Posts tagged ‘Shah’

मई 8, 2013

मौत की दौड़

मौत ने एक दौड़ आयोजित की हुयी है

और हम सब अभिशप्त हैं उसमें हिस्सा लेने के लिए,

जीवन में भले ही कुछ भी निश्चित न हो

पर अनिश्चितता तो मौत की तरफ दोस्ती का हाथ भी नहीं बढ़ा सकती|

चाहे तो हम दौड़ लें, दौड़ते रहें

या आराम से बैठ जाएँ, लेट जाएँ, सो जाएँ

कितनी भी, किसी भी तरह की उठा-पठक कर लें

कैसी भी साजिश रच लें,

कैसे भी इंतजाम क्यों न कर लें

पर किसी भी हालत में,

हरेक अवस्था में,

जिंदगी के भागते, लडखडाते और सुस्ताते क़दमों को रोकने

 मौत, सधी चालें ले सामने आ ही खड़ी होगी-

ये देगी  शह और

वो  होगी मात!

…[राकेश]

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सितम्बर 25, 2011

शाह या फकीर, मरना दोनों को है

गुलेल की जिद है देखे, कहाँ तक पत्थर जाता है
उसे कौन समझाए घरों का शीशा बिखर जाता है

शाम ढले जब पंछी भी नीड़ों को लौटने लगते हैं
एक शख्स घर से निकल के जाने किधर जाता है

मेरी प्यास किसी निगाहें करम की मोहताज नहीं
इस फकीर का प्याला तो खुद से भी भर जाता है

यही मजबूरी तो है जिंदगी की सबसे बड़ी मजबूरी
शाह हो के फकीर आखिर में आदमी मर जाता है

उजाले के तलाशी पाँव के इन छालों से डर कैसा
दीपक से सूरज तक लपटों का रहगुज़र जाता है

ताज बने कि मशीने चले जीवन भूखों के रोते हैं
हाथ नहीं जाते आलम, इस दौर में हुनर जाता है

(रफत आलम)

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