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मार्च 20, 2015

सूरज को नही डूबने दूंगा …(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

अब मैं सूरज को नहीं डूबने दूंगा।
देखो मैंने कंधे चौड़े कर लिये हैं
मुट्ठियाँ मजबूत कर ली हैं
और ढलान पर एड़ियाँ जमाकर
खड़ा होना मैंने सीख लिया है।

घबराओ मत
मैं क्षितिज पर जा रहा हूँ।
सूरज ठीक जब पहाडी से लुढ़कने लगेगा
मैं कंधे अड़ा दूंगा
देखना वह वहीं ठहरा होगा।

अब मैं सूरज को नही डूबने दूँगा।
मैंने सुना है उसके रथ में तुम हो
तुम्हें मैं उतार लाना चाहता हूं
तुम जो स्वाधीनता की प्रतिमा हो
तुम जो साहस की मूर्ति हो
तुम जो धरती का सुख हो
तुम जो कालातीत प्यार हो
तुम जो मेरी धमनी का प्रवाह हो
तुम जो मेरी चेतना का विस्तार हो
तुम्हें मैं उस रथ से उतार लाना चाहता हूं।

रथ के घोड़े
आग उगलते रहें
अब पहिये टस से मस नही होंगे
मैंने अपने कंधे चौड़े कर लिये है।

कौन रोकेगा तुम्हें
मैंने धरती बड़ी कर ली है
अन्न की सुनहरी बालियों से
मैं तुम्हें सजाऊँगा
मैंने सीना खोल लिया है
प्यार के गीतो में मैं तुम्हे गाऊँगा
मैंने दृष्टि बड़ी कर ली है
हर आँखों में तुम्हें सपनों सा फहराऊँगा।

सूरज जायेगा भी तो कहाँ
उसे यहीं रहना होगा
यहीं हमारी सांसों में
हमारी रगों में
हमारे संकल्पों में
हमारे रतजगों में
तुम उदास मत होओ
अब मैं किसी भी सूरज को
नही डूबने दूंगा।

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

दिसम्बर 2, 2013

अब ये पौधा हरा न होगा

ये राज ही रहा मेरे लिए किkabl-001

कैसे,

आखिर कैसे

तुम जान जाती थी

कि मैंने साहस जुटा लिया है

तुमसे प्रणय निवेदन का

दिल की बातें कहने का,

सैकड़ों बार की कोशिश के बाद

जब जब मैंने हिम्मत की कि कह दूँ

‘मुझे तुमसे प्यार है’

तुम ने आग भर ली अपनी दृष्टि में मेरे लिए

वे  सारे निशान जो कहते थे तुम्ही मेरी मंजिल हो

अपने हाथों मिटा दिए तुमने

कैसे  जान गई थीं तुम कि

मैंने स्वीकार कर लिया है

कि तुम मेरे लिए क्षितिज का सूर्य हो

मैं पा नहीं सकता तुम्हे

और तब जब मैं हार मानने वाला ही था

तुमने  आँखों में प्यार भर

हंस कर बस ठीक तभी तुम ने कह दिया था

“तुम कितने प्यारे हो! मुझे तुम्हारा साथ बहुत पसंद है”

कैसे आखिर कैसे जान जाती थी तुम?

जब आज तुम मेरी नहीं

तुम को पाने की कोई आशा नहीं

सच कहूँ तो अब कोई हसरत भी नहीं

क्यूँ तुम ने ये कह दिया

“तुमने कभी कहा होता”!!

कैसे आखिर कैसे आज फिर तुम ने ये जान लिया

कि अब इस  पौधे की जड़े मर चुकी हैं

अब ये हरा नहीं होगा

Rajnish sign

जुलाई 23, 2011

कल और आज

अब कोई चरवाहा
बाँसुरी की सुरीली तान पर
प्रेम गीत नहीं गाता
और न ही कोयल कूकती
चिड़िया भी बहुत कम चहचहाती है
घर की चहेती गाय
जिसका दूध कई पीढ़ियों तक
अमृत पान की तरह पिया
उसके  ढूध न देने के बाद
उसे बेकार समझकर
सडकों पर आवारा घूमने
धक्के और डंडे खाने के लिए
बेसहारा छोड़ दिया
अब कोई बच्चा भावुकता भरे स्वर में
माँ को
अम्मा कहकर नहीं पुकारता
अब खेत में स्वस्थ लहलहाती फसलें नहीं
कीटनाशकों को पीने वाली
नशीली फ़सलें उगती हैं
गांव में बड़े बूढ़ों की
अब कोई चौपाल नहीं बैठती
जिसमे कभी
सुख दुःख की बातें हुआ करती थीं
अब तो घर में
बूढ़ों को बोझ समझकर
बच्चे भी उनको धक्के मारते हैं
और कुत्ते की तरह
उनको दूर से रोटी फेंकते हैं
और जवान ये सब
मौन होकर देखतें हैं
ये सब देखकर
मेरे मन में
बस रोज यही सवाल
घूमता है कि
ये इन्सानियत की नयी उन्नति है
या फिर
उपभोक्तावाद की लादी हुयी बेबसी
कुछ भी हो
मेरे पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं कि
शरीर ढ़ोया जा रहा है
या फिर
जीवन धीरे धीरे बेमौत मर रहा है
यदि उपभोक्तावाद से बेबस व्यक्ति
केवल शरीर ढ़ो रहा है
और चेतना कहीं
अंधकार के गर्त में खो गयी है
तो यही कहना होगा कि
उपभोक्तावाद की इस भयानक आंधी में
यदि तुम चेतना के
दीपक की लौ अपने घर के अंदर भी
जलाए रख सको तो भी
सत्य तुम्हे इस साहस के लिए भी
दुगुनी हिम्मत, ताकत देगा
और तुम यह हिम्मत कर बैठोगे कि
तुम्हे शरीर ढोने वाली
उधार की ज़िंदगी नहीं
बेशक दिन में कुछ पलों के लिए ही सही
मानवीय संवेदना वाली
कुदरत की दी हुई
स्वाभाविक ज़िंदगी जीनी है!

(अश्विनी रमेश)

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