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सितम्बर 23, 2016

रचना बच जाना है … (रमेशचंद्र शाह)

rameshchandra-shahरचनात्मक घटने की प्रक्रिया की अनुभूति को हर कलाकार अपने स्तर पर देखता, स्वीकारता और ग्रहण करता है| कुछ सोचते और कहते हैं – उन्होंने रचा, कुछ कहते हैं – वे माध्यम बन गये और रचना रच गई| अपने देश, काल और वातावरण से जूझ कर बहुत कुछ ऐसा होता है जो कलाकार के रचनात्मक कार्य करने की इच्छा और बोध को उद्वेलित कर जाती है और वह उस सत्यांश को अपनी कला का रूप दे देता है|

कम ही कलाकार अपने रचनाकर्म की प्रक्रिया पर खुल कर बोलते हैं| वरिष्ठ कवि श्री रमेशचंद्र शाह इस पर एक कविता ही रच गये|

रचना बच जाना है|

अपने और तुम्हारे

सबके

विष का

पच जाना है|

मैं

जो रचता नहीं

न रच पाने की कुण्ठा

भी सह सकता नहीं

वही

मैं

कैसे

किस मुँह से

कह दूँ —

तुम सबसे ज्यादा

मैंने

हाँ मैंने

सच को

जाना है

रचना

बच जाना है|

(रमेशचंद्र शाह)

मार्च 16, 2013

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

चाहे यह ज़िंदगी खंगालो

या तुम इसकी रूह निकालो

ठंडी आहें नहीं भरूँगा

सब कुछ चुपचाप सहूंगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

मैंने कभी विरोध न माना

हर अनुरोध तुम्हारा माना

मान तुम्हारा रख पाऊं

मैं यह कोशिश दिन रात करूँगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

दुख से मेरा वैर नहीं है

कोई रिश्ता गैर नहीं हैं

यदि वह मेरा साथ निभाए

तो मैं उसके साथ रहूंगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

बहुत मौत से डरते होंगे

वे जीते-जी मरते होंगे

मैं उनमे से नहीं बंधु !

जो समझौतों की मार सहूंगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

तुम भटको तो वापस आना

मन में कोई बात न लाना

दरवाजे पर जब पहुंचोगे

तुम्हे द्वार पर खड़ा मिलूंगा

तब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

{कृष्ण बिहारी}

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