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जनवरी 27, 2015

किरन बेदी का समर्थन क्यों संभव नहीं? (कृष्ण बिहारी)

मैं किरण बेदी के खिलाफ क्यों हूँ ?

२ अगस्त २०१२ को मैं दिल्ली में था,  साथ में हिन्दी कथाकार अमरीक सिंह दीप जी भी थे| अन्ना आन्दोलन शिखर पर था| मंच पर केजरीवाल , कुमार विश्वास , अर्चना पूरण सिंह थे, अन्ना तो थे ही, अनुपम खेर भी थे|

लेकिन उस दिन अन्ना हजारे ने अपने संबोधन में कहा था कि दिल्ली की बहरी सरकार कुछ सुन नहीं रही, अब हमें राजनीतिक लड़ाई लड़नी पड़ेगी| उस संबोधन से पहले मैंने कभी अन्ना को राजनीतिक होते नहीं देखा-सुना था| मुझे जयप्रकाश नारायण की याद आई और लगा कि १९७७ दुहराया जाएगा| अरविन्द केजरीवाल को पहचानने लगे थे|किरन बेदी और कुमार विश्वास को लोग जानते थे| उस दिन तक राजनीतिक दल ‘आप‘ का गठन नहीं हुआ था| यह जरूर स्पष्ट हो गया था कि कोई दल अस्तित्व में आएगा|

लेकिन जैसे ही ‘आप‘ का औपचारिक रूप सामने आना शुरू हुआ वैसे ही किरन बेदी का सत्ता प्रेमी हुक्मरान भी सामने आने के लिए छटपटाने लगा| चूंकि , अन्ना  हजारे, अरविन्द को ईमानदार के विशेषण से नवाज़ चुके थे इसलिए ‘आप‘ में अरविन्द केजरीवाल ही नम्बर-१ के स्थान पर स्वीकृत हो चुके थे|  किरन बेदी के लिए यह बरगद से बोनसाई होना था| उन्होंने साहिल से भी दूरी बना ली, बाढ़ में उतरने का तो प्रश्न ही नहीं था| जनरल विक्रम सिंह ने तो किरन बेदी से पहले ही भांप लिया कि अरविन्द के सामने उनका व्यक्तित्व भी बौना है और यह कहाँ सुनिश्चित है कि सत्ता के आगे आर्थिक रूप से कमजोर पार्टी ‘आप‘ अपना प्रभाव दिखा सकेगी तो उन्होंने अन्ना से दूरी बनाई और जैसे ही मौका मिला भाजपा में शामिल हो गए|  उन्हें भी अपने जनरल रह चुकने का गुमान कभी सामान्य आदमी बनने नहीं देता| उनका गुमान पार्टी हाई कमान ने कुछ ऐसा कुचला है कि अब वे खुद को खुर्दबीन से खोज रहे हैं| आम आदमी पार्टी बनी| उससे पहले बाबा रामदेव की कुटाई हो चुकी थी| उनका भी अता-पता भाजपा के शक्ति केंद्र बन जाने के बाद ही लगा| उनके योग का महत्त्व आज तो स्थापित हो गया और उनकी चलती दूकान बंद होने से बच गई,  लेकिन यदि कहीं ऐसा नहीं हुआ होता तो एक बार शलवार-कुरता पहनकर जान किसी तरह बच गई थी, दूसरा मौका नहीं मिलना था| उन्होंने भी अरविन्द के मंच से किनारा किया|

आम आदमी पार्टी बनने और चुनाव में हिस्सा लेने के बाद ‘बिन्नी‘ की भूमिका को देश ने देखा है, और इसलिए ‘बिन्नी’ पर कोई बात महत्त्वपूर्ण नहीं है. शाजिया को इस बात की गलतफहमी है कि वे दिल्ली की दूसरी इमाम हैं और पूरी दिल्ली उनके फतवे को सुनकर अमल करेगी| दो-दो चुनाव हारने के बाद भी अपनी कमजोरियों को वे विशेषताएं ही समझती हैं, उन्हें ऐसा समझने से कौन रोक सकता है!

आम आदमी पार्टी की सरकार किन परिस्थितियों में बनी, ४९ दिन तक कैसे चली ? यह सब देश ने देखा है कि दिल्ली विधान सभा में कांग्रेस और भाजपा एक होकर सदन में क्या कर रहे थे ? या कि शोएब ने सदन में क्या किया था ? अब चुनाव एक बार फिर सामने हैं| 

किरन बेदी को सत्ता पर काबिज़ होने का एक मौका भाग्य से फिर मिल गया है, जो वह चाहती थीं| लेकिन, उन्हें जानना चाहिये कि जनता सत्ता और संघर्ष का अर्थ जानती है| वे केवल सत्ता का अर्थ जानती हैं, उनका दिल्ली की जनता के प्रति प्रेम कितना है इसे उनसे बेहतर जनता जानती है| चुनाव में , खासतौर पर भारत में सभी हथकंडे आजमाए जाते हैं, हो सकता है कि वे जीत भी जाएँ लेकिन यह यकीनी तौर पर मान लें कि वे  अरविन्द केजरीवाल के आगे हार चुकी है| और , अरविन्द के खिलाफ चुनाव न लड़कर उनके पहले कदम पर ही हार की मुहर लग गई है…

 

कृष्ण बिहारी (हिंदी के प्रसिद्द लेखक एवं पत्रिका ‘निकट‘ के सम्पादक)

दिसम्बर 16, 2014

कुमार विश्वास : दामिनी – तुम्हे श्रद्धांजलि निर्भया लाडो

KV16 दिसंबर 2012 … मन बहुत व्यथित था !

एक पत्रकार ने अभी-अभी फोन पर बताया था कि पांच-छह दरिंदो ने एक लड़की के साथ बेहद क्रूर बलात्कार किया है ! उसने जो-जो बताया उसे सुन कर दिमाग गुस्से से दहक उठा था ! उस दिन मेरा ड्राइवर छुट्टी पर था सो मैं खुद ड्राइव कर के सफदरगंज-अस्पताल पहुँचा !

ऐसी परिस्थिति का सामना करने में अजीब सा लग रहा था तो मैंने अपनी साथी शाज़िआ इल्मी और डॉ वर्तिका नंदा को भी घटना की सूचना दे कर बुला लिया ! हम तीनो दामिनी के माँ-पिता जी से मिले, उसे बेड पर निश्छल आँखें बंद किये लेटे देखा ! वहाँ मौजूद डॉ मुझे पहचानते थे, उन्होंने जो बताया उसे सुन कर आखँ छलकने लगीं, आँसूं रोकना मुश्किल पड़ गया !

बाहर प्रेस से सामना हुआ तो एक चैनल के कांग्रेसी-पत्रकार (जो आजकल एक पूर्व कांग्रेसी केंद्रीय मंत्री का निजी सचिव है) ने मुझ से कैमरे पर बदतमीज़ी की ! उसने कहा “आप लोग मामले को हवा देना चाहते हैं, शर्म करिये, इस परेशान परिवार को अपने हाल छोड़ दीजिये !”

मैं उलझन-दुःख और बेचारगी में लिपटा घर वापस आ गया !

दो दिन बड़ी बेचैनी से बीते! साथी कह रहे थे, हमें कुछ नहीं करना चाहिए, गलत लिया जायेगा मीडिया द्वारा !

21 दिसंबर की रात मैंने फेसबुक पर लिखा कि मैं इस लोकतंत्र  के सबसे बड़े बाबा “महामहिम राष्ट्रपति” जी घर जा रहा हूँ देश की इस बेटी की चीखों का हिसाब माँगने, जिसे आना हो विजय-चौक आ जाये !

सुबह-सुबह कुछ सौ लड़के-लड़कियाँ साथ आये ! वक़्त बढ़ते-बढ़ते गुस्से से तमतमाते हज़ारों युवा “we want justice” का नारा लगाते विजय-चौक पर फ़ैल गए !

सुबह 10 बजे तक पुलिस ने दर्ज़न बार ठंडा-गन्दा पानी फेंका और लगभग 7 बार लाठियाँ चलाईं ! 11 बजे के आस-पास एक लाठीचार्ज में दिल्ली-पुलिस के एक पुराने परेशान अफसर नें RPF की टुकड़ी को विशेष दिखा कर इशारा किया ! राष्ट्रपति भवन के दायीं और लॉन की झाड़ियों के पास गिरा कर RPF ने बड़ी बेहरमी से तब तक लाठियां मारी जब तक ANI का कैमरा भागता-भागता वहाँ आ नहीं गया ! दिन भर ठंड भीगा शरीर लाठियाँ खा कर जगह-जगह से सूज गया पर वहाँ से कोई हटने को तैयार नहीं था ! हारकर पुलिस ने रात होने का इंतज़ार किया और आखिर रात 12 बजे एक बार फिर लाठीचार्ज कर के सब को खदेड़ दिया !

अगले कुछ दिन सरकार और हमारे बीच इसी तरह के संघर्ष में बीते!

आधी रात दामिनी के माता-पिता से मिल कर आया कि हम कुछ कर सकते हैं क्या उसकी चिकित्सा के लिए !

सरकार की नीचताओं पर शक था सो सिंगापुर में अपने एक दोस्त को छूटी दिला कर हॉस्पिटल के आस-पास बने रहने को कहा !

एक दिन सुबह 4 बजे उसका फ़ोन आया ! नींद में सुना “भाई वो नहीं बची“!

ऐसा लगा जैसे घर का कोई मर गया !

दिमाग सुन्न पड़ गया !

आँखें भर आई.……दो साल हो गए हैं !

अभी कुछ दिन पहले एक लड़की से बलात्कार करते हुए एक दरिंदे ने कहा “मुहँ खोला तो दामिनी की तरह “—–” रॉड डाल दूँगा ” !

पता नहीं क्या बदला है ?

क्या बदलना है ?

सरकार-चेहरे-घटना ?

हमें माफ़ कर दो लाड़ो !

अगले जनम मेरी बिटिया बन कर मेरे आँगन में आना !

(कुमार विश्वास)

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