Posts tagged ‘Shiv’

जनवरी 1, 2015

Ram : The Soul of Time

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मानव जाति का इतिहास गवाह है कि अच्छाई और बुराई एक साथ नहीं रह सकते, स्वतंत्रता और साम्राज्यवाद एक साथ नहीं रह सकते, अच्छी और बुराइयों से ग्रस्त सभ्यताओं में टकराव अवश्यंभावी है, इसे कोई कभी नहीं टाल सका और कभी कोई टाल भी नहीं सकेगा| हमेशा ही अच्छाई और बुराई आपस में टकराये हैं| बुराई कुछ समय के लिए जगत पर छा गयी प्रतीत होती है पर उसे हराने के लिए अच्छाई पनप ही जाती है| साधारण मनुष्य अच्छाइयों और बुराइयों का मिश्रण है और जीवन भर उसके अपने अंदर इन् दो प्रवृत्तियों के टकराव चलते ही रहते हैं| ऐसे महापुरुष भी हर काल में होते आए हैं जिन्होने बहुत कम आयु में ही अपने अंदर अच्छाई को बढ़ावा दिया और जो अपने अंदर की बुराई को पराजित करते रहे|

इन् महामानवों में भी सर्वश्रेष्ठ किस्म के मनुष्य हुए जिन्होने अपने अंदर की बुराई पर ही विजय प्राप्त नहीं की वरन जगत भर के मनुष्यों को अच्छाई की राह दिखाने के लिए बाहरी जगत में बेहद शक्तिशाली बुरी शक्तियों से टक्कर ली, नाना प्रकार के कष्ट सहे पर वे मनुष्यों के सामने अच्छाई को स्थापित करके ही माने| इन् सर्वश्रेष्ठ महामानवों में कुछ को ईश्वर का अवतार भी मनुष्य जाति ने माना| इनमें से जिन महामानवों ने ध्येय की प्राप्ति के लिए साधन की पवित्रता पर विशेष जोर दिया उनमें राम का नाम बहुत महत्व रखता है| इसी नाते उन्हें मर्यादा पुरुषोतम राम कह कर भी पुकारा जाता है|

सदियों से हर काल में राम-कथा मनुष्य को आकर्षित करती रही है और भिन्न-भिन्न काल में भिन्न-भिन्न रचनाकारों ने रामकथा को अपने नजरिये से जांचा परखा और प्रस्तुत किया है| राम को ईश्वर मान लो और रामकथा को सार रूप में ग्रहण कर लो तो बात आसान हो जाती है कि राम तो ईश्वर के अवतार थे, सब कुछ स्क्रिप्टेड था और तब राम के जीवन से एक दूरी बन जाती है क्योंकि जन्म के क्षण से ही वे अन्य मनुष्यों से अलग समझ लिए जाते हैं और केवल भक्ति भाव से ही मनुष्य उनके जीवन के बारे में जानते हैं पर इन सबमें राम की वास्तविक संघर्ष यात्रा अनछुई और अनजानी ही रह जाती है|

पर वास्तविकता तो यह नहीं है, मनुष्य रूप में जन्मे राम को जीवनपर्यंत विकट संघर्षों और कष्टों से गुजरना पड़ा| किसी भी काल में सत्ता निर्ममता, क्रूरता और तमाम तरह के हथकंडों के बलबूते चलाई जाती रही है और जहां सत्ता के दावेदार एक से ज्यादा हों वहाँ हमेशा षड्यंत्र होते ही रहते हैं| राम के पिता दशरथ ने अपने जीवन को और अपने राज्य को जटिल समस्याओं में उसी वक्त बांध दिया था जब उन्होंने तीन विवाह किये और तीसरा विवाह अपने से बेहद कम उम्र की कैकेयी के साथ किया| इन् परिस्थितियों में अयोध्या का राजमहल षड्यंत्रों से परे रहा होगा यह मानना नासमझी का सबब ही बन सकता है|

राम कोई एक दिन में नहीं बन जाता, बचपन से उनका जीवन तमाम तरह के संघर्षों से गुजरकर निखरता रहा| अपनी खूबियों को निखारते हुए वे कमजोरियों पर विजय प्राप्त करके ऐसे बने जिस रूप में कि दुनिया उन्हें जानती है|

राम के जीवन पर आधारित हाल ही में अंग्रेजी में प्रकाशित नया उपन्यास “Ram The Soul Of Timeरामकथा को बेहद रोचक अंदाज में प्रस्तुत करता है और रामकथा के कई अनछुए पहलुओं को प्रकाश में लाता है| यह उपन्यास “राम” की सर्वकालिक प्रासंगिकता को स्थापित करता है| आधुनिक काल में अँधेरे की ओर तेजी से अग्रसर मानवता को राम जैसे एक प्रेरणादायक वैश्विक नेता के मार्गदर्शन की ही जरुरत है जो हर मुसीबत का सामना वीरता, संकल्प और बुद्धिमानी के साथ करे और जो लक्ष्य प्राप्ति के लिए साधनों की पवित्रता से समझौते न करे और आदर्श के सच्चे और पवित्र रूप को स्थापित करे|

उपन्यास में “रामकथा” बड़े ही रोमांचक माहौल में जन्मती है| कुछ अरसा पहले उत्तराखंड में मनुष्य की लोलुपता ने प्रकृति को इतना परेशान किया कि ऊपर पहाड़ों पर चहुँ ओर विनाश बरपने लगा| विनाश के तांडव में घिरे हुए एक अकेले पड़ चुके मनुष्य का, जिसे नहीं पता कि वह जीवित रहेगा या नहीं और अगर जीवित रहा भी तो कितने दिन, विज़न है यह रामकथा| मृत्यु के सामने खड़े इस मनुष्य की अंतरात्मा की आवाज है यह रामकथा|

भ्रष्ट और उपभोक्तावादी राक्षसी सभ्यता को दुनिया भर की सिरमौर सभ्यता बनाने का संकल्प रखने वाले राक्षसराज रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण किया इसलिए राम ने रावण के साथ युद्ध किया, ऐसी धारणा बहुत से लोग रखते हैं| यह उपन्यास इस धारणा को पूरी तरह से नकारता है और स्थापित करता है कि अच्छाई की तलाश कर रहे राम का संघर्ष बुराई को जगत में स्थापित करते जा रहे रावण से होना ही था, चाहे वह किसी भी तरीके से होता| वनवास के तेरह सालों में “राम” एक एक कदम बुराई के खिलाफ उठा आगे बढ़ रहे थे| रावण का साम्राज्यवाद पनप ही नहीं सकता था राम के रहते| रावण को राम को अपने रास्ते से हटाना ही था अगर उसे पूरी दुनिया पर अपना राज कायम करना था|

उपन्यास दर्शाता है कि ऋषि विश्वामित्र पृथ्वी पर अच्छाई और, और अच्छी, मानवीय और विकास वाली सभ्यता की स्थापना करने के अपने यज्ञ में कर्म की आहुति डालने के लिए पृथ्वी पर सर्वथा योग्य राम का चयन करते हैं और उनका सपना राम की प्राकृतिक प्रवृति से मिलकर राम के लिए एक ध्येय बन जाता है|

राम के जीवन पर सीता की अग्नि परीक्षा, गर्भवती सीता को वनवास और एक शम्बूक नामक शूद्र को वेद सुनने पर दण्डित करने के आरोप लगाए जाते हैं|

यह उपन्यास सीता की अग्नि परीक्षा को बिल्कुल नये तरीके से संभालता है और जो ज्यादा वाजिब लगता है और यह भाग किताब की सबसे बड़ी उपलब्धि भी कहा जा सकता है| यह उपन्यास राम दवारा विभीषण को लंका का राजा बनाने के साथ समाप्त हो जाता है|

आशा है लेखक अपने अंदाज वाली “रामकथा” का दूसरा भाग लिखेंगे और उसमें सीता को वनवास और शम्बूक प्रकरण की व्याख्या अपने अनुसार करेंगे|

रामकथा” में इच्छुक लोगों को यह उपन्यास अवश्य पढ़ना चाहिए|

Novel – Ram The Soul Of Time

Author – Yugal Joshi

Pages – 479

Publisher – Har Anand Publications Pvt. Ltd (Delhi)

info@haranandbooks.com, haranand@rediffmail.com

अप्रैल 2, 2014

कहो बनारस कैसे हो अब?

कहो बनारस कैसे हो अब?

कैसी हैं लंका की गलियां
दशाश्वमेध का हाल है क्या?
हत्यारे के अभिषेक को गंगाजल तैयार है क्या?
बिस्मिल्ला की शहनाई क्या अब भी बजती है वैसे ही
क्या अब भी हर हर की ध्वनि सुन सब भोले को ही भजते हैं?
क्या अब भी छन्नू मिसिर के शिव नचते हैं मस्त मसानों में?

यह नमो नमो का नारा सुनकर डर तो नहीं लगा तुमको?
ठीकठाक तो है न सब?
कहो बनारस कैसे हो अब?

नींद रात को आती तो है?
कहीं स्वप्न में दंगों वाली आग का धुआँ भरा तो नहीं?
कहीं उम्मीदों वाला सपना इन नारों से मरा तो नहीं?
कहो आज तो कह लो जाने कल ये मौक़ा मिले ना मिले
कहीं सूर्य की पहली किरण में कोई अन्धेरा भरा तो नहीं?

कह दो प्यारे
फिर जाने तुमसे अब मिलना हो कब
कहो बनारस कैसे हो अब?

देखो कैसे डर का बादल घिरता आता है
देखो कैसे गर्जन तर्जन से एक सन्नाटा छाया है
देखो कैसे घर घर में उठती जाती हैं दीवारें
देखो कैसे रंग बदलती गिरगिट सर पे नाच रही है
देखो कैसे एक अन्धेरा धूप निगलता निकल पड़ा है
देखो अजाने डरी हुई हैं और मुअज्जिन डरा हुआ है
कालिख का रंग उनके भोर के सपनों तक में भरा हुआ है

कैसी रंगत रात ने बदली
दिन ने बदले कैसे ढब
कहो बनारस कैसे हो अब?

छोडो प्यारे ऐसा भी क्या चलो घाट पर चलते हैं
खोलो चुनौटी ताल बजाओ मिलकर सुरती मलते हैं
तुम भी यार ग़ज़ब हो ऐसे भी क्या सब मिट जाता है?
अपनी ताक़त इतनी भी क्या कम आगत की पदचाप सुनो
जो आया है धूमधाम से जाएगा चुपचाप सुनो
सुनो मेरी जां चौखम्भे और विश्वनाथ की आवाज़ सुनो

हाथ मिलाओ, साथ में आओ
मिलकर साथ चलेंगे सब
कहो बनारस कैसे हो अब?

(सुखपाल सिंह)

अक्टूबर 3, 2010

ध्वनियाँ …. (कविता- कृष्ण बिहारी)

एक नाद है
जो गूँजता है
मुझमें डमरु की तरह शिव के।

मुझे मिलती हैं ध्वनियाँ
करती रहती हैं मेरा निर्माण अहर्निश।

मुझमें गूँजती हैं मेरे गाँव की नदी
और मेरे शहर की हर छटपटाहट।

मेरा शहर मजदूरों का शहर है
गाँव और शहर
दोनों जानते हैं अच्छी तरह हर कदम यह
कि जिस दिन वे मेरी स्मृति बनेंगे
बढ़ जायेगा मेरा अधूरापन और।

मेरी आवाज उनके कानों में उतरती है
मंदिर की घंटियों- सी
वे पुकारते हैं मुझे शंख ध्वनि बनकर
इस अपनेपन के आगे बौनी लगती है हर उपलब्धि
जैसे कोई जहाज शोर मचाता
हवाओं में गुम हो जाये
गायब हो जायेंगी उपलब्धियाँ छायाओं- सी
सिनेमा का परदा हो जायेगा
मध्यांतर- सा कोरा।

मुझे रहना है ध्वनियों के साथ
सुनना है शिव के डमरु की तड़क
महसूसना है समय की शक्ति को
छोड़ने हैं शब्द
करनी है रचना ईश्वर की तरह
निभाना है कवि-धर्म।
अपनी यात्राओं में
पार करने हैं अनगिनत दुर्गम रास्ते
होना है एक दिन मुझे शेरपा तेनजिंग
अपने हिमालय के लिये
और फिर देनी है आवाज ब्रह्मांड को।

{कृष्ण बिहारी}

जून 24, 2010

अर्द्धनारीश्वर

हिन्दी में छपने वाली प्रसिद्ध पत्रिका हंस में इधर उधर छपी रचनाओं में व्याकरण की गलतियाँ ढ़ूँढ़ कर उन्हे सुधारने का सुझाव देने वाले, मनोरंजक और शैक्षणिक मूल्यों वाले एक स्तम्भ, अक्षरश: में इसके लेखक श्री अभिनव ओझा ने हंस के मई 2010 के अंक में अपने पहले ही सुधार में निम्नलिखित सुझाव दिया है,

हिजड़ा औरत या हिजड़ा मर्द नहीं होते मित्र! हिजड़ा अपने आप में अर्द्धनारीश्वर है “।

मूल पंक्ति थी ” उन तीन जवान हिजड़ा औरतों के कानों में यह बात पड़ी

श्री अभिनव ओझा की सुधारवादी पंक्तियों में कुछ पेंच हैं।

भारत में अर्द्धनारीश्वर की परिकल्पना हिन्दू मिथकों और विशेषकर शिव के अर्द्धनारी और अर्द्ध पुरुष रुप से जुड़े मिथक से पनपी है। यह सिर्फ मानव का लिंग निर्धारण करने वाले अंगों और उनमें किसी किस्म के अभाव आदि से जुड़ी छवि नहीं है बल्कि अर्द्धनारीश्वर रुप में शिव का पूरा शरीर ही स्त्री और पुरुष दो भागों का मिश्रण है।

तो ऐसे में किसी किन्नर को या किसी भी स्त्री या पुरुष को अर्द्धनारीश्वर कहा जाना संदेह उत्पन्न करता है। व्याकरण की दृष्टि से तो पता नहीं परंतु माइथोलॉजी की दृष्टि से तो ऐसा कहना गलत ही लगता है। यह तो ऐसा ही है जैसे किसी भी ब्राह्मण शूरवीर को परशुराम कहने लगो, और क्षत्रिय को रामराम और परशुराम नाम रखना और बात है या उन जैसा बताना और बात है परन्तु कोई कितना भी शूरवीर क्यों न हो, लोग उन्हे हिन्दू
माइथोलॉजी वाले राम और परशुराम तो नहीं कहने लगेंगे।

अर्द्धनारीश्वर, आधुनिक काल में ज्यादा उपयोग में आने वाले शब्द हरिजन जैसा शब्दमात्र नहीं है। अर्द्धनारीश्वर कोई खास वर्ग नहीं है। स्त्री, पुरुष और किन्नर तीन अलग अलग वर्ग हैं मनुष्य जाति के, पर अर्द्धनारीश्वर के साथ ऐसा नहीं है। अर्द्धनारीश्वर एक अतिविशिष्ट शब्द है और इसके पीछे एक विशिष्ट कथा है, इसके साथ एक विशिष्ट मिथक का जुड़ाव रहा है। यह तो महेश, शंकर और रुद्र की भाँति शिव का ही एक रुप है।

आम आदमी किन्नरों को भले ही एक ही परिभाषा से समझता हो या उनकी प्रकृति से अंजान रहता हो पर व्यवहार में यही देखने में आता है कि किन्नर भी अपने आप को स्त्री किन्नर या पुरुष किन्नर रुप में प्रस्तुत करते हैं हाँलाकि नाचने और गाने वाला काम करते हुये वे अधिकतर स्त्री वेश में ही ज्यादा देखे जाते हैं।

सिर्फ व्यवहार में ही ऐसा नहीं होता कि कोई स्त्री  एक पुरुष जैसा व्यवहार करे उस जैसी आदतें और प्रवृति और प्रकृति रखे और कोई पुरुष एक स्त्री जैसा रहे बल्कि अस्तित्व की गहराई में तो हरेक स्त्री के अंदर एक पुरुष भी है और हरेक पुरुष के अंदर एक स्त्री। पुरुषों में ऊपरी सतह पर पुरुष गुण अधिकता में होते हैं और स्त्री में स्त्रियोचित गुणों की अधिकता होती है। पर बने तो दोनों स्त्री पुरुष के संगम से ही हैं।

मूल विषय पर वापिस आयें तो प्रश्न उठता है कि अर्द्धनारीश्वर तो छोड़िये क्या किन्नर को अर्द्धनारी भी कहा जा सकता है?

यदि हाँ तब तो अर्द्धपुरुष भी किन्नरों में ही होने चाहियें?

कोई जानकार इस बारे में कुछ कह पायेगा क्या? हो सकता है लोग अर्द्धनारीश्वर शब्द का प्रयोग किन्नर समुदाय के लोगों के लिये करते रहे हों पर क्या यह उचित है?

ऐसा देखा गया है कि प्राय: हिजड़ा शब्द तब प्रयोग में लाया जाता है जब सामान्य नर नारी किन्नरों को अपने से थोड़ा नीचे का दर्जा देकर देखते हैं और कई लोग तो इस वर्ग को अपमानित करने की मंशा से हिजड़ा शब्द का प्रयोग करते हैं। पुरुषों को अपमानित करने की मंशा से भी उन्हे हिजड़ा शब्द से सम्बोधित किया जाता है और ऐसा वातावरण तैयार करने में साहित्य और खास कर फिल्मों ने भी अपना भरपूर योगदान दिया है, मानो पुरुष का पौरुष सिर्फ उसकी सैक्सुअल संभावना और क्षमता से मापा जा सकता है!

किन्नर भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से चला रहा एक वृहद रुप से स्वीकृत नाम है और क्यों न इसी एक नाम का उपयोग किया जाये इस वर्ग को सम्बोधित करने के लिये!

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