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जून 7, 2010

रंगमंच और जीवन

रंगमंच की दुनिया भी कैसी होती है?
वहाँ लोग उसका अभिनय करते हैं
जो वे वास्तविक जीवन में नहीं होते|


उनका अभिनय यह बताता है कि
एक मनुष्य कितने ही रूप धारण कर सकता है
या कि एक मनुष्य में कितनी संभावनाएँ हो सकती हैं|


नाटक एक कला है
जो अन्य कलाओं कि तुलना में
जीवन के ज़्यादा क़रीब है|


नाटक त्रिआयामी है अपने प्रदर्शन में
और बहुआयामी है अपने प्रभाव में|


नाटक सजीव है
और इस विद्या में सबकी भागीदारी हो सकती है|


नाटक सबके लिए है
नाटक एक खेल है
पर फिर भी जीवन से जुड़ा हुआ है
कुछ भी ना हो हमारे पास
न मंच ना परदा न साज़ न सज्जा
पर तब भी नाटक खेला जा सकता है|


नाटक विशुद्ध रचनात्मक प्रक्रिया है
नाटक विचार है
परदे के उठने और गिरने के मध्य
जो मंच पर घटता है
वह झलक दिखाता है कि
जीवन में माया का बहुत बड़ा प्रभाव हो सकता है
क्योंकि नाटक के दौरान
कुछ आभासी पहलू मिलकर
एक वास्तविकता का पुट सामने लाते हैं
नेत्र और कर्ण इंद्रियों के द्वारा सम्मोहित करके
नाटक हमें अपने कथानक के साथ बहा कर
कहीं और ले जाता है|


नाट्यशास्त्र ही बताता है कि
वास्तविक जीवन में जो दूसरों से ज़्यादा शक्ति रखते हैं
दूसरों से ज़्यादा दूर का सोच सकते हैं
वे अपने युग को प्रभावित करते हैं
और सबको अपनी विचारधारा में बहा ले जाते हैं|


यही जीवन में माया के होने का गवाह है
तब लगभग सारे लोग एक बड़े नाटक का हिस्सा बन जाते हैं
और अपना अभिनय शुरू कर देते हैं
अंतर केवल इतना होता है कि
रंगमंच की तरह यहाँ हमें अंत का पहले से पता नहीं होता|


मानव जाति का इतिहास गवाह है कि
समय समय पर ऐसे दिग्दर्शक हुए हैं
जिन्होने अपनी विचारधारा के अनुसार
जीवन के वास्तविक रंगमंच पर
बड़े बड़े नाटक रचे हैं|


हिटलर, मुसॉलिनी और स्टालिन आदि ने
विध्वंसकारी नाटकों की रचनाएँ कीं
और अपने अपने देश के समाज को
अपनी विचारधारा के साथ बहा ले गये|


गाँधी ने भी एक रचनात्मक नाटक की रूपरेखा तैयार की
और मानव जाति के इतिहास को ऊँचाईयाँ प्रदान कीं|


कहीं न कहीं रंगमंच के नाटक
हमें समझ देते हैं कि
जब भी हम वास्तविक जीवन में
किसी विशेष विचारधारा के साथ
बहने लगें तो
देख लें कि किस ओर जा रहे हैं
निर्माण की ओर या विध्वंस की ओर ?

[ राकेश ]

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जून 4, 2010

अभिनय

हे अभिनेता!

तुम अभिनय को
अपने द्वारा निभाए गये पात्र को
वास्तविक न मानने लगना|

तब अभिनय भी एक ऐसा नशा हो जाएगा
जो जीवन के वास्तविक स्वरूप को हटाकर
कहीं और व्यस्त कर देता है दिमाग को
और कुछ समय के लिए व्यक्ति
जो वह नहीं है
वही होने का भ्रम पाल लेता है|

जैसे कुछ लोग वास्तविक जीवन में साधु होने का
अभिनय करने लगते हैं
और अपने को वास्तव में साधु समझने लगते हैं
पर जीवन की वास्तविक रंगभूमि से पलायन करने वाले
ऐसे लोग साधुता का केवल चोगा ही पहन सकते हैं
और सन्यस्त होने का अभिनय ही कर सकते हैं
जैसे अभिनेता वहाँ मंच पर अभिनय करते हैं
ये यहाँ वास्तविक जीवन में छलिया बने रहते हैं
पर छलते तो वे खुद को ही हैं
यदि वास्तव में संतत्व उन्हे मिल गया होता तो
क्या यूँ अपनी जिम्मेदारियों से भागते?
गांजे से मिली शांति को असली मानते?
संसार की नश्वर्ता के भ्रम में सब कुछ भुलाए रखते?

हे अभिनेता!

तुम भी अपने को किसी भुलावे में न डाल लेना
अभिनय किसी भी पात्र का करो पर
अपने वास्तविक स्वरूप को ना भूल जाना!


[ राकेश ]

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