Posts tagged ‘Sard’

फ़रवरी 2, 2014

खूबसूरत रात…

कल रात बहुत खूबसूरत थीakhiri-001

आँखों में गुजरी

फिर भी  बहुत छोटी थी

कल रात

मेरा चाँद मेरी बाँहों में पिघला था

सुलगते बदन में

कैसे कोई कैसे रह सकता है?

सर्द चांदनी की अगन तब से तारी है हम पे

ये रात इतनी कम क्यों थी?

Rajnish sign

दिसम्बर 4, 2013

सर्द काली रात का इलजाम

इंतज़ार की रातेंtum-001

ठंडी

काली

लम्बी अँधेरी  सुरंग जैसी

पता  नहीं

रहूँगा भी या नहीं

मिलने तक

एक कतरा रौशनी|

तुम न थीं जब

तो जिंदा था ही

पर दुनिया ऐसी ही थी…

बस खुद में मैं नहीं था,

बदला क्या है तुमसे…

मैं कभी समझूंगा भी या नहीं…

तुम्हारे न होने से मैं

मर तो नहीं जाऊँगा लेकिन…

तुम्हारे बाद लेकिन फिर

मैं…

मैं रहूँगा भी या नहीं…

हरेक तन्हाई में तुम मेरे पास होती हो

तुम्हारे बिन

हरेक महफ़िल में

तन्हा ही रहूँगा मैं…

तेरी निगाहें-मुहब्बत का अहसान है मुझ पे

औ’ मेरी हर सर्द काली रात का  इलजाम  है तुझ  पे

Rajnish sign

नवम्बर 10, 2013

रात भर चाँद मुस्कराता रहा

moonlit-001न मैं तुम्हे

जानता था

न तुम मुझे,

पर चाँद,

हम दोनों से

परिचित था

रात भर सर्द हवा

चलती रही

सिहराती रही,

रात भर चाँद

मुस्कराता रहा

एक मुट्ठी मैं,

एक मुट्ठी तुम

मिले, घुले

फिर हवा हो गये

Yugalsign1

जुलाई 5, 2011

अहसास जो तुम्हे जीवंत रखता है

जीवन के
सर्द कठिन दिनों में
आसमान में
एक बादल का टुकड़ा
मन व्याकुल कर देता है
सूरज की गर्मी से
वंचित होने के अहसास से
तपती दोपहरी में
तपते हाँफते वदन को
यही वह बादल का टुकड़ा
मन
अलाह्दित ,हर्षित कर देता है
वर्षा की बौछार की
राहत देने वाली
आशा से
फिर वर्षा ऋतु में
यही बादल का टुकड़ा
भयभीत….
आतंकित कर देता है
जोर की वर्षा से
होने वाली
तबाही से
और यही बादल का टुकड़ा
हेमंत में फिर
शरद आने का
आभास दिलाकर
फिर व्याकुल कर देता है
सतरंगी खिली धूप के साथ
सुगन्धित खिलते फूलों की
मुस्कान से मदमाती खुशी
लेकर आते
बसंत की
आहट तक
बादल का यह टुकड़ा मन है
और
आत्मा सूरज है
सूरज के इर्द-गिर्द घूमते
बादल के टुकड़े
और
आत्मा के इर्द-गिर्द घूमते
मन का अहसास
एक जैसा ही है
जैसे बादल का टुकड़ा
अल्प काल के लिए
सूरज को छिपा तो सकता है
लेकिन उसके होने के
अहसास को
मिटा नहीं सकता
ठीक जिस तरह मन
अल्प काल के लिए
आत्मा को भ्रमित
तो कर सकता है
लेकिन उसके होने का
अहसास नहीं मिटा सकता
मौसम
ऋतु परिवर्तन
स्वाभाविक है
नियति है
इसीलिए तो
परिवर्तित होता है मन
व्याकुलता और हर्षता में
लेकिन हर स्थिति
परिवर्तन में
यही एक अहसास
तुम्हे जीवंत रखता है
और सुख देता है कि
बादल से मन के
टुकड़े के पीछे
सूरज सी आत्मा की रोशनी
सदैव महसूसती
और
अहसासती है!

(अश्विनी रमेश)

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