Posts tagged ‘Shabnam’

सितम्बर 13, 2013

आओ हम तुम चन्दा देखें

Moon

लहरों के इन हिचकोलों पर

आज नाव में संग बैठकर

साथी हसीं रात में गाते

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

नर्म हथेली को सहलाएं

भावों में शबनम पिघलाएं

जल में अपने पाँव हिलाते

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

धडकन जब लहरों पर धडके

अधरों पर बिजली सी तड़के

कोई भारी कसम उठाते

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

चन्दन के पेड़ों से लिपटकर

खुशबू के घेरे में सिमटकर

करते कभी महकती बातें

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

देखो रात जा रही है घर से

कोई गज़ल गा रही स्वर से

दामन में ले सुर-सौगातें

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

{कृष्ण बिहारी}

Advertisements
अक्टूबर 3, 2011

तारों पार कोई रोया

कमरे की दीवारों के
सो जाने के बाद
करवटों से उकताई हुई आंखें
छत को तक रही थीं
यूँ ही जाने क्यों ढ़लके
दो आंसू
जैसे कहते गए
तू ही नहीं दुखी
दूर तारों के पार
कोई तुझको रोता है
सुबह फूलों पर पड़ी शबनम
गवाह थी
दूर तारों के पार
ज़रूर कोई रोया था

(रफत आलम)

अप्रैल 18, 2011

उसकी याद में

गोरे गाल पर
चुम्बन का निशान
कितनी देर ठहरता है
फूल का दिल चीर कर
लम्हों में
उड़ जाती है शबनम
मेरी दोस्त
तुम भी थी
चाँदनी की नाज़ुक रूह
तुम्हे धूप में मरना ही था

गमले में खिला हुआ फूल
पल–पल मुरझाता है
उसने भी
मेरी बाहों में
तिल-तिल मर के
दम तोड़ दिया
मजबूर और बेबस मैं
वक्त को कब पकड़ पाया

मुझसा बेदर्द कौन होगा
माटी के अँधेरे घर में
सुला कर उसे
आंसू और गुलाब सजा कर
कब्र के पास बैठा हूँ
चुपचाप
सदा के लिए

माँ कहती थी
मरने वाले
आकाश में
जगमग तारे बन जाते हैं
शहर की चकाचौंध में
आकाशगंगा कब दिखती है
गांव लौट रहा हूँ
जहाँ
अब भी आकाश निर्मल है
तेरी कब्र के पास

लम्हों की सवारी पर
जारी है जिंदगी का सफर
साथ था सलोना एक हमराही
जो छोड़ कर
मुझे दरबदर
सौंप गया दिन-रात की आवारगी
न राह है अब न मंजिल कोई
रूठी हुई है मुझसे
बेवफा मौत भी

(रफत आलम)

%d bloggers like this: