Posts tagged ‘Shhonya’

मई 19, 2012

मूर्त होता प्रेम!

मुझे मालूम है,
मैं जानता हूँ,
और मानता भी हूँ
कि मेरे सिर के सब बाल पक कर सुर्ख हो चुके हैं|
परंतु फिर भी,
अपने सर पर तुम्हारी उँगलियों का स्पर्श,
मेरे माथे पर रखा तुम्हारा सर
और मेरे कानों को छूती
तुम्हारी चोटी की महकती खुशबू|
मुझे मालूम है
 जानता हूँ
और मानता भी हूँ
कि अब वह वक़्त बीत गया
मैं अब उन आखों से ओझल भी हो गया
मगर फिर भी
आज भी अपने भावशून्य चेहरे पर
उनकी चमक कौंधती साफ दिखती है ।
मुझे मालूम है,
मैं जनता हूँ
और मानता भी हूँ
कि इस मानवसागर में मेरे सामने खड़ी
यह एक जोड़ी आँखें तुम्हारी नहीं हैं,
लेकिन फिर आभास होने लगता है
 कि अब सब यादें मूर्त होने लगी हैं तेरी सूरत में।
( बकुल ध्रुव )
जुलाई 1, 2011

व्यक्ति अब तो आत्मसमर्पण करो

व्यक्ति !
तुमने चाहे
कितने ही युद्ध
क्योँ न लडें हों
जीते हों
कितना ही
संघर्ष
आविष्कार
और उन्नति की हो
लेकिन तुम
हमेशा
और
हर बार
हारे हो
अपने ही अहम से।

अपने अहम की
तस्वीर को
अपने अनुकूल न पाकर
तुम इसको
बार बार
बनाने
बिगाड़ने के लिए
अपने ही मन से
करते गए
मित्रता और शत्रुता
तर्क खोजकर
अपनी ही आत्मा को
ढालना चाहा तुमने
अपने अनुकूल।

लेकिन…..
तुम हमेशा
हारे हो
और इस तरह
तुम
न अपने अहम
न मन
और न अंतरात्मा को पा सके
तो फिर तुमने
पाया क्या…

कुछ नहीं
केवल शून्य
इसलिए
सब कुछ भूलकर
शून्य से ही
आरम्भ करो
अपना नवजीवन
मन शून्य होकर
महसूस करो कि
तुम्हारे भीतर
क्या चल रहा है
जो तुम नहीं चला रहे
इसलिए
प्रकृति के समक्ष
कृतज्ञ होकर
कर डालो
आत्मसमर्पण..
और सहजता से
मान लो कि
तुम्हारा असिस्त्व
वही है जो
समुद्र में
एक पानी की
बूँद का है
न इससे अधिक
और न कम।

और जिस पल
तुम ये अहसास कर लोगे
उस पल तुम
जीत जाओगे
और इसी के साथ
तुम्हारे लिए मिट जाएगा
जीत, हार का अर्थ
और तुम केवल
प्रकृति निष्ठ
व्यक्ति होगे!

(अश्विनी रमेश)

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