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जनवरी 1, 2015

Ram : The Soul of Time (A Novel) …कुछ झलकियां

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‘सर, मुझे लगता है वह आदमी अभी जिंदा होगा’| मेजर शैलेन्द्र रावत ने कहा|

‘रावत, तुम ऐसा दावे के साथ कैसे कह सकते हो’? कर्नल सिंह ने कहा|

‘सर, मैं एक गढवाली हूँ| मैंने हिमालय में बहुत सी ऐसी गुफाएं देखी हैं जहां योगी और साधू अभी भी साधना किया करते हैं| यह गुफा भी प्राकृतिक गुफा नहीं थी वरन मानव निर्मित थी| यह अवश्य ही साधुओं और तपस्वियों की किसी परम्परा दवारा विकसित गुफा है जो अभी भी साधना के लिए उपयोग में ली जाती है| संन्यासी सदियों से ऐसी गुफाओं का इस्तेमाल करते रहे हैं| हजारों हजार तपस्वियों की साधना से ऐसी गुफाएं ऊर्जा से लबरेज रहती हैं| साधना के इच्छुक साधुओं और योगियों को यहाँ भेजा जाता है ताकि वे एकांत में साधना कर सकें| यदि वह आदमी इस गुफा में कुछ दिन रुका तो ऐसा नहीं हो सकता कि जिस परम्परा की यह गुफा है, उस परम्परा के संन्यासियों को इस बात का पता न चला हो| हो न हो संन्यासी उस व्यक्ति को अपने साथ ले गये होंगे और वह सांसारिक बंधनों से मुक्त्त होकर स्वयं भी संन्यासी बन गया होगा|’

‘शैलेन्द्र, कैसे तुम इतना ठोस दावा कर सकते हो?|

‘सर, मैंने गुफा में धूप बत्ती की राख देखी और लोबान की सुगंध को महसूस किया और मुझे पूरा विश्वास है कि वह आदमी तो अपने साथ धूप लेकर गया नहीं होगा| संन्यासी धूप का प्रयोग करते हैं गुफा के अंदर रोशनी के लिए और यह अंदर की वायु को भी शुद्ध करती है| सूबेदार दीक्षित ने इन् बातों पर ध्यान नहीं दिया किन्तु मैंने ऐसे छोटे छोटे संकेतों पर ध्यान केंद्रित किया| केवल एक बात मेरी समझ में नहीं आई और जो मुझे उसी समय से परेशान कर रहे एही जबसे मैंने गुफा के अंदर पैर रखा था| मेजर रावत ने खोये खोये से स्वर में कहा|

सब लोग शांत होकर मेजर रावत की बात सुन रहे थे, उन सभी को अपनी ओर देखते हुए पाकर, मेजर ने कहा,”सर, गुफा के गीले पथरीले फर्श पर मैंने दो जोड़ी पांवों के निशान देखे| हालांकि गुफा के बाहर पैरों के बहुत सारे निशान थे, पर अंदर केवल दो ही जोड़ी थे| और एक जोड़ी पाँव के निशान असामान्य थे और आकार में काफी बड़े थे| इतने बड़े पैरों के निशान सामान्य मनुष्य के नहीं हो सकते”|

‘तो, तुम कहना क्या चाहते हो?”

‘पता नहीं सर, मैं खुद इस गुत्थी को नहीं सुलझा पा रहा हूँ’|

‘क्या वे किसी जानवर के पंजों के निशान थे?’

‘नहीं सर, जानवर के पंजे के निशान तो बिल्कुल भी नहीं थे| थे इंसानी पाँव के निशान ही, परन्तु बहुत ही बड़े पैरों के निशान थे, और निशान की स्पष्ट छाप बता रही थी कि वे किसी बहुत भारी मनुष्य के पैरों के निशान थे’|

‘ह्म्म्म’|

कुछ देर की खामोशी के बाद जवान मधुकर श्रेष्ठ ने आगे बढ़कर हिचक के साथ कहा,”साहब अनुमति हो तो मैं भी कुछ कहूँ?”

‘जरुर’|

‘साहब, उत्तराखंड और नेपाल में ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी अमर हैं और वे अभी तक हिमालय में विचरण करते हैं| सर, ऐसा कहा जाता है कि जो भी उन्हें देख लेता है वह या तो पागल हो जाता है या मर जाता है| कृपया इसे एक बुढाते व्यक्ति का अंध-विश्वास मान कर नकारिये मत| मुझे विश्वास है कि वे असामान्य पांवों के निशान अवश्य ही हनुमान जी के थे| आज के दौर के मनुष्यों के पांवों के निशान वैसे हो ही नहीं सकते|”

‘क्या ऊलजलूल बात कर रहे हो?’

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‘आह पवित्र वेदों के ज्ञान को मौखिक रूप से अगली पीढ़ी को सौंपने के लिए श्रुति की परम्परा को सुरक्षित करने के लिए एक और शिष्य! लेकिन परिश्रमी मनुष्यों के कठोर परिश्रम को पार्श्व में ढकेल कर देवताओं और उनसे सम्बंधित सर्वथा कर्महीन राजाओं की झूठी महानता का वर्णन क्यों? कथाओं में राजाओं का संबंध ईश्वर से स्थापित करके उन्हें आम जनता की निगाहों में अजेय और अमर बनाकर राजवंशों को अमरता प्रदान करने का षड्यंत्र कब तक चलेगा?’ विश्वामित्र ने क्षुब्ध होकर सोचा|

विश्वामित्र ने धीमे स्वर में पूछा,”चारुदत्त, तुमने यह कहानी कहाँ सुनी?”

“भगवन, ब्रह्म-ऋषि वशिष्ठ के गुरुकुल में”|

विश्वामित्र अपनी निराशा छिपा नहीं पाए और सयंत लेकिन दबे हुए क्रोधित स्वर में बोले,” चारुदत्त, मुझे नहीं पता, वहाँ क्या पढ़ाया जाता है| राज्यों के कोष से चलने वाली शिक्षण संस्थाएं इतिहास का पुनर्लेखन एवं पुनर्पाठ करती हैं क्योंकि यह उनके आश्रयदाता के हितों के अनुकूल होता है| भगीरथ की असली कहानी क्या है, कोई नहीं जनता लेकिन जिसमें मैं विश्वास रखता हूँ , मैं तुम लोगों को वह सुनाता हूँ”|

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“रानी सुमित्रा के दो जुड़वा बेटे हैं, लक्ष्मण और शत्रुघ्न| लक्ष्मण अपनी माँ की तरह है, लाग-लपट से दूर, सीधे सच्चे बोंल बोलने वाला| शत्रुघ्न को राजमहल की ऐश्वर्यपूर्ण जीवन शैली पसंद है पर लक्ष्मण को महल से बाहर का जीवन भाता है| वह तीव्र बुद्धि वाला मेहंताकश इंसान है| अपनी माँ की तरह उसे भी राजा दशरथ की महिलाओं के प्रति कमजोरी, राजा की चापलूसों से घिरे रहने की आदत, और सबसे छोटी रानी कैकेयी के सामने घुटने टेक कर रहने की प्रवृति सख्त नापसंद है| लक्ष्मण के पास सूचना एकत्रित करने का तंत्र विकसित करने की विलक्षण प्रतिभा है| राजसी सेवकों में लक्ष्मण बेहद लोकप्रिय है और वे उसके प्रति बेहद निष्ठावान हैं| एक बार मैंने लक्ष्मण से पूछा कि वे कैसे सेवकों से एकदम सही सूचना निकलवा पाने में सफल रहते हैं, सेवक उनको क्यों इतना पसंद करते हैं ?”|

विनम्र लक्ष्मण ने हँस कर उत्तर दिया,” शायद वे महसूस करते हैं कि मैं उनमें से एक हूँ”|

“मैंने सुना है राम कैकेयी को पसंद नहीं करते”| विशालक्ष ने अँधेरे में तीर छोड़ा|

धरमरुचि ने उसकी ओर ऐसे देखा मानों अनुमान लगा रहा हो कि यह प्रश्न अज्ञानता का फल है या मूर्खता का|

‘नहीं, ऐसा नहीं है| लक्ष्मण से उलट, राम के कैकेयी के साथ अच्छे संबंध हैं| कैकेयी के शुरुआती मानसिक द्वंद को छोड़कर, वे आसानी से राम के ह्रदय में प्रवेश कर गयीं| कैकेयी बेहद सुंदर थीं और उनकी उम्र भी बहुत नहीं थी, राम से हो सकता है छह सात साल ही बड़ी हों, मुझे निश्चित नहीं पता”|

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‘मुनिवर, इसमें क्या हानि है अगर किसी ने पुराना और व्यर्थ पड़ा धनुष तोड़ दिया’? लक्ष्मण ने लापरवाह अंदाज़ में कहा|

क्रोध से उबल कर परशुराम ने अपने विशाल फरसे से वार किया किन्तु लक्ष्मण ने उतनी ही शीघ्रता से फरसे के वार से अपना बचाव कर लिया|

यह सब देख, विश्वामित्र ने आगे बढ़कर परशुराम को चेताया|

‘भार्गव, यह युद्ध स्थल नहीं है| यह राज दरबार है| कृपया इसकी मर्यादा का सम्मान करें| एक बालक के ऊपर फरसे से वार करना आपको शोभा नहीं देता’|

‘पितामह, यदि परम्परा का सम्मान नहीं होगा तो मेरा फरसा हर व्यक्ति को समुचित उत्तर देगा चाहे वह राजा जनक हो या दशरथ का यह युवा पुत्र| आप कृपया मेरे मामले में न पड़ें’|

विश्वामित्र ने परशुराम को शांत करके समझाने का प्रयत्न किया|

राम, आपने यहाँ आने का कष्ट किया| मैं आपके गुस्से को समझ पाने में असमर्थ हूँ| आप एक पुराने धनुष की तुलना परम्परा तोड़ने से कर रहे हैं| क्यों? कृपया इस आयोजन की मूल भावना को समझने का प्रयत्न करें| मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप अपने फरसे का उपयोग धर्म की रक्षा के लिए करें’|

‘कौशिक, जिस किसी ने शिव के महान पिनाकी का अपमान किया है, मैं उसे नहीं छोडूंगा| प्रतीकों की अपनी गरिमा होती है| अगर आप मेरे दुश्मनों के साथ खड़े होंगें तो मैं भूल जाउंगा कि आप मेरे पितामह हैं’|

‘भार्गव आपके दुश्मन कौन हैं? राजर्षि जनक या राम, जिसने कि राक्षसों का संहार किया है कमजोर लोगों की सहायता करने के लिए? ऐसा क्यों है कि रावण जैसे आतंकवादी आपके दुश्मन नहीं हैं?’|

‘कौशिक मेरा ध्यान बंटाने की चेष्टा मत कीजिये| मैं रावण को अपना दुश्मन क्यों मानूं?’

‘क्यों नहीं? आपके लिए शिव भक्ति ज्यादा महत्वपूर्ण है, मासूमों और निर्दोषों के हत्यारों को सजा देने से| क्षमा कीजिये परन्तु आप छिलके की रक्षा कर रहे हैं और फल को सड़ने दे रहे हैं!’

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रात्री में लक्ष्मण ने राम से पूछा,”हनुमान औरों से अलग कैसे हैं, विशेषकर अंगद से? क्या किसी साधारण मानव दवारा ऐसा चमत्कारिक कर्म करना संभव है”?

‘जब एक साधारण मनुष्य चमत्कार करता है तभी वह महान बनता है| लक्ष्मण, हमारा दृष्टिकोण हमें अलग बनाता है| दृष्टिकोण ही हमें प्रेरित करता है, जोखिम उठाने के लिए तैयार करता है, और हमारे निश्चय को दृढ बनाकर, हमें प्रतिबद्ध बनाता है ताकि हम अपने धर्म को जी सकें, अपना कर्म को पूर्णता प्रदान कर सकें|’

अंगद और अन्यों ने क्यों समुद्र पार करने से इंकार कर दिया?’ लक्ष्मण ने पूछा|

‘केवल हनुमान ने असफल होने के भय को किनारे करके आगे बढ़ने का जोखिम उठाया| हरेक के लिए यह कहना आसान था कि वे समुद्र किनारे तक गये पर सीता का कोई सूत्र उन्हें नहीं मिला| कोई भी उनसे प्रश्न नहीं करता| परन्तु लक्ष्मण, लक्ष्य था सीता को ढूँढना| वह थी प्रतिबद्धता| जोखिम उठाने वाला दृष्टिकोण हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है| इससे असीमित ऊर्जा और संभावनाओं का प्रस्फुटन होता है| इसके लिए, फले हमको अपने अंदर से असफल होने की लज्जा बाहर निकालना पड़ता है|

‘क्या सीता को ढूँढने के अभियान के वक्त अंगद का व्यवहार अजीब नहीं था?’

‘कैसे?’ राम ने पूछा|

‘अपने दल के सदस्यों को प्रेरित करने के स्थान पर उसने उन्हें निराश करने की कोशिश की| इसके अलावा उसने सुग्रीव को अपशब्द कहे और युवराज जैसे पद से न कहने वाले वचन कहे|’

‘लक्ष्मण, अंगद के भय असुरक्षा की भावना से उपजे हैं| ऐसा युवा जो कि अपनी संभावनाओं के प्रति शंकालू हो और जो जोखिम लेने में रूचि न रखता हो, वह असफलता से घबराएगा ही| हमें उसे मजबूती प्रदान करनी होगी और उसे आत्मविश्वास से भरना होगा| मैं युद्ध से पहले यह काम करूँगा|’

लक्ष्मण को अपनी ओर देखता पाकर राम ने कहा,”लक्ष्मण, असफलता का भय हमें अपनी पूरी शक्ति से काम करने से रोकता है| एक बात बताओ, क्यों कोई भी वानर इस अभियान पर जाने के लिए तैयार नहीं था? वे सब असफलता से डरे हुए थे, उन्हें शर्म आ रही थी कि अगर वे असफल हो गये तो वे सुग्रीव का या मेरा सामना कैसे करेंगे|’

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मेघनाद ने अपने रथ पर हाथ-पैर बांध कर खड़ी की गई स्त्री को दिखाते हुए गरज कर कहा,” राम यही वह स्त्री है न जिसके लिए तुम युद्ध कर रहे हो| आज मैं तुम्हारे सामने इसका अंत कर देता हूँ”|

ऐसी घोषणा करके मेघनाद ने अपनी तलवार स्त्री के सीने में घोंप दी और दूसरे वार में स्त्री का सिर धड़ से अलग कर दिया| इस वीभात्स्कारी कृत्य ने सभी को स्तब्ध कर दिया| हनुमान ने कूदकर स्त्री के मृत शरीर को हथियाना चाहा पर मेघनाद हनुमान की उम्मीद से ज्यादा तेज गति से अपने रथ को युद्धभूमि से दूर ले गया|

दुखी हनुमान और कुछ अन्य सैनिक रोते हुए राम के पास पहुंचे| कुछ पल के लिए राम भ्रमित हो गये और फिर धीरे से धरा पर बैठ गये|

‘क्या तुम्हे विश्वास है वह सीता ही थी?’ राम ने मंद स्वर में पूछा|

स्तब्ध हनुमान के कंठ से स्वर न निकला पर उसने सिर हिलाकर अनुमोदन किया|

राम को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ|

विभीषण भाग कर आया और कहा,” राम, यह सब माया का खेल है, इसके जाल में मत फंसना| युद्ध के बीच में हारते हुए दुश्मन पर क्यों भरोसा किया जाए? राम, रावण और उसका पुत्र दोनों मायाजाल के स्वामी हैं| हनुमान भी घटना का अनुमोदन करें तो भी मैं विश्वास नहीं कर सकता कि सीता को ऐसे मारा जा सकता है| राम, भावनाओं को अलग रख कर सोचो, रावण सीता को क्यों मारेगा?”

लक्ष्मण को विभीषण की बात पर भरोसा नहीं हुआ,” विभीषण, वह क्यों ऐसा नहीं करेगा? रावण पहले ही अपनी आधी से ज्यादा सेना, अपने भाई और बहुत सारे करीबी रिश्तेदारों की आहुति इस युद्ध में दे चुका है| यह बदला है| यदि वह हार भी गया तो वह हमें सीता को वापिस क्यों करेगा?”

लक्ष्मण, मैं रावण को आपसे ज्यादा जानता हूँ| रावण एक अहंकारी राजा है और उसके अहं को जो पोषित करे उसे वही काम और रास्ते भाते हैं| सीता को मारने का विकल्प उसके लिए कभी मायने नहीं रख सकता, क्योंकि ऐसा करने से उसके दिमाग में उसके अपने बारे में सर्वश्रेष्ठ योद्धा, सर्वश्रेष्ठ राजा, और धरती पर जन्में सर्वश्रेष्ठ पुरुष की छवि खंडित हो जायेगी| राम, ऐसा आदमी मेघनाद को सीता को युद्धस्थली पर लेकर आने की अनुमति क्यों देगा? और मेघनाद रावण से जुड़े किसी भी मामले में अपनी तरफ से कोई भी निर्णय नहीं लेगा|

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(मूल अंग्रेजी से अनुवादित)

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जुलाई 23, 2010

मुल्ला नसरुद्दीन: दो उपलब्धियों वाली दास्तान

युगों युगों से महान हिमालय पर्वत श्रंखला के साये में रहने वाले लोग जानते हैं कि उनके आदि पुरुष, देवों में श्रेष्ठतम स्थान पाने वाले शंकर महादेव कितने भोले थे, उन्हे तो भोले शंकर के नाम से भी जाना जाता है। मुल्ला नसरुद्दीन में भी यही भोलापन कूट कूट कर भरा था। भोले शंकर से मिलते जुलते कई गुण उनमें थे।

रावण द्वारा रचित शिव-ताण्डव-स्त्रोत को वे बहुत पसंद करते थे और उसे पूरे भाव से गाते भी थे और नाचते भी थे। उनके गायन को सुन और नृत्य को देख पाने वाले चुनींदा अतिभाग्यशाली मित्र दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते थे। कुछ होने लगता था सबको।

उनके करीबियों को इस बात का पता था कि जब वे करीब पैंतीस साल के थे तो उनके एक परिचित, जिनका बहुत योगदान था पर्वतों से घिरे एक स्थान पर एक खूबसूरत से विश्वविद्यालय की शुरुआत करने में, ने उन्हे उस विश्वविद्यालय में पढ़ाने के लिये राजी कर लिया था। नसरुद्दीन उनका बेहद सम्मान करते थे अतः उन्हे राजी होना पड़ा परंतु वे राजी हुये इस शर्त पर कि वे किसी भी तरह का वेतन न लेंगे छात्रों को पढ़ाने के लिये। उन्होने कहा कि छात्रों को विद्या देकर धन न कमायेंगे, आजीविका के और बहुत सारे साधन हैं। विवाह उन्होने तब तक किया नहीं था और उनके मुताबिक एक अकेली जान को कितना पैसा चाहिये जीने के लिये? वे विवाह के खिलाफ न थे, पर जो काम वे करते थे और बाकी की जिन्दगी में उन्हे करने थे उनकी प्रकृति को देख कर उन्हे लगता था जिससे भी उनका विवाह होगा वह अकारण कुछ परेशानियाँ झेलेगी। मजाक करते हुये वे कहते थे कि वे भी बजरंग बली की तरह पचास साल तक ब्रह्मचर्य को साधना चाहते थे। हालाँकि कुछ साल बाद अड़तीस साल की आयु में उनका विवाह हुआ। कैसे हुआ, किन परिस्थितियों में हुआ, वह कथा किसी और दिन के लिये मुनासिब है।

बहरहाल, विश्वविद्यालय में पढ़ाने से इतना हुआ कि एक तो उन्हे अपनी रुचि के विषयों में शोध करने के लिये एक व्यवस्थित रास्ता मिल गया और बाद में तो वे एक घुमंतु अध्यापक बन गये। आज यहाँ ज्ञान बाँट रहे हैं तो कल किसी और जगह। विभिन्न विश्वविद्यालयों में अनेक मित्र बने, अनगिनत शिष्य और प्रशंसक बने। उनके घनघोर प्रशंसकों और शिष्यों में से एक थे शांतनु।

वे दसवीं में ही रहे होंगे जब उनके माता पिता का देहांत एक दुर्घटना में हो गया था। उनके सामने बहुत मुश्किलें आयीं पर मेहनत, सूझबूझ और अपनी प्रतिभा के दम पर पायी छात्रवृत्ति के बलबूते वे पढ़ते रहे। संयोग से उन्हे बाबा नसरुद्दीन की छत्रछाया मिल गयी।

शांतनु ने नसरुद्दीन के मार्गदर्शन में डाक्टरेट की और बाद में उनकी ही छत्रछाया में उपनिषदों पर बहुत शोध किया और एक सूक्ति ने उन्हे जीवन भर के लिये काज दे दिया। उपनिषद का वह वाक्य था,

अज्ञान तो अंधकार में रखता ही है, ज्ञान उससे भी बड़े अंधकार में धकेल सकता है“।

ये वाक्य उन्हे रात दिन कचोटता और इस एक वाक्य ने उन्हे एक सजग विधार्थी और शोधार्थी बना दिया।

बाद में शांतनु भी एक अन्य विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे। कुछ साल गुजर गये।

इस बीच शांतनु कुछ साल के लिये अमेरिका भी रह आये एक अमेरिकन विश्वविद्यालय के निमंत्रण पर। वे जाना नहीं चाहते थे और उन्होने नसरुद्दीन से सलाह की तो उन्होने कहा कि जाओ बरखुद्दार उधर की दुनिया भी तो देख आओ। जाने से कुछ अरसा पहले ही उनका विवाह भी सम्पन्न हो गया|

जब शांतनु अमेरिका में ही थे तो वहाँ उन्हे एक अन्य भारतीय प्रोफेसर मिले जो कि उनकी तरह ही कुछ समय के लिये वहाँ पढ़ाने के लिये गये हुये थे। प्रोफेसर साब की पत्नी भी उनके साथ थीं और शांतनु की पत्नी और उनमें परदेस में खूब छनने लगी। बच्चे प्रोफेसर साब के थे नहीं। आयु उनकी इकतालिस बयालिस के आसपास ही होगी उस समय, उनकी पत्नी उनसे कोई दसेक साल छोटी थीं।

यूँ तो वे विद्वान थे पर उनमें कुछ सनकें भी थीं। उन्हे अपना तखल्लुस रखने की सनक थी। तखल्लुस तो बहुत लोग रखते हैं पर इन साहब के साथ दिक्कत ये थी कि ये अब तक कम से तीन तखल्लुस बदल चुके थे। उन दिनों वे हिन्द्स्तानी शायरी पर शोध कर रहे थे और उलझन में थे कि क्या तखल्लुस रखें। उनके सामने बहुत सारे विकल्प मौजूद थे।

मीर की शायरी की तर्ज पर अपना तखल्लुस रखें “तीर” कयोंकि बकौल उनके मीर की शायरी एक तीर की तरह सुनने वाले के ह्र्दय में प्रवेश कर जाती है और वह मीरमयी हो जाता है। अमीर खुसरो का काव्य उन्हे “प्रेम” कहकर पुकार रहा था तो गालिब शरारत कर रहे थे कि मियाँ “विद्रोही” हो जाओ| मजाज़ पेश कर रहे थे उन्हे “मिजाज़“।

शायरी की बात हो तो नसरुद्दीन का जिक्र शांतनु को करना लाजिमी था, आखिरकार नसरुदीन ठहरे शायरी के बहुत बड़े कद्रदानों में से एक। शांतनु ने प्रोफेसर से बातचीत करते वक्त्त अपने गुरु नसरुद्दीन के शायरी के प्रति प्रेम को बताया और उनकी विद्वता का बखान भी किया और बखान इतना किया कि प्रोफेसर के दिल में नसरुद्दीन के दर्शन करने की तलब हिलोरे मारने लगी।

उस समय भारत के शायरों पर काम कर रहे प्रोफेसर को कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। खासकर मजाज़ पर शोध करने में उन्हे कठिनाइयाँ आ रही थीं। शांतनु ने उन्हे बताया कि गुरुदेव नसरुद्दीन उनकी सहायता कर सकते हैं। प्रोफेसर साब खिल उठे उन्होने हाथ पकड़ लिये शांतनु के कि तुरंत खत लिखो अपने गुरु को। दिल में कहीं उनके नसरुद्दीन को आजमाने की बात भी थी कि जरा देखें इन नसरुद्दीन साहब का दम खम।

कुछ ही दिन बाद शांतनु को एक बड़ा सा पैकेट पार्सल द्वारा मिला। अपने लिये भेजे गये व्यक्तिगत सामान को निकाल उन्होने प्रोफेसर को नसरुद्दीन द्वारा भेजे गये कागजात दे दिये। प्रोफेसर सारी रात सो नहीं पाये। डिनर करने के बाद नसरुद्दीन द्वारा भेजी गयी सामग्री पढ़नी शुरु की तो कब रात बीती उन्हे पता ही नहीं चला, जब सुबह के सूरज ने अपनी लालिमा से खिड़की के शीशों की मार्फत अंदर आकर कमरे के बाकी स्पेस और साजो सामान को जगा दिया तब उनका ध्यान भंग हुआ।

“कमाल कर दिया गुरु” बड़बड़ाते हुये वे कुर्सी से उठे और एक भरपूर अंगड़ायी लेकर वे तैयार होने चले गये। शांतनु से मिलते ही उन्होने घोषणा कर दी कि वे भी आज से उनके गुरु नसरुद्दीन के मुरीद और शिष्य हो गये हैं और उन्होने तय कर लिया है कि भारत लौटते ही चल रहे शोध कार्य से इतर वे हिन्दुस्तानी शायरी पर एक किताब भी लिखेंगे जो नसरुद्दीन को समर्पित होगी। उन्होने भावविभोर होकर नसरुद्दीन को एक लम्बा सा आभार पत्र लिख भेजा और उसमें भी उन्होने अपने द्वारा उनके शिष्य होने की घोषणा लिख भेजी और उनसे प्रार्थना की कि वे भी उन्हे शिष्य रुप में स्वीकार करें।

अमेरिका से लौटने के कुछ अरसे बाद संयोग कहिये या प्रोफेसर साब के प्रयास, वे भी शांतनु के विश्वविद्यालय में आ गये पढ़ाने। उन्होने दो शोध छात्रों को शायरी पर चल रहे अपने शोध कार्य से जोड़ लिया। भारत आते ही वे नसरुद्दीन से मिलना चाहते थे पर संयोग ऐसा बैठा कि शांतनु और प्रोफेसर के अमेरिका से लौटने से पहले ही नसरुद्दीन चले गये तजाकिस्तान और वहाँ से उन्हे तुर्की जाना था। वे खुद रुमी पर शोध कर रहे थे उन दिनो और इसी सिलसिले में वे दो साल के लिये बाहर चले गये थे। मजाज़ पर शोध के संदर्भ में प्रोफेसर साब उनसे नियमित पत्र व्यवहार करते रहे और नसरुद्दीन भी पत्रों के द्वारा ही उनका मार्ग दर्शन करते रहे। जहाँ भी नसरुद्दीन कहते प्रोफेसर अपने दोनों दोनों शोधार्थियों को वहाँ भेज देते। काम बड़ी तन्मयता से चल रहा था।

नसरुद्दीन के वापिस आने से कुछ अरसा पहले ही प्रोफेसर साब ने शोध कार्य खत्म कर दिया और एक किताब भी तैयार कर दी। प्रोफेसर साब तो नसरुद्दीन को भी सहलेखक के रुप में शामिल करना चाहते थे पर नसरुद्दीन ने विनम्रता पूर्वक मना कर दिया। प्रोफेसर ने किताब को छपवाने के लिये नहीं भेजा, उन्होने कहा कि नसरुद्दीन आयेंगे और पांडुलिपी का ही विमोचन करेंगे और किताब का नाम तय करेंगे और उनसे मूल पांडुलिपी पर ऑटोग्राफ लेकर ही उसे छपने के लिये प्रेस में भेजा जायेगा।

सारा कार्यक्रम उन्होने शांतनु के साथ मिल कर तय कर दिया कि भारत आते ही नसरुद्दीन वहाँ आयेंगे और पांडुलिपी का विमोचन करेंगे। नसरुद्दीन को मानना पड़ा और पत्र द्वारा उन्होने स्वीकृति और भारत वापसी का अपना कार्यक्रम भेज दिया।

आज का किस्सा सीधे उनके द्वारा की गयी किसी कारगुजारी से सम्बंधित नहीं है पर वे भी उस घटना के एक महत्वपूर्ण पात्र थे।

संयोग अगर संयोग ही उत्पन्न न करें तो उन्हे संयोग ही क्यों कहा जाये? इधर प्रोफेसर साब का शोध पूरा हुआ, पांडुलिपी तैयार हुयी और उधर प्रोफेसर की पत्नी की कोख से भी एक कृति का जन्म हो गया और उन्होने एक पुत्र को जन्म दिया। प्रोफेसर तो नहीं परंतु उनकी पत्नी ग्रह नक्षत्र को बहुत मानती थी। उनके विवाह के लगभग दस ग्यारह साल बाद उन्हे संतान की प्राप्ति हुयी थी सो वे किसी किस्म का कोई रिस्क लेना नहीं चाहती थी। बच्चे के जन्मते ही उसकी जन्मकुंडली बनवाने का इंतजाम उन्होने अस्पताल जाने से पहले ही कर दिया था और ऐसा ही हो भी गया। परंतु दिक्कत ये आ गयी कि पंडित ने घोषणा कर दी कि बालक ने ऐसे नक्षत्रों में जन्म लिया है कि बालक की माता के मातापिता भाई बहन आदि बच्चे को तीन माह तक न देखें। पर दिक्कत ये थी कि प्रोफेसर की पत्नी के परिवार में पीढ़ियों से रिवाज चला आ रहा था कि नवजात शिशु का नामकरण बच्चे का नाना या अगर वह जीवित नहीं है तो बच्चे का मामा करेगा। अगर दोनों ही जीवित नहीं हैं तो जिसे भी बच्चे की माता दिल से अपने पिता या भाई स्वरुप मानती है वह यह कार्य करेगा। और बड़ी दिक्कत यह आयी कि पंडित ने आगे कहा कि बच्चे का नामकरण दो माह के अंदर करना बहुत जरुरी है और जो भी बच्चे का नामकरण करेगा उसे बच्चे के जन्म के बारे में कुछ मालूम नहीं होना चाहिये और बच्चे को एकदम से उसके सामने लाया जाना चाहिये और उसे कुछ ही क्षणों में एक सुयोग्य नाम बच्चे को देना चाहिये।

प्रोफेसर इन सब ग्रह नक्षत्रों की बातों को नहीं मानते थे पर पत्नी को नाहक नाराज भी नहीं करना चाहते थे। नसरुद्दीन वहाँ आ ही रहे थे सो प्रोफेसर की पत्नी और शांतनु की पत्नी ने भी तय कर लिया कि नसरुद्दीन के आने के अवसर पर ही बच्चे के जन्म की खुशी का समारोह आयोजित किया जाये और नसरुद्दीन ही बच्चे का नामकरण भी करें। पर ये बात दोनों ही स्त्रियों ने प्रोफेसर को न बतायी और साथ ही साथ शांतनु को भी विवश कर दिया कि यह बात प्रोफेसर को न बतायी जाये।

प्रोफेसर अपनी पुस्तक की पांडुलिपी के विमोचन की तैयारी में व्यस्त थे पर इसी बीच उपकुलपति के आदेशानुसार उन्हे एक सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिये कुछ दिनों के लिये बम्बई जाना पड़ गया और अब उन्हे उसी दिन वापिस आना था जिस दिन नसरुद्दीन का वहाँ पधारने का कार्यक्रम था। प्रोफेसर ने अपनी पत्नी को निमंत्रण पत्र का मसौदा और किसे किसे निमंत्रण भेजना है, उन सब नामों की लिस्ट दे दी और कहा कि शांतनु और उनके छात्रों की सहायता से वे निमंत्रण पत्र छपवा कर सबको भेज दें। वे नसरुद्दीन के समारोह में आगमन को एक यादगार घटना बनाना चाहते थे। उनके जाने के बाद प्रोफेसर की पत्नी ने किताब के विमोचन के निमंत्रण पत्र को बच्चे के जन्म की खुशी में आयोजित समारोह का निमंत्रण पत्र बना कर सब लोगों को भिजवा दिया। वैसे लगभग सारे नाम तो उन्ही परिचितों के थे, जिन्हे चाहे किसी भी कारण से बुला लो। अतिथियों को भी इस बात का अहसास था कि प्रोफेसर और उनकी पत्नी को निस्संदेह बहुत ज्यादा खुशी होगी विवाह के इतने साल बाद संतान प्राप्ति से। आखिर उनका आँगन भी बच्चे की किलकारियों से गूँजेगा।

नियत दिन आ गया। नसरुद्दीन तो पहुँच गये। शांतनु उन्हे स्टेशन से ले आया और उन्होने बच्चे के नामकरण की रस्म भी विधिवत अदा कर दी और बच्चे को नाम दिया “पुलकित”।

समारोह में अतिथिगण आने लगे पर प्रोफेसर साब न पहुँच पाये थे, रेलवे स्टेशन पर पता किया गया तो पता चला की गाड़ी कुछ देरी से आयेगी।

उधर प्रोफेसर साब भी इस चिंता में घुले जा रहे थे कि नसरुद्दीन वहाँ पहुँच गये होंगे और वे अभी भी रेल में ही हैं। जाने क्या सोचते हों नसरुद्दीन? उन्होने उपकुलपति को थोड़ा कोसा।

ऐसे ही बैचेनी में भरे वे रेल के स्टेशन पर पँहुचने का इंतजार करते रहे और जैसे ही रेल स्टेशन पर पँहुची वे गाड़ी के रुकने से पहले ही रेल के डिब्बे से बाहर प्लेटफॉर्म पर कूद पड़े और तीर की तरह बाहर की ओर भागे। टैक्सी लेकर वे फौरन से पेश्तर घर पँहुचे।

उनका ही इंतजार हो रहा था। घर पँहुचते ही वे सबसे पहले नसरुद्दीन से मिले। उनकी पत्नी ने उन्हे याद दिलाया कि मेहमान कितनी देर से इंतजार कर रहे हैं उनके आने का।

प्रोफेसर ने हाथ मुँह धोकर वस्त्र बदले और अपनी लिखी पुस्तक की पांडुलिपी लेकर वे घर के बाहर ही स्थित समारोह स्थल पर पँहुच गये। लोगों ने ताली बजाकर उनका स्वागत किया।

प्रोफेसर के हाथों में हल्के लाल रंग के रेशमी वस्त्र में लिपटी पांडुलिपी थी। वे नसरुद्दीन, अपने छात्रों और शांतनु को लेकर मंच पर चले गये जहाँ उनकी पत्नी नवजात शिशु को गोद में लिये बैठी थी और पास ही शांतनु की पत्नी भी खड़ी थी। प्रोफेसर ने सबको शांत रहने के लिये अपना एक हाथ उठाकर इशारा किया सब उनकी तरह देखने लगे।

प्रोफेसर ने बोलना शुरु किया।

आज मेरी जिंदगी का बहुत अहम दिन है। आज हमारे बीच शांतनु के गुरु नसरुद्दीन जी मौजूद हैं। उनकी उपस्थिति मुझे कितनी खुशी दे गयी है मैं उसका वर्णन नहीं कर पाऊँगा और आप लोग शायद अनुमान न लगा पायेंगे। उनकी यहाँ उपस्थिति एक बहुत महत्वपूर्ण काम की परिणति होने के परिणामस्वरुप संभव हो पायी है अतः मेरा फर्ज बनता है कि मैं उस महत्वपूर्ण काम पर कुछ प्रकाश डालूँ।

लोगों ने तालियाँ बजानी शुरु कर दीं। वे तो समझ रहे थे कि जैसे उन्हे बच्चे के जन्म की खुशी बाँटने के लिये आमंत्रित किया गया है वैसे ही नसरुद्दीन भी निमंत्रण पर आये होंगे।
प्रोफेसर लोगों को शांत करते हुये आगे बोले।

कई बरसों से मैं जिस काम में लगान हुआ था वह अपनी परिणति को पँहुच गया है। मेरे गुरु नसरुद्दीन ने इतना मेरा मार्गदर्शन किया है इस कठिन कार्य को सम्पन्न करने में कि मैं ताउम्र उनका शुक्रगुजार रहूँगा। आज वे उस कृति को अपने आशीर्वाद से सुशोभित करने आये हैं जिसका जन्म ही उनके आशीर्वाद से सम्पन्न हो पाया है।

लोग नसरुद्दीन की तरह कौतुहल की दृष्टि से देखने लगे। उन्हे नसरुद्द्दीन कोई पीर या संत लगे। प्रोफेसर लोगों का ध्यान नसरुद्दीन की तरफ देख कर बहुत प्रसन्न हुये और उन्होने कहा।

मैं बहुत ज्यादा आभारी हूँ डा. शांतनु का जिन्होने मुझे गुरु के सम्पर्क में लाने का सौभाग्य प्रदान किया। यह उनका कर्ज रहा मुझ पर। अब तो वे मेरे गुरुभाई हैं।

अपने दोनों छात्रों को स्नेहमयी दृष्टि से देखकर मुस्कुराते हुये उन्होने कहा।

उम्र अपना असर दिखाती है और मेरे लिये इतना कठिन कार्य करना संभव न हो पाता यदि ये दो नौजवान अपनी भरपूर शक्ति, लगन और मेरे प्रति भक्ति से इस कार्य को पूरा करने में मेरी सहायता न करते। इन्होने दिन देखा न रात, जब भी मुझे इनकी जरुरत पड़ी ये उपस्थित रहे। इनके कठिन परिश्रम की बदौलत ही यह कार्य सम्पूर्ण हो पाया है। मैं इनके उज्जवल भविष्य़ को साफ साफ देख पा रहा हूँ।

बच्चे के जन्म के अवसर पर आयोजित समारोह में प्रोफेसर और उनकी पत्नी की खुशी में सम्मिलित होने आये अतिथिगण थोड़े भौचक्के से खड़े प्रोफेसर, नसरुद्दीन और प्रोफेसर के छात्रों को देख रहे थे। कुछ मुस्कुरा भी रहे थे।

खैर उन सबको अनर्गल लगने वाले प्रोफेसर के भाषण का रहस्य तब खुल ही गया जब प्रोफेसर ने रेशमी कपड़े में बंधी पांडुलिपी बाहर निकाली पर उन क्षणों की कल्पना ही की जा सकती है जब अतिथि प्रोफेसर के भाषण को बच्चे के जन्म से सम्बंधित समझ रहे थे और प्रोफेसर यह सोचकर बोल रहे थे कि सब अतिथि उनकी पुस्तक की पांडुलिपी के विमोचन के अवसर पर वहाँ एकत्रित हुये हैं।

किस्सा बहुत साल तक विश्वविद्यालय में हास्य उत्पन्न करता रहा।

…[राकेश]

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