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अप्रैल 29, 2010

आज का सच

इच्छाओं में वृद्धि,

आमंत्रण है तनावों को,

क्योंकि चाही गयी हर इच्छा पूर्ण नहीं होती,

पर अगर यूँ कामनाओं, आकांक्षाओं को न बढाएं,

तो लगता है कि वक्त से कहीं पीछे चल रहे हैं!

कहीं औरों से पिछड़ न जाएँ, का डर
संतुष्ट नहीं रहने देता !

ऑंखें बंद कर झांक कर देखें अपने वजूद में,

तो दृढ़ बने रहने का संकल्प लेने में हिचक नहीं होती

पर दुनिया की भेड़्चाल देखकर चूर हो जाते हैं

अपने से किये वादे!

अपने ही अंतर्मन की कमजोरी कि

सोच बनती है यदि और लोग सुधरें

तो हम भी सीधे सीधे चलें!

पर क्यों मज़बूरी सहन करनी पड़ती है

सब तरह के रास्तों को अपनाने की?

शायद इसलिए कि

सफल व्यक्ति ही आजकल अच्छा भी माना जाता है

आज मानक सिर्फ मंजिल को पाना ही रह गया है

रास्ता चाहे जैसा भी हो !

…[राकेश]

अप्रैल 22, 2010

बिना करे पाने का लोभ

अलादीन का चिराग मिल जाये तो,

शायद पूरी हो सकें सब प्रकार की भौतिक इच्छाएं!

पर तलाश क्यों जिन्न वाले चिराग की?

वह शायद पूरी कर सकता है एक -एक इच्छा,

पर क्या तब उस संतुष्टि का एहसास भी होगा

जो अपनी मेहनत से किये कार्य की

सफलता से प्राप्त होता है ?

…[राकेश]

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