब की आबरू
चकलाघर के मजबूर बदन की तरह

रोटी सूदखोर के घर में कैद थी और
भूख भटकती फिरी बेरागन की तरह

बदलते कपडों जैसे रिश्तों के दौर में
दिल मिलते कब हैं धडकन की तरह

ज़ब्त ने रखी है गम की लाज वरना
आंसू बरसने को थे सावन की तरह

मुस्कान सजी हुई है मुर्दा चेहरों पर
चंदा उगाही से मिले कफ़न की तरह

जिंदा मर गयीं मासूम उमंगें आलम
मुफलिस बालक के बचपन की तरह

(रफत आलम)

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