Posts tagged ‘Sparsh’

अगस्त 3, 2017

सौंदर्यबोध

 

अपने इस गटापार ची बबुए के

पैरों में शहतीरें बांधकर

चौराहे पर खड़ा कर दो,

फिर, चुपचाप ढ़ोल बजाते जाओ,

शायद पेट भर जाए :

दुनिया विवशता नहीं

कुतूहल खरीदती है|

 

भूखी बिल्ली की तरह

अपनी गरदन में संकरी हाँडी फँसाकर

हाथ-पैर पटको,

दीवारों से टकराओ,

महज छटपटाते जाओ,

शायद दया मिल जाए:

दुनिया आँसू पसन्द करती है

मगर शोख चेहरों के|

 

अपनी हर मृत्यु को

हरी-भरी क्यारियों में

मरी हुई तितलियों-सा

पंख रंगकर छोड़ दो,

शायद संवेदना मिल जाए :

दुनिया हाथों-हाथ उठा सकती है

मगर इस आश्वासन पर

कि रुमाल के हल्के-से स्पर्श के बाद

हथेली पर एक भी धब्बा नहीं रह जाएगा|

 

आज की दुनिया में

विवशता,

भूख,

मृत्यु,

सब सजाने के बाद ही

पहचानी जा सकती है|

बिना आकर्षण के दुकानें टूट जाती हैं|

शायद कल उनकी समाधियां नहीं बनेंगी

जो मरने के पूर्व

कफ़न और फूलों का

प्रबन्ध नहीं कर लेंगें|

ओछी नहीं है दुनिया:

मैं फिर कहता हूँ,

महज उसका सौंदर्य-बोध

बढ़ गया है|

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

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फ़रवरी 14, 2017

फीरोजी होठ … धर्मवीर भारती

purple-001इन फीरोजी होठों पर

बरबाद मेरी जिंदगी

इन फीरोजी होठों पर |

गुलाबी पांखुरी पर हल्की सुरमई आभा

कि ज्यों करवट बदल लेती कभी बरसात की दुपहर

इन फीरोजी होठों पर |

तुम्हारे स्पर्श की बादल-धुली कचनार नरमाई

तुम्हारे वक्ष की जादू भरी मदहोश गरमाई|

तुम्हारी चितवनों में नर्गिसों की पाँत शरमाई

किसी भी मोल पर मैं आज अपने को लुटा सकता

सिखाने को कहा

मुझसे प्रणय के देवताओं ने

तुम्हे आदिम गुनाहों का अजब-सा इन्द्रधनुषी स्वाद!

मेरी जिंदगी बरबाद!

अंधरी रात में खिलते हुए बेले-सरीखा मन

मृणालो की मुलायम बांह ने सीखी नहीं उलझन

सुहागन लाज में लिपटा शरद की धूप-जैसा तन

पंखुरियों पर भँवर के गीत-सा मन टूटता जाता

मुझे तो वासना का

विष हमेशा बन गया अमृत

बशर्ते वासना भी हो तुम्हारे रूप से आबाद

मेरी जिंदगी बरबाद!

गुनाहों से कभी मैली पड़ी बेदाग़ तरुणाई-

सितारों की जलन से बादलों पर आंच कब आई ?

न चन्दा को कभी व्यापी अमा की घोर कजराई

बड़ा मासूम होता है गुनाहों का समर्पण भी

हमेशा आदमी

मजबूर होकर लौट आता है

जहां हर मुक्ति के, हर त्याग के, हर साधना के बाद!

मेरी जिंदगी बरबाद!

(धर्मवीर भारती)

नवम्बर 24, 2014

नखशिख… (अज्ञेय)

agyeyaतुम्हारी देह
मुझको कनकचम्पे की कली है
दूर से ही स्मरण में भी गंध देती है
(रूप स्पर्शातीत वह जिसकी लुनाई
कुहासेसी चेतना को मोह ले)

तुम्हारे नैन
पहले भोर की दो ओस बूँदें हैं
अछूती, ज्योतिमय, भीतर द्रवित।
(मानो विधाता के हृदय में
जग गई हो भाप कणा की अपरिमित)

तुम्हारे ओठ
पर उस दहकते दाड़िम पुहप को
मूक तकता रह सकूँ मैं
(सह सकूँ मैं ताप उष्मा को
मुझे जो लील लेती है।)

 

[अज्ञेय]

दिसम्बर 10, 2013

भीड़ में भीड़ से अलग एक चेहरा

ये आखिर हमें हुआ क्या है…baran-001
हर पल में किसी का एहसास
जैसे कोई छोड़ गया हो हवा में
गंध अपनी देह की

आती जाती सांस में

समा जाता है अहसास

जैसे  उसके स्पर्श का
हर तरफ बस

एक ही चेहरा
भीड़ में

भीड़ से अलग जैसा

Rajnish sign

नवम्बर 13, 2013

कुछ कुछ होता है!

तरंगों के कंपनlovers-001

पोरों के स्पर्श

सुकुमार वक्ष की कोमलता…

श्यामवर्णी चादर ओढ़े सांस

चुनरी की रेशमी ओट

संगीत भरे चित्रालय में

आँखों-आँखों के संवाद में

झुककर पांवों, तलुओं का स्पर्श

बांह को पकड़ कर भींच देना

गोद में रखे पॉपकार्न को टूंगना

कपोलों का चुम्बन

चेहरे पर भावों के इन्द्रधनुष

तुमने कहा…

कुछ कुछ होता है

Yugalsign1

नवम्बर 11, 2013

यूँ ही हँसती रहो मुँह छिपाकर

dewflowerतुमने कभी देखा

ओस की बूंद को फूल पे?

एक छोटी सी बूँद …

बहुत नाज़ुक लेकिन कितनी जीवंत!

सारे रंग अपने में समेटे,

फूल के आगोश में लिपटी

‘बूँद’

रात भर सपना देखती है…

सुबह का,

सुबह के ताजगी भरे उजाले में

अपने प्रेमी फूल को देखने का…

उसे सहलाने का

बहुत क्षणिक  होता है ये मिलन

रात के लम्बे इंतज़ार के सामने

पर कितना सघन!

दो पल का स्पर्श…

पोर पोर सहलाना

फूल को दे जाता है

सबब

पूरे दिन महकने का…

खिले रहने का…

मुस्कराने का

और खुशिया बिखेरने का

गुदगुदाती है

उसे बूँद की याद दिन भर

और उसी के सहारे

सह लेता है फूल

दिन भर की तपन

मुस्कुराते…

manisha-001खिलखिलाते…

महकते…

महकाते…

मैं भी मुस्कुराता हूँ …

बेवज़ह भी…

कभी जब याद आता है

तुम्हारा मुंह छुपा के मुस्कुराना…

मेरे दिन रात

महक उठते हैं…

काश

तुझ फूल को हँसने

खिलने और महकने के लिए

मैं ही ओस की बूँद रूपी

बहाना बन जाऊं…

(रजनीश)

नवम्बर 10, 2013

कितना कुछ ज़िंदा रहता

गाल पे गिर आई लट को तर्ज़नी से लपेटतेguru-001
अपनी आँखों की शफक से मेरी पलकों को झपकाते
पूछा था तुमने,
-बहुत दिनों से तुम्हारा लिखा कुछ पढ़ा नहीं
क्या हुआ?
लिखना बंद कर दिया क्या?
क्यों कर दिया?-
चाहा तो बहुत
कह  दूँ
तुम जो नहीं थी…
तुम मेरी प्रेरणा
तुम मेरी कविताओं की  धुरी
तुम जब गयी थी
तब ले गयी थी न
मेरे शब्द
मेरी कलम
मेरी जुबान
मेरे गर्म अहसास
मेरे जीवन का ताप
मेरी साँसों से अपनी महक
मेरे बदन से अपने बदन के  छुअन की दहक
एक बर्फ सी जमी है तब से मेरे वजूद पे
कौन लिख सकता है ठंडी अकड़ी हुयी उँगलियों से?
पिघला दो मुझे अपने आगोश में लेके
रख दो अपने गर्म होंठ मेरे होंठों पे
बदल दो रंग इन का
नीले पड़े होंठो से कविता नहीं निकलेगी
मेरे हाथों को अपने हाथों में लेके
इन्हें इन के ज़िंदा होने का अहसास लौटा दो
अब तुम हो लेकिन शायद
हम दोनों के बीच इस बर्फ के सिवा कोई और भी है
लेकिन सच ये भी है कि
अगर कह पाता तुमसे कुछ
तो ये बर्फ भी नहीं होती
ये तीसरे का अहसास भी न होता
मेरे होंठ नीले न होते
मेरी उंगलियाँ ज़िंदा होती…
(रजनीश)
नवम्बर 8, 2013

चलो एक बार फिर से मिल जाएँ हम

मेरी  सारी  हसरतें…  lovers-001

सारी तमन्नाएँ…

मेरे सारे अरमान…

मेरे सारे सपने

सिल गए हैं …

अस्तित्व से तुम्हारे ही

तुम मेरे शब्-ओ-रोज़ के हर लम्हे में

देखे अनदेखे

ख्वाबों की चलती फिरती तस्वीर हो…

कहे अनकहे लफ़्ज़ों की जिंदा तासीर हो…

मैं शुरू होता हूँ

हर सुबह तुम से…

ख़त्म हो जाता हूँ हर शब तुम में ही…

ढूंढता रहता हूँ तुम्हारे  होठों का स्पर्श…

अपनी उँगलियों  के पोरों  में

तलाशती  रहती हैं आँखें सीने पे

तुम्हारी गर्म साँसों के निशाँ हर लम्हा…

अहसास तुम्हारी छुअन का जिंदा रहता है

मुझमे हर पल…

रखता है मुझे जिंदा हर पल…

आओ

दूरियां समेट दें अपने जिस्मों की हम

संगम हो

मेरे  तुम्हारे वजूद का

ऐसे कि

बहे ज़िन्दगी लहू में फिर से…

वैसे भी तो तुम्हारा प्यार गरम लावे सा

समेटे रखता है मुझे अपने में

बन के चादर गर्म अहसासों  की बिछा रहता है

पूरी तरह मुझ पे …

पूरी पूरी रात …

पूरा पूरा दिन…

(रजनीश)

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