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फ़रवरी 14, 2017

फीरोजी होठ … धर्मवीर भारती

purple-001इन फीरोजी होठों पर

बरबाद मेरी जिंदगी

इन फीरोजी होठों पर |

गुलाबी पांखुरी पर हल्की सुरमई आभा

कि ज्यों करवट बदल लेती कभी बरसात की दुपहर

इन फीरोजी होठों पर |

तुम्हारे स्पर्श की बादल-धुली कचनार नरमाई

तुम्हारे वक्ष की जादू भरी मदहोश गरमाई|

तुम्हारी चितवनों में नर्गिसों की पाँत शरमाई

किसी भी मोल पर मैं आज अपने को लुटा सकता

सिखाने को कहा

मुझसे प्रणय के देवताओं ने

तुम्हे आदिम गुनाहों का अजब-सा इन्द्रधनुषी स्वाद!

मेरी जिंदगी बरबाद!

अंधरी रात में खिलते हुए बेले-सरीखा मन

मृणालो की मुलायम बांह ने सीखी नहीं उलझन

सुहागन लाज में लिपटा शरद की धूप-जैसा तन

पंखुरियों पर भँवर के गीत-सा मन टूटता जाता

मुझे तो वासना का

विष हमेशा बन गया अमृत

बशर्ते वासना भी हो तुम्हारे रूप से आबाद

मेरी जिंदगी बरबाद!

गुनाहों से कभी मैली पड़ी बेदाग़ तरुणाई-

सितारों की जलन से बादलों पर आंच कब आई ?

न चन्दा को कभी व्यापी अमा की घोर कजराई

बड़ा मासूम होता है गुनाहों का समर्पण भी

हमेशा आदमी

मजबूर होकर लौट आता है

जहां हर मुक्ति के, हर त्याग के, हर साधना के बाद!

मेरी जिंदगी बरबाद!

(धर्मवीर भारती)

नवम्बर 12, 2013

गंगा@वाराणसी

बहुत मुश्किल हैBenaras

गंगा तीर पर बैठकर

गंगा पर कुछ लिखना !

शरद की सांझ की सिमटी नवयौवना

या कि ग्रीष्म की सुबह की सकुचाती ललना

और या भादों की उफान भरी कामातुरा

घाटों पर आए न आए

मसि-कागद समेत मन को बहाए ले जाती है!

आप छंदों में उसे बाँधने को कहते हैं

या कि कटोरा भर पानी से उसे परखने को

और या मेरी क्षुद्रता से उस असीम को तौलने को

समझ में आए न आए

शुभ्र-कलुष समेत मन को बहाए ले जाती है!

Yugalsign1

अप्रैल 30, 2013

अनउगी झील शरद की

आज फिर से उग आयी है एक शाम

आसपास हिरण्यमय वृत्त लिए

कंधे पर घटाएं फैलाए|

दो  तृषित हाथों से

एक चाँद

अमृत बरसा रहा है |

एक अनउगी सपनीली झील के

आँगन में खिले कमल से

पंख पसारे

खेलता है कोई जलपांखी लहरों के खेल

पानी के सुमेरु उछालता

जगाता सहस्त्रों अनगाये गीत|

आज कोई एक

मन-सा मन

पलों और क्षणों को तराशता

समय को बाहों में भींचता

धरती से पवन और पवन से

धरती को गंधमान करता

पोर बना,

सेतु बना,

बैठा रहेगा|

अंधेरी रात में,

चाह ने

राह भूलने की आशंका ने

आँख के अलावा

आसमान पर

हजारों दिए जला दिए हैं|

अलभ्य स्वर पास नहीं

अरण्य कथा कैसे गाये

भागवत स्वर में |

ओ  अनागत

अनंत प्रतीक्षा सहेजता

कोई

कितनी रातें लिखता रहेगा तुम्हारे नाम

इस अनउगी झील के किनारे?

सुबह चम्पा – सी संध्या |

और दोपहर अकेलीदूर कहीं बांसुरी की धुन पर

अलसाई बीन पर बजती

मेरी

तुम्हारी

सब की ही

एक-सी परेशानियां

जीवन पहेली|

(डा. कृष्णा चतुर्वेदी )

जुलाई 30, 2010

कवि शरद की कलम से

प्रसिद्ध कवि “शरद” की ख्याति में हिन्दी में गज़ल रचने की भी बड़ी भूमिका रही है। उन्होने हिन्दी गज़ल में प्रयोग भी किये। प्रस्तुत है उनकी एक बहुत पुरानी गजल

काँटों की ओट लिये मैंने फूलों को चुभते देखा है
ये बात अगर कह दूँ सबसे बदनाम चमन हो जायेगा।


विरह का पत्थर छूने से हर दिल सोना हो जाता है
ये बात अगर कह दूँ सबसे बदनाम मिलन हो जायेगा।


रज़कण की अपनी आदत है नीलाम नहीं वह होता है
ये बात अगर कह दूँ सबसे बदनाम रत्न हो जायेगा।

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