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मई 7, 2015

तुम्हारे लिए (हिमांशु जोशी) : दुखद प्रेमकथा से लुभाता उपन्यास

tumhare liyeधर्मवीर भारती का उपन्यास – गुनाहों का देवता और हिमांशु जोशी का उपन्यास – तुम्हारे लिए, शरत चंद्र चटर्जी के उपन्यास – देवदास की भांति भावुकता की चाशनी में पगे हुए उपन्यास हैं, जिन्हें भारतीय साहित्य के लेखक और समीक्षक महान साहित्य की श्रेणी में कतई रखने को राजी नहीं होंगे पर ये ऐसे उपन्यास हैं हैं जो अपने रचे जाने के साल से लेकर वर्तमान तक पाठकों को निरंतर लुभाते रहे हैं| और ऐसा नहीं कि किशोर वय में जब पाठक साहित्य में गोते लगाना शुरू ही करता है तभी इन उपन्यासों ने उसे लुभाया हो, बलि साहित्य की सैंकडो किताबें पढ़ चुकने के बाद (अति) भावुकता के आरोपों से घिरे इन उपन्यासों को लोग पढते हैं और इनसे जुड़ाव महसूस करते हैं| भीड़ में इन उपन्यासों को भले ही हल्का कह कर नकार दे साहित्यरसिक परन्तु एकांत में इन उपन्यासों का आनंद वह हमेशा ही लेता रहता है| इनसे पूरी तरह छुटकारा कभी नहीं हो पाता|

जैसे जैसे साहित्य की समझ बढ़ती जाती है, इन उपन्यासों को पढते समय बहुत सारी कमियां स्पष्ट नज़र आती हैं पर तब भी ये उपन्यास ध्यान खींचते हैं| ये उपन्यास गुलशन नंदा और अन्य लेखकों दवारा लिखे जाने वाले कोरी भावुकता के बुनियाद पर रचे जाने वाले सामाजिक उपन्यास नहीं हैं बल्कि ये अच्छे साहित्य के किले में पाठक को प्रवेश दिलवाने वाले द्वार हैं जिनसे नये और पुराने और अनुभवी पाठक साहित्य में प्रवेश करते ही रहते हैं|

मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि ऐसा मानना बिल्कुल ही निपट कल्पना नहीं हैं कि शरत चंद्र के उपन्यास देवदास की छाया ने कहीं न कहीं “गुनाहों का देवता” और “तुम्हारे लिए” की रचना प्रक्रिया को प्रभावित किया है|

उत्तराखंड के कुमाऊं के नैनीताल की पृष्ठभूमि में  मनोहर श्याम जोशी के महान उपन्यास “कसप” की भांति “तुम्हारे लिए” का कैनवास विशाल नहीं है बल्कि उसकी तुलना में यह हर लिहाज से एक लघु उपन्यास है| जहां “कसप” कथा और चरित्र चित्रण और मनोवैज्ञानिक स्तर पर गहरा और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करके पाठक को सम्मोहित करके उसे एक परिपूर्ण प्रेमकथा पढ़ने की अनुभूति देता है और दुखद अंत पाठक को अरसे तक हिलाए रखता है, “तुम्हारे लिए”  कथा और चरित्र चित्रण के स्तर पर जितना बताता या दर्शाता नहीं उससे ज्यादा छोडता चलता है पर फिर भी दुख और एक दुखद प्रेमकथा को भांजता यह उपन्यास आकर्षित करता है| उपन्यास की इस बनावट से एक बात का अनुमान लगता है कि जब हिमांशु जोशी ने इसे रचा तब उनके सामने एक महान प्रेमकथा रचने का उद्देश्य नहीं रहा होगा पर लिखते लिखते कुछ ऐसा रचा गया जो अपनी तमाम कमियों के बावजूद पाठकों को लुभाता चला आ रहा है|

चरित्र चित्रण के स्तर पर देखें तो उपन्यास का नायक विराग है, जिसकी जातिगत पहचान के बारे में उसके सहपाठी और मित्र सुहास (जिसे देवदास के चुन्नी बाबू से प्रेरित चरित्र माना जा सकता है) दवारा उसे “विराग शर्मा” पुकारने पर पता चलता है| कुमाऊं के दूर दराज के गाँव में “शर्मा” उपनाम धारण करने वाले और पूरोहिताई करके जीवनयापन करने वाला परिवार पाया जाता होगा या नहीं इस पर सोचा जा सकता है और तर्क किये जा सकते हैं|

उपन्यास की नायिका – अनुमेहा, ड़ा दत्ता की भतीजी है| अब ड़ा. दत्ता और उस नाते अनुमेहा बंगाली है या पंजाबी, इस बात को स्पष्ट रूप से उपन्यास नहीं स्थापित करता, हाँ ड़ा. दत्ता की मृत्यु के बाद उनकी दूसरी पत्नी के अपने माता-पिता के पास चंडीगढ़ चले जाने की बात सुहास विराग को बताता है तो उससे अनुमान भर लगाया जा सकता है कि अनुमेहा एक पंजाबी परिवार से ताल्लुक रखती है| नायिका का नाम आकर्षक है और इस बात में अतिशयोक्ति नहीं कि पिछली सदी के अस्सी और नब्बे के दशकों में इस उपन्यास को पढ़ने वाले बहुसंख्यक पाठकों ने पहली ही बार इस नाम को जाना होगा| दुखद प्रेमकथा की नायिका का नाम होने के बावजूद नाम में इतना आकर्षण है कि इस उपन्यास को पढकर बहुतों ने अपनी बेटियों के नाम इस नाम पर रखे हों ऐसा भी हुआ होगा क्योंकि पच्चीस- तीस साल से छोटी युवतियों के नाम तो अनुमेहा देखने सुनने को मिल जाते हैं पर चालीस पचास साल की नारी का अनुमेहा नाम बिरला ही सुनने में आया होगा|

गरीबी से त्रस्त विराग, जो बड़ी मुश्किल से नैनीताल में रहकर अध्ययन कर पा रहा है, अपने सहपाठी सुहास की मदद के कारण अनुमेहा को ट्यूशन देने का काम पा जाता है जिसके एवज में उसे २० रूपये प्रति माह मिलने हैं जिससे उसकी आर्थिक परेशानियां बहुत हद तक दूर हो सकती हैं|

अनुमेहा के ड़ा. पिता का देहांत हो चुका है और वह अपने चाचा (जिन्हें वह उपन्यास के काल में भी अंकल ही कहती है) के घर रह कर पढ़ रही है| उसके अपने दुख हैं और गुरु विराग और शिष्या अनुमेहा के दुख कब एक दूसरे का संबल बन जाते हैं, उपन्यास उन घटनाओं का ब्योरा नहीं देता बस शुरू के पृष्ठों में ही सांकेतिक रूप से बताया जाता है कि दोनों की भावनाएं हैं एक दूसरे के प्रति, पर जहां अनुमेहा मुखर है इस बात को स्पष्ट करने में कि उसे विराग की चिंता है, विराग इस बात को मुखरित नहीं गोने देना चाहता| शायद उसकी गरीबी और उसके परिवार की कठिनाइयां उसे प्रेम नामक अनुभव को लेने से रोकती हैं और वह इस बात से ही ग्लानि से भर जाता है कि उसके पिता पेट काट काट कर उसे नैनीताल में रख कर पढ़ा रहे हैं और वह यहाँ प्रेम में फंसा हुआ है| यही एक बात संभव लगती है विराग दवारा अनुमेहा के प्रेम को स्वीकार न कर पाने के पीछे|

विराग-अनुमेहा के प्रेम, जो विराग की मुखर स्वीकृति न मिल पाने के कारण एक निश्चित आकार ग्रहण नहीं कर पाता, और इस लिहाज से अनगढ़ रह कर प्रेमकथा को भी अनगढ़ और बहुत हद तक हवाई ही रहने देते हैं, विराग के गाँव में अपने पिता और भाई के साथ के दृश्य उपन्यास को ठोस धरातल देते हैं और वास्तविकता के करीब लेकर जाते हैं और साहित्य के घेरे में उपन्यास का प्रवेश कराते हैं| एक गरीब ब्राह्मण, जिसने अपने खेत-खलिहान और घर तक इस आशा में गिरवी रखकर बड़े पुत्र की पढ़ाई के ऊपर न्योछावर कर दिए हैं कि पुत्र पढ़ लिखकर कुछ बड़ा काम करेगा, अपनी हर निराशा, सीमितता, कठिनाई, और अपने दुख को शास्त्रों में उपलब्ध श्लोकों और ज्ञान के भरोसे सहन कर लेता है, पर इस किताबी ज्ञान से नैनीताल रहकर आधुनिक जीवन शैली के संपर्क में आ चुके ज्येष्ठ पुत्र को सहारा नहीं मिल सकता| विराग नैनीताल में पिता की परिपाटी से काम नहीं चला  सकता पर संस्कारों के कारण वह आदर्शवाद को छोड़ भी नहीं पाता|

उसकी गरीबी, उसके आदर्शवाद, और उसके संस्कार जब वास्तविक जीवन के कुछ पहलुओं से टकराते हैं तो वह अजीब दुविधा में घिर जाता है| अनुमेहा का प्रेम उसके लिए ऐसा बन गया है जिसे अनुमेहा के सामने वह स्वीकार भी नहीं कर पाता और अपने एकांत में अपने ह्रदय में अनुमेहा के प्रति प्रेम को नकार भी नहीं पाता| प्रेम को प्रदर्शित और स्वीकार न कर पाने की कमी के कारण उसका व्यक्तित्व विकसित हो ही नहीं पाता, और वह कुंठित हो उठता है| अंदर कहीं गहरे में उसे यह आशा हो सकती है कि भले ही वह अनुमेहा से प्रेम को सच रूप में नहीं स्वीकारता पर अनुमेहा उसके लिए ही इंतजार करेगी| वह अनुमेहा से बचता भी है और उससे बंध कर भी रहना चाहता है| सुहास के साथ अनुमेहा को घूमते देख उसकी कुंठा मुखरित हो उठती है और उसे अपने जीवन की विवशताएं विशालकाय लगने लगती हैं| देवदास के अनिर्णय या एक गलत निर्णय लेने की मानसिकता ने उसके जीवन को पछतावे से भरकर गलत मार्ग पर डाल दिया था, और ऐसा ही विराग के साथ भी होता है|

कुछ अरसे के अंतराल के बाद मिलने पर सुहास, विराग को ज्ञान देता है,” मुझे लगता है जीवन में न तो अतिसंयम आवश्यक है, न अतिअसंयम| बुद्ध का संतुलित सम्यक सिद्धांत ही मुझे हर समस्या का एकमात्र समाधान नजर आता है – न विरक्ति, न आसक्ति| यानि…”

पहले भी जब सुहास का साहित्य आदि पढ़ने से कोई नाता न था और वह नितांत शरीर ही था, तब भी विराग अतिसंयम का पालन करता था और बाद में भी बहुत अरसे तक करता रहा|

विराग के स्मृतियों के सहारे फ्लैशबैक में चलता उपन्यास पाठक को गहराई में एक और डूबकी तब लगवाता है, जब बहुत साल बाद विराग और अनुमेहा मिलते हैं और भावनाओं का समुद्र अनुमेहा और विराग को ही नहीं बांधता बल्कि पाठक को भी पुस्तक से बांध लेता है|

चूँकि कोई कहानी या उपन्यास उसमें उपस्थित चरित्रों की कहानी होती है पर कई मर्तबा ऐसी कथाएं सामने आ जाती हैं जिनके चरित्रों के व्यवहार को देखकर पाठक के मन में प्रश्न उठते हैं कि ये चरित्र ऐसा क्यों नहीं कर रहे या कह रहे, क्योब्की यही सही होगा| परन्तु चरित्र अपनी ही तरह के होते हैं, उनका अपना स्वभाव होता है आखिर तभी वे एक कहानी को प्रस्तुत कर पाते हैं| उपन्यास में कई बार ऐसे भाव उठते हैं कि विराग और अनुमेहा ऐसा क्यों नहीं कर लेते जिससे उनके जीवन आसान हो जाएँ| पहले उनमें सुलझेपन का नितांत अभाव दिखाई देता है और पाठक को स्पष्ट दिखाई देता है कि सुलझे दिमाग की अनुपस्थिति उनके जीवन में दुख के मूल कारणों में से एक है|

और जब दोनों जीवन में उस स्थिति में पहुंचकर मिलते हैं जहां उनके मिलन में कोई परेशानी नहीं है और बीते सालों तक जो विराग इस रिश्ते को ठोस आकार देने में नाकाम रहा है, वही प्रस्ताव रखता है,” मान लो, जिससे तुम शादी करना चाहती थीं, वह अब भी तुमसे शादी करना चाहे …|”

तो अनुमेहा इंकार कर देती है,” नहीं नहीं, , मैं स्वयं अब उससे शादी नहीं कर सकती| मैं उसके योग्य नहीं रही…|”

जब पाठक को लगने लगता है कि नितांत अकेले रहे रहे अनुमेहा और विराग जीवन के इस पड़ाव में मिलने पर एक दूसरे को अपने प्रेम का सहारा दे सकते हैं और पाठक को एक आशा घेर लेती है कि अंततः दुख से भरी इस प्रेमकथा में कुछ सुखद अंश भी समा सकते हैं, उपन्यास ऐसी सारी आशाओं को सिरे से समाप्त करके न केवल दोनों चरित्रों को बल्कि पाठकों भी उनके दुख में डुबो देता है|

अनुमेहा से विदा लेते समय कुछ याद करके विराग पूछता है,” अब कब आऊँ?”

रोकर अनुमेहा कहती है,” नहीं – नहीं| अब मत आना| कभी नहीं – कभी भी नहीं| नहीं तो मेरे लिए जीना और भी अधिक दूभर हो जायेगा| समझ लेना अनुमेहा मर गई|”

समय के साथ विराग वास्तविकता के नजदीक आ गया है पर अनुमेहा आद्रश्वाद के ज्यादा नजदीक पौंच गई है| कहते हैं प्रेम दोनों प्रेमियों को बदलता है और अगर उनमें दूरी आ जाये तो प्रेमी प्रेमिका की सोच की भांति बनता जाता है और प्रेमिका प्रेमी के विचारों की भांति सांचे में ढलने लगती है| वैसे भी यह सच है कि किसी भी रिश्ते में दोनों लोग अपने साथी के साथ कम और अपने मन में साथी की मूरत के साथ ज्यादा रहते हैं| अनुमेहा के मन में विराग की एक आदर्शवादी मूरत बसी हुयी है और उससे इतर किसी और खंडित मूरत के साथ रहने को वह राजी नहीं|

सालों के अंतराल के बाद अनुमेहा पुनः विराग के जीवन में आती है, और कुछ घंटों की मुलाक़ात में बीमार अनुमेहा जब विराग को सुहास के दिवंगत हो जाने और मरने से पहले अपनी सारी अर्जित संपत्ति दान कर जाने के बारे में बताती है तो विराग के साथ पाठक भी स्तब्ध रह जाता है| एक बिगडैल सुहास पर विराग के आदर्शवाद और अनुमेहा के प्रति प्रेम का बहुत असर रहा और दोनों के साथ और असर ने उसका जीवन संवार दिया|

इस बार अनुमेहा विराग से विदा लेने आई है तो इस जीवन में अंतिम बार विदा लेने के लिए और सुहास और अपने से जुड़े कुछ कागजात देने|

चलते समय अगली सुबह पालम एयरपोर्ट आने का वचन लेकर अनुमेहा विराग को ढांढस बंधाते हुए कहती है,”सुनो, दुखी न होना| पता नहीं, हमारा यह किस जन्म का कैसा बैर था, जो…जो…|”

और अनुमेहा फूट-फूटकर रोने लगती है, पाठक को भ्रमित छोड़कर कि क्यों दोनों चरित्र इतने दुख को पाले रहते हैं जबकि थोड़ा सा प्रंबधन उनके जीवन को सामान्य ढर्रे पर ला सकता था|

पर यही इस उपन्यास की विशेषता है| विराग-अनुमेहा के सहारे दुख का प्रदर्शन ही उपन्यास को बार बार पढ़ने की ओर आकर्षित करता है और पाठक सालों के अंतराल के बाद इस उपन्यास को फिर से उठा लेते हैं|

दुख को ऐसे भांजा गया है कि पाठक दोराहे पर खड़ा रहता है, कि इस दुख से सीधा मुकाबला अच्छा या इससे दूर जाने में ही भलाई है|

विराग ने ऐसे दोराहों पर हमेशा अनुमेहा से दूर जाने का रास्ता चुना और बाद में अनुमेहा ने भी यही राह चुनी|

पालम पर भी विराग के पहुँचने से पहले ही अनुमेहा का विमान टेक-ऑफ कर जाता है और बीती रात की मुलाक़ात उनके जीवन की अंतिम मुलाक़ात बन जाती है| विराग-अनुमेहा के मध्य फिर से अधूरापन रह जाता है|

उपन्यास का अंतिम पृष्ठ कहानी को समाप्त नहीं करता बाकि बिरले ऐसे पाठक होंगे जो अंतिम पृष्ठ को पढकर उत्पन्न हुए दुख में डूबकर पुस्तक के पहले अध्याय पर पुनः लौट कर न आए होंगे, बहुत सी बातें छोड़ छोड़ कर पाठक को कहानी सुनाती पुस्तक को पूरा ग्रहण करने के लिए|

ऐसा ही वर्तुल इस कहानी के साथ बना रहता है| यह पुनः पुनः लौट कर आती है जीवन में|

…[राकेश]

जून 18, 2011

बतकही : आरम्भ

चारों मित्र अपनी बैठकों को बतकही क्लब कहा करते हैं। इन बैठकों की शुरुआत तो कब हुयी यह इन मित्रों को भी याद न होगा पर सन 2005 के जनवरी माह से ये बैठकें नियमित जरुर हो गयीं। बिरला ही कोई दिन जाता है कि जब चारों घर पर हों और बैठक न लगे।

उसी दौरान की एक बैठक से :-

जनवरी का दूसरा रविवार होने के बावजूद धूप खिलकर निकली थी अत सुबह का नाश्ता समाप्त करते ही अशोक बाबू विजय जी के घर पहुँच गये थे और दोनों लोग इस वक्त धूप का लुत्फ उठाते हुये अखबार पढ़ने में लगे हुये थे।

अशोक बाबू ने अखबार के पन्ने बन्द करके कलाई घड़ी में समय देखकर कहा,” दस बज गये विजय बाबू, ये हरि बाबू और सुनील जी नहीं आये अभी तक। कहाँ रह गये कहीं टी.वी. सीरियलों से तो नहीं चिपक गये बच्चों के साथ- साथ”?

“आते ही होंगे सुनील जी तो शायद बाजार गये होंगे मिठाई लाने उनके बेटे का प्रमोशन हो गया है। मेजर से ले. कर्नल बन गया है और हरि जी भी फंस गये होंगे किसी काम में। आते ही होंगें दोनों। कौन सा यहाँ संसद लगनी है जिसके लिये कोरम पूरा नहीं हो रहा है”, विजय बाबू इत्मिनान से बोले।

सुनील जी ने आपको बताया अपने बेटे के प्रमोशन के बारे में? हमें तो बताया नहीं कल शाम पाँच बजे ही मिले थे हमसे तो। अशोक बाबू शिकायती लहजे़ में बोले।

अजी उन्हे तो खुद कल रात पता चला जब उनके बेटे ने फोन करके बताया। वो तो सुबह दूध लेने जाते समय उनसे मुलाकात हो गयी तो मुझे पता चला। अब अशोक बाबू आप यहाँ हिन्दुस्तान में रहो तब तो कोई आपको बताये कुछ। रोज़ तो आप शहर से बाहर रहते हो। विजय बाबू ने चुटकी ली।

अशोक कुछ कह पाते उससे पहले ही चाय आ गयी।

लो जी चाय पियो आप अशोक बाबू। तभी आपको रस आयेगा बातों में।

अच्छा चाय आ गयी है तो पी लेते हैं पर मुझे लगने लगा है कि चाय आदि पीने से मेरा बी.पी. कुछ बढ़ जाता है।

अजी कुछ बी.पी. ऊपर नीचे नहीं हो रहा चाय पीने से। आप थोड़ा सा ना चिन्ता कम किया करो सब अपने आप ठीक रहेगा। जमाने भर की चिन्ता करना छोड़ दो।

अजी चिन्ता कोई मैल तो है नहीं कि नहा लिये और शरीर से दूर हो गयी। जो चिन्ता है वो है। जब तक काम पूरा नहीं होगा चिन्ता दूर कैसे हो जायेगी? आप भी कैसी बात करते हो? अशोक बाबू ने चाय का कप उठाते हुये कहा।

विजय बाबू ने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ देर दोनों चाय की चु​स्कियों के साथ चुपचाप अखबार पढ़ते रहे।

सहसा अशोक बाबू बोले,” विजय बाबू ये शाहरूख खान के बारे में आपका क्या विचार है”?

विजय बाबू ने अशोक जी के अखबार में छपी तस्वीर पर निगाह डालते हुये कहा विचार तो ठीक ठाक सा ही है। तरक्की तो कमाल की है लड़के की। देखो टी0वी के सीरियलों से कहाँ पहुँच गया। कुछ तो बात जरूर होगी उसमें। पर आप एक्टिंग की बात करो तो ये लड़कपन के किरदारों वाली फिल्में तो ठीक हैं पर परिपक्व रोल में मामला जमता नहीं। बड़ा हल्ला सुना था कि शाहरूख की देवदास आ रही है टी.वी. पर। हमने भी देखी पर साहब बात जमीं नहीं। हमारे पास तो शरत बाबू की किताब भी है। दिलीप कुमार की फिल्म देखने के बाद हमने किताब पढ़ी थी और ऐसा लगा था कि जैसे दिलीप कुमार को सोचकर किताब लिखी गयी हो। बड़ा जबर्दस्त अभिनय किया था दिलीप कुमार ने। दिलीप कुमार भी तकरीबन इसी उम्र के रहे होंगे देवदास करते समय जितनी उम्र में शाहरूख देवदास बने हैं पर दिलीप के अभिनय में गहरायी और परिपक्वता थी। या कह लो कि निर्देशक की अपनी समझ है। अपना अपना समय है हो सकता है हम लोग बूढ़े हो गये हैं और पुराना रिकार्ड बजा रहे हैं पर व्यक्तिगत रूप से हमें तो यही लगता है कि नायक के रूप में अभी तक तो कोई भी दिलीप कुमार से आगे नहीं जा पाया। अमिताभ बच्चन को ही थोड़ा करीब मान सकते हैं पर वह भी उन्नीस ही रहे दिलीप कुमार के सामने।

हमें तो विजय बाबू बिल्कुल अच्छा नहीं लगता ये शाहरूख खान और बच्चों को देखो पागल हुये रहते हैं इसके पीछे।

अजी बच्चे तो रितिक या ह्रितिक क्या है उसके दीवाने हैं आजकल।

ये देखो विजय बाबू ये लड़की कह रही है कि इसने सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी शाहरूख के साथ काम करेगी। मुझे तो बेवकूफी लगती है ऐसी बात।

मुझे तो अशोक बाबू वो लड़का ज्यादा पसन्द है जो कोकाकोला के विज्ञापन में आता है अलग अलग रूपों में। ठंडा माने कोकाकोला कहता हुआ। विजय बाबू चहक कर बोले।

अच्छा आमिर खान। वो तो मुझे भी ठीक लगता है। बल्कि सारे खानों में सबसे सही वही है। वो तीसरा सलमान खान तो मुझे एक आँख नहीं भाता। हमेशा कुछ न कुछ घपला करे रखता है।

हम तो टीवी पर ही देखते हैं अशोक बाबू फिल्में आदि। ​सिनेमा गये तो सालों हो गये। इस सलमान खान की भी एक फिल्म अभी दुबारा देखी थी हम आपके हैं कौन। ये बहुत अच्छी लगी हमें। वैसे अब तो खान ही खान हैं फिल्मों में। अभी फिरोज खान का पुत्र ही जम नहीं पाया था कि संजय खान के पुत्र ने दस्तक देनी शुरू कर दी। पटौदी के साहबजादे हैं ही पहले से। और भी कई होंगें।

विजय बाबू खान तो हमेशा रहे हैं फिल्मों में। ये आपका दिलीप कुमार है तो ये भी कुछ खान ही। इन खानों का मन ही फिल्मों में लगता है।

हाँ अशोक बाबू उधर खान और इधर खन्ना। राजेश खन्ना विनोद खन्ना और अब इनकी सन्तानें। कपूर खानदान तो है ही हमेशा से।

हाँ जी अब तो खानदानी व्यवसाय बन गया है। बच्चन परिवार, देयोल परिवार, चोपड़ा परिवार, रोशन परिवार, कपूर परिवार, भट्ट परिवार। जैसे पहले व्यापारिक संस्थायें हुआ करती थीं एंड संस के नाम से फिल्मों में भी बाकायदा लिखा जाने लगेगा फलाना एंड संस।

अब तो अशोक बाबू ऐसा लगने लगा है कि बाहर के लोग जिनका कोई नहीं है फिल्म इंडस्ट्री में फिल्म लाइन में घुस ही नहीं पायेंगें।

सही बात है। किसी भी उद्योग में सीमित पैसा होता है। जब सारा पैसा इन स्टार संस और डॉटरों पर लग जायेगा तो बाहर से आने वालों को कौन घास डालेगा और कहाँ से डालेगा?

अजी अब तो टीवी पर भी इन फिल्म वालों का ही कब्जा होता जा रहा है। स्टार प्लस पर आप ये समझो कि कम से कम चार पाँच सीरियल रोज़ आते हैं जितेन्द्र की बेटी एकता कपूर के। करिश्मा कपूर और श्रीदेवी आ ही रही थीं सहारा टीवी पर अब हेमा मालिनी भी आने लगीं।

विजय बाबू हमारी तो समझ में आता नहीं कि हेमा मालिनी को क्या जरूरत है सीरियल आदी करने की। एक फिल्म क्या हिट हो गयी अमिताभ बच्चन के साथ फिर से मैदान में कूद पड़ीं। अब एक तरफ तो इनकी बिटिया फिल्मों में है और ये अभी तक मोह नहीं छोड़ पा रही। ये हालत तो तब है जबकि ये सांसद भी हैं। जाने कब ये जनता के लिये समय निकाल पाती होगीं जाने कौन तो इन्हे संसद में भेज देता है?

अजी ये तो इनकी मर्जी फिल्म या सीरियल करें न करें। आखिरकार इन लोगों का व्यवसाय तो यही है। जीने के लिये कमायेंगे तो है ही। और हेमा मालिनी को तो आपकी भाजपा ने ही संसद में भेजा है और इस बार तो इनके पतिदेव धर्मेन्द्र को भी भेज दिया है। भाजपा का तो पूरा इरादा टीवी वाली तुलसी को भी भेजने का था दिल्ली से संसद में पर दिल्ली की जनता को तुलसी जमी नहीं। विजय बाबू चुटकी लेते हुये बोले।

देखो विजय बाबू ऐसा तो है नहीं कि खाली मेरी भाजपा ही भेज रही है इन फिल्मी ​सितारों को संसद में। इसी लोकसभा में सुनील दत्त और गोविन्दा आये कांग्रेस के टिकट से जीतकर। जया प्रदा और राज बब्बर आये सपा के टिकट पर। सपा ने ही जया बच्चन को भेजा राज्य सभा में। और ये अमिताभ बच्चन आज भले ही सपा के साथ खड़े दिखायी दे रहें हों इन्हे राजनीति में तो राजीव गांधी ही लाये थे कांग्रेस की ओर से। अशोक बाबू कुर्सी पर पहलू बदल कर बोले।

ऐसा है अशोक बाबू सुनील दत्त का मामला ऐसा तो है नहीं कि सीधे फिल्मों से संसद में जाकर बैठ गये हों। सालों से समाजसेवा के काम में जुटे रहे। आतंकवाद से जलते पंजाब में पदयात्रा निकालने गये थे अस्सी के दशक के मध्य में। दत्त साहब आज से तो सांसद हैं नहीं। ऐसा नहीं है कि फिल्म वालों पर कोई पाबन्दी है राजनीति में आने की। पर आप यदि ये कह रहे हैं कि खाली अपनी सेलिब्रिटी छवि का सहारा लेकर ये लोग राजनीति में घुस जाते हैं जो कि गलत है तो मैं भी आपकी बात से सहमत हूँ। खाली फिल्मी ​सितारे ही नहीं बल्कि सब तरह के ​सितारों के लिये ये बात सच है। इनमें से जो लोग ऐसा समझते या करते हैं कि जब और धंधे बन्द हो जाते हैं तो राजनीति में घुसने की कोशिश करने लगते हैं तो ये राजनीतिक दलों राजनीति और देश सबका नुकसान ही ज्यादा करते हैं।

भाजपा तो इसीलिये इन फिल्मी सितारों या अन्य ​सितारों को टिकट दिया नहीं करती थी। शत्रुघन सिन्हा को भी पार्टी से जुड़ने के सालों बाद टिकट दिया। अशोक बाबू कुछ फख्र से बोले।

देखो अशोक जी गलत बयानबाजी़ तो आप करो मत। आपको शायद याद न हो सबसे पहले शत्रुघन सिन्हा, वी.पी.​सिंह के सर्मथन में उतरे थे। ये तो याद नहीं कि ये उनके साथ घूमे भी थे या नहीं पर बयानबाजी अच्छी खासी की थी। और राज बब्बर भी वी.पी के सर्मथन में ही कूदे थे जब वी.पी ने राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स मामले में ताल ठोक रखी थी सन सतासी के आसपास। वो तो बाद में शत्रुघन ​सिन्हा भाजपा में जा पहुँचे और राज बब्बर सपा में। सपा के बढ़ने में खासा पसीना बहा है राज बब्बर का भी। और ऐसा नहीं है कि शत्रुघन ​सिन्हा को बहुत बाद में टिकट दिया गया हो। ये सन इक्यानवें के लोकसभा चुनाव के बाद दिल्ली में हुये उपचुनाव में राजेश खन्ना के खिलाफ भाजपा की ओर से लड़े थे। इस सीट पर पहले आडवाणी जीते थे राजेश खन्ना को ही हराकर पर उनके पास शायद गांधीनगर की सीट भी थी और उन्होने दिल्ली की सीट छोड़ दी थी। उपचुनाव में शत्रुघन ​सिन्हा हार गये थे राजेश खन्ना से और फिर सालों तक भाजपा उनका उपयोग केवल चुनाव के समय भीड़ जुटाने में ही करती रही और बाद में राज्यसभा में ले लायी। और आपको शायद याद आ जाये कीर्ति आजाद चेतन चौहान रामायण वाली सीता यानि दीपिका रावण यानि अरविन्द त्रिवेदी महाभारत के कृष्ण यानि नीतिश भारद्वाज व अन्य की जो भाजपा द्वारा सिर्फ संसद की सीटें जीतने के लोभ में राजनीति में लाये गये थे। जबकि इनमें से किसी का भी समाज सेवा से न पहले मतलब था और न ही बाद में रहा। आखिर जीतने के बाद तो ऐसे ​सितारों को गम्भीर हो जाना चाहिये राजनीति के प्रति।

चलो विजय बाबू मान लिया भाजपा ने भी ​सितारों को टिकट दे दिया। अशोक बाबू कुछ हार मानते हुये बोले। पर ये सारी शुरूआत तो कांग्रेस द्वारा की गयी थी। हमारे पास तो रिकार्ड है नहीं कि कौन कब कहाँ से खड़ा हुआ पर टक्कर में आने को भाजपा को भी ​सितारों की मदद की मदद लेनी पड़ी। कांग्रेसियों ने कितनी फजीहत की बेचारे धर्मेन्द्र की इस चुनाव में। कितना कीचड़ उछाला हेमामालिनी से शादी को लेकर? अशोक बाबू रोष से बोले।

अशोक बाबू हमें तो ये पता है कि आजकल राजनीति का जो स्तर हो गया है उसमें धर्मेन्द्र किसी भी पार्टी से खड़े होते विपक्षी दल यही सब बातें उठाते। हर दल यही सब कर रहा है। शरीफ आदमी है धर्मेन्द्र। पता नहीं क्यों राजनीति के चक्कर में आ जाते हैं ऐसे लोग। वर्तमान की राजनीति का ताप सहना इतना आसान नहीं है। मुझे तो एक बात पता है कि किसी खास राजनीतिक दल से जुड़कर ये फिल्मी ​सितारे अपना नुकसान ही ज्यादा करते हैं। अगर फिल्मों में काम न करना हो आगे तो बात अलग है वरना इन लोगों को बचना चाहिये सक्रिय राजनीति से। समाज सेवा तो आप कैसे भी कर सकते हो। भारत की जनता भावनात्मक रूप से बहुत परिपक्व नहीं है। और जब ये फिल्मी ​सितारे राजनीति में आ टपकते हैं तो अपना मार्केट ही डाउन करते हैं क्योंकि जब तक सत्तारूढ़ दल के साथ हैं तब तक तो ठीक है पर यदि वही दल हार जाये तब? भाई या तो आपके कुछ अपने राजनीतिक विचार हों और आप पूरे तौर पर राजनीति में आ जायें। पर ये हिन्दी ​सिनेमा वाले लोग दोनो नावों की सवारी करना चाहते हैं और कुछ तो पावर के लोभ में राजनीति की ओर दौडते़ हैं।

ना जी विजय बाबू भाजपा कभी ये काम ना करती यदि धर्मेन्द किसी विपक्षी दल के टिकट पर खड़े होते। भाजपा कभी व्यक्तिगत जीवन पर आक्षेप ना लगाती। भाजपा की ट्रेनिंग ही ऐसी नहीं है। भाजपा कभी शालीनता नहीं छोड़ती। सारी दुनिया जानती रही है बच्चन परिवार की नेहरू–गांधी परिवार से निकटता को। पर जब अटल जी पी.एम थे तो एक समारोह में डा. हरिवंश राय बच्चन की जमकर तारीफ की थी और ग्वालियर का उनसे जुड़ा हुआ कोई प्रसंग सुनाया था। अशोक बाबू गर्व से बोले।

अशोक जी आप मेरा मुँह न खुलवाओ। चलो आप पहले बच्चन जी की ही बात ले लो। अटल जी ने बच्चन जी की तारीफ की होगी उनके रचे साहित्य के कारण। बच्चन जी के साहित्य की गुणवत्ता और उनकी प्रसिद्धि से सब वाकिफ हैं। हरेक के अपने अपने क्षेत्र हैं। अब आप ये बुरा न मान जाना कि मैं अटल जी की कविताओं की बुराई कर रहा हूँ या उन्हे साहित्यकार के रूप में कम आँक रहा हूँ। पर हाँ उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले हमने कभी उनकी कविता नहीं सुनी थी। मुझे याद है कई साल पहले अटल जी अमेरिका गये थे किसी सर्जरी के ​सिलसिले में और वहाँ से धर्मयुग या नवभारत टाइम्स के लिये एक संवेदनशील लेख लिख कर भेजा था। बहुत अच्छा लगा था पढ़कर। उनके साहित्यप्रेमी होने और अच्छा लिखने की क्षमता के बारे में तो कोई सन्देह है नहीं।

थोड़ा ठहरकर विजय बाबू बोले अब बच्चन जी तो रहे नहीं। पर जब अमिताभ बच्चन इलाहाबाद से एम.पी. थे और वी.पी.सिंह सारे देश में राजीव गांधी के विरूद्ध बोफोर्स की अलख जगाते हुये घूम रहे थे तो अटल जी ने भी सारे भारत में बच्चन और नेहरू–गांधी परिवार के खिलाफ मोर्चा संभाला हुआ था। हमने तो तभी अटल जी को साक्षात सुना था। अटल जी ने गरज कर कहा था कि बच्चन जी कहते हैं कि यदि उनके पुत्रों को परेशान किया गया तो वे भी जबान खोल देंगें। अटल जी ने बच्चन जी को मुँह खोलने की चुनौती दी थी और ललकार कर कहा था कि बच्चन परिवार को बताना पड़ेगा कि बोफोर्स की दलाली का पैसा कहाँ गया। तब ये बच्चन परिवार की किसी लोटस कम्पनी का जिक्र किया करते थे।

अजी अटल जी राजनीति में थे तो ​स्थितियों का फायदा तो उठाते ही। वे विपक्ष में थे उनका काम ही था मामले को हर जगह उठाना। वे भला क्यों बच्चन या राजीव गांधी परिवार पर लगे आरोपों से मुक्त होने में उनकी सहायता करते।। अशोक बाबू कुर्सी पर कमर पीछे टिकाते हुये बोले।

…जारी…

दूसरी किस्त : बतकही – सोनिया गाँधी और संघ परिवार

तीसरी किस्त :बतकही – उदारीकरण और भारत

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