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फ़रवरी 4, 2011

सृष्टि सूक्त : महर्षि परमेष्टि

तब न था अभाव और न थी विद्यमानता।
वायु थी न वायु पार अंतरिक्ष का पता।
आवरण पदार्थ कौन? वह स्वयं कहाँ रहा।
किस प्रभाव से गहन अमाप विश्व जल बहा।
और तब न मृत्यु थी, न थी कहीं सुनित्यनता।
थी न तब दिवा-निशीथ की प्रकाश दीप्तिता।
ली स्वयं व्यवस्थ एक ने अवायु श्वास भर।
एक मात्र था वही वहाँ न प्राप्त था अपर।
अंधकार मात्र था प्रथम घनान्धकारमय।
यह समस्त एक अनालोक नीर का प्रलय।
घिरा किसी पदार्थ से न, एक वह कि जो हुआ।
वह प्रभूत ज्वालाशक्त्ति ज्ञात अंततः उठा।
कामना हुई इसी स्वरुप अवतरित प्रथम।
बीज एक था वही सुबुद्धि- ज्ञात आदितम।
साधु जो स्वमन रहे प्रशोधते सुज्ञान से।
जानते, अविद्यमान बद्ध विद्यमान से।
शून्य आरपार तक क्रिया स्वमाप प्रस्सरण
जानते कि उर्ध्व क्या, कि क्या रहा अध: चरण।
बीज तेज से महान शक्त्ति उर्वरा बनी।
थी समर्थता अधः कि उर्ध्व प्रेरणा घनी।
किंतु कौन जानता, समर्थ कौन जो कहे।
था कहाँ समस्त? सृष्टि जन्म कौन विधि गहे।
बाद का बहुत गृहीत जन्म सर्व देव चय।
कौन विज्ञ है कि कौन स्त्रोत सृष्टि का उदय?
जन्म कौन स्त्रोत से समस्त सृष्टि ने लिया
वह, इसे कि रुप उसी ने दिया, नहीं दिया।
वह कि उच्चतम समस्त स्वर्ग से निहारता।
जानता, विचारणीय है कि हो न जानता ।

[ऋग्वेद – x मंडल]

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