Posts tagged ‘Sire’

जनवरी 6, 2014

यक्ष प्रश्न

यक्ष प्रश्न हैwomanleavingman-001

क्या पागलपन है?

क्यूँ पागलपन है?

यक्ष प्रश्न है…

उत्तर क्या दें?

उत्तर कैसे दें?

उत्तर किसे दें?

अब न तो शब्द बचे हैं

न जुबां रही है

किस भाषा को वो समझेगा?

अब जुबां क्या बदलेगी हमारी?

न उसका दिल बदलेगा…

प्रश्न बहुत हैं …

उत्तर कम हैं

कम क्या ?

कुछ के उत्तर ग़ुम हैं

जाओ दिल पे बोझ न लादो

अपने मन को मत अपराधो

आज से बस तुम इतना जानो

दोष तुम्हारा तनिक नहीं है

अपना दिल तो है ही पागल

उम्र के साथ नहीं चल पाया

अब तक बचपन में जीता है

टूटे चूड़ी के टुकड़ों को

सिरे गला कर फिर सीता है

दुनियादारी नहीं समझता…

तुमसे आगे नहीं देखता

तुम न होती तब भी इसका

हर हाल में होना ये था

पागल था…पागल है

पागल होना था…

सयानों के साए में इसका

दम घुटता है…

Rajnish sign

जनवरी 5, 2014

आतप्त कर छोड़ जाती हो…

बहुत आतप्त कर जाती हो तुमsilentlove-001

मुस्कान तुम्हारी हौले से छू जाती है

मन के तार झंकृत कर के जैसे

मौसमी बयार पत्तों की वीणा बजाये

और चली जाए उन्हें कम्पित छोड़ के

ऐसे ही चली जाती हो तुम

मुझे हर सिरे से बजता छोड़ के

सुलगता और तपता छोड़ के…

कितने प्रश्न तुम तक मुड़ते हैं

कितने स्वप्न तुमसे जुड़ते हैं

हर प्रश्न के…

हर स्वप्न के

अंतिम सिरे…

नहीं नहीं पहले सिरे पे तुम

मध्य तक आते आते…

नेह-दग्ध छोड़ जाती हो तुम

बहुत आतप्त करके मुझे छोड़ जाती हो तुम

कभी जब इंच भर दूर रहता है मधु-कोष मुझसे

मेरे दरकते हुए होंठ जब छूने को होते हैं

हर बार वापिस फेर देती हो क्यूँ?

मुझे यूँ छोड़ देती हो क्यूँ?

Rajnish sign

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