Posts tagged ‘Saundarya’

जुलाई 18, 2011

दहशत

आजकल मै डरा हुआ हूँ
यह एक रचनाकार का डर है
शब्द ही नहीं मिलते मुझे कि
लिखूँ
विज्ञापन में नंगी देह दिखाती युवती की
विशेषतायें क्या हैं।
उसकी वाइटल स्टेटिस्टिक्स मुझे किस तरह
लुभाती है
कि मैं दो बच्चों का बाप,
और बच्चे भी बड़े हो गये हैं
किस तरह महसूसता हूँ ऐसे पलों को।

सुगंधित साबुन से नहाती युवती की
महकती देह
सुडौल गोल और चिकनी जाँघों को
सहलाना चाहता हूँ,
स्क्रीन पर ही सही
तो क्या यह पाप है?

मुझे औरत की छातियाँ और गोलाइयाँ
खींचती हैं अपनी ओर
उनके आधे-अधनंगे ब्लॉउजों में
जहाँतक झाँक सकता हूँ
डाल देता हूँ आँखें
दिखते सौन्दर्य को न देखना
उसका अपमान है।

सौन्दर्य भी तो वस्तु नहीं
आँखों में होता है
न देखूँ तो
आँखों का होना बेकार है।

मगर पूछना चाहता हूँ कि
इन ब्लॉउजों की डिजाइन
किसने की है?
जिसने की है
उसका मकसद क्या है?
और पहनने वालियाँ क्या
पाना चाहती हैं?

एक कॉम्प्लीमेंट कि
यू आर ब्यूटीफुल…
लुकिंग गॉर्जियस…
स्टनिंग…?
यकीन मानिये
बहुत सी महिलायें
इन्ही आधे-अधूरे वाक्यों से
हो जाती हैं
लहालोट।

फिर जो कुछ होता है
उसी को लिखना चाहता हूँ मैं
मगर मुझे शब्द नहीं मिलते है
क्योंकि,
बाद की स्थितियों को
गंदगी उपजाने वाला यह लिथड़ा समाज
अश्लील कहता है।

घुटनों को मोड़कर
एड़ियों पर नितम्बों को टिकाए
बैठी जवान औरतों को
घूरने वाले
लपलपाती जीभ निकाले मर्दों को
जब देखता हूँ,
उन्ही में से मैं भी हूँ,
तो डर जाता हूँ
कि
एक दिन जब सारी गोलाइयाँ
लटककर झूल जायेंगी
हड्डियों से प्यार करता माँस
चिचुककर लटक जायेगा
तब वह कितनी खूबसूरत लगेगी
तब कितना खूबसूरत दिखूँगा मैं?

यह एक ऐसी दहशत है
जो जवान और सुंदर दिखती औरत को
मेरी नज़रों में एक पल में
अचानक बियावान और बदसूरत
बना देती है।

औरत, समाज और अपने बारे में
जो मैं कहना चाहता हूँ
लिखना चाहता हूँ
उसके लिये जितने शब्दों का प्रयोग करुँगा
वे सभी शब्द आज की भाषा में
असंसदीय हैं।

मैं डरा हुआ हूँ
शब्दों के प्रयोग से
कि कहीं माफी न माँगनी पड़े
आवारा ताकतों से
मैं गालियाँ देना चाहता हूँ सबको
मगर मुझे शब्द नहीं मिलते।

{कृष्ण बिहारी}

अप्रैल 20, 2011

बाबाजी, मैं और औरत

बाबाजी
तुम ब्रह्मचारी
तुम्हारी सोच के अनुसार
औरत नरक का द्वार।

लेकिन
मैं तो ब्रह्मचारी नहीं
दिखने में भी
ढ़ोंगी- पुजारी नहीं
मेरे लिये तो
हर औरत खूबसूरत है
बशर्ते यह कि
वह औरत हो।

तुमने जिसे नकारा
धिक्कारा
और अस्पर्श्य विचारा है
उसके आगे मैंने तो
समूचा जीवन हारा है।

मेरी दृष्टि से देखो कभी
तो जानोगे
नरक का वह द्वार
कितना प्यारा है।

सिर से पाँवों तक
औरत में क्या नहीं
कभी देखो तो सही
दूर से उसके लहराते कुंतल
सुराहीदार गर्दन
गालों में गड्ढ़े
ओठों पर हलचल
कंधों से नीचे
कमर के कटाव
और कमर से नीचे
नितम्बों के भराव
हटती नहीं है दृष्टि
अगर फंस जाये
दैहिक आकर्षण में।

बाबाजी
कुछ तो सोचो
क्या रखा है तुम्हारी सोच,
और ऐसे ही जिये जाते,
किये जाते आत्मतर्पण में?
कभी ध्यान से देखो
औरत के वक्ष
और सोचो कि
ईश्वर ने उन्हे केवल
बच्चे के हाथों का खिलौना
या फिर उसके लिये
दूध का भरा दोना
ही बनाया है
या फिर पुरुषों की नज़रों को
चकाचौंध, हतप्रभ या फिर
आबद्ध स्थिर करते हुये
अद्वतीय सौन्दर्य दिखाया है।

बाबाजी
प्रकृति को कभी
कपड़ों का बोझ ढ़ोते देखा है?
नदी को अपनी अनावृत्त
बासन्ती देह धोते देखा है?
सांगोपांग स्नान करती नदी को
नहाते हुये देखो।

बाबाजी
महसूसो पुरुष होने की वासना
जिओ एक जीवन पूरा
कहते हैं कि
औरत के बिना
की गयी पूजा
मनाया गया उत्सव
होता है आधा-अधूरा।

हर औरत माँ   नहीं होती
बहन नहीं होती
मित्र नहीं होती
बीवी नहीं होती
पर
हर औरत
औरत अवश्य होती है।

उसके लिये भी
हर शख्स पिता नहीं होता
भाई नहीं होता
वह भी सोचती है
बहुत कुछ खोजती है
आदमी में।

कैसी विडम्बना है कि
उसे आज तक
अपना पुरुष
अपने ढ़ंग से मिला नहीं
मगर ताज्जुब है कि
उसके ओठो
पर गिला नहीं।

बाबाजी
एक बात और
मैं अधम और कामी
मुझ पर हावी
कमजोरियाँ और इंद्रियगत गुलामी
इसलिये मेरी ही दृष्टि को
मत अपनाओ
औरत के बारे में जो संतों ने कहा है –
बूड़ा वंश कबीर का…
नारी की झाईं परत…
औगुन आठ सदा उर रहहीं…
भूल जाओ
कुछ व्यापक और
मौलिक दृष्टिकोण बनाओ।

देखो उसे सोचो उसे
भाषा और भूमि से परे
वह मात्र खेती ही नहीं
बेटी भी है।
उसकी शुचिता और
रक्षा की जिम्मेदारी
भावी समाज के निर्माण में
उसकी रचनात्मक हिस्सेदारी
हम पर नहीं तो किस पर है?

{कृष्ण बिहारी}

%d bloggers like this: