Posts tagged ‘Safar’

दिसम्बर 19, 2013

चश्म मीठे पानी का रेगिस्तानी सफ़र में आएगा

रात भर नज़र में सपने भीगते रहे desert-001
हर आती जाती सांस में तुम थे
खुश थे हम

के…

इंतज़ार मक़ाम पायेगा…
जिसके अरमां में नींदें कुर्बान की
वो रुख बा-नकाब सही…

आएगा,
नज़र झुकाए शरमाया शरमाया सा
ज़ुल्फ़ चेहरे पे गिराए हुए आएगा
अल-सुबह से दिल में सुकून सा था
हर आहट ने कहा “लो आ गए वो”
थक गए तो मेरे ही कन्धों पे सो गए
तारे तमाम रात मेरे साथ जागे थे
आ भी जा के यकीन हो चले…
इंतज़ार के बाद सही
एक चश्म मीठे पानी का

रेगिस्तान के इस सफ़र में आएगा

Rajnish sign

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नवम्बर 26, 2013

कुछ देर पुकार…चला जाऊँगा

किसने क्या कहाsilsila-001

किसने क्या सुना

तुमने ये किया

मैंने वो नहीं किया

तुम ऐसी ही हो

तुम वैसे ही हो

तुम ये हो

तुम वो हो

आज भी ये सवाल सुलझाने में

बाकी सब सिरे उलझ जाते हैं

कुछ हो न हो हम में

प्यार तो शर्तिया नहीं रहा कभी

प्यार शायद कुछ और होता होगा

जो मैंने किया…

नहीं किया…

पता नहीं…

तुमने किया…

नहीं किया…

पता नहीं…

सब कुछ ऐसे ही होना था शायद

ऐसे नहीं होना था तो फिर कैसे होना था?

और अगर ऐसे नहीं होना था

तो फिर ऐसे हुआ ही क्यूँ?

इसलिए तुम परेशान न होना मेरे लिए कभी

खुद को इलज़ाम भी न देना कोई

मेरा क्या है?

मैं चंद आवाजें और दूंगा

फिर चला जाऊंगा…

तुम्हारी इसी गली में

जहाँ मेरा चाँद उगा करता था

ये तन्हाई की रात भी गुज़ारूंगा

और निकल जाऊँगा|

आवारा भटकते हुए आ निकला था

या

यहीं आना था

तुम ले आयीं हाथ पकड़

या

मैं आया खुद

मालूम नहीं|

कहते हैं नज़रें हसीं होती है…

मैं भी कुछ लाया था

क्या लाया था…

मालूम नहीं…

हां आज भी कुछ है मेरी आँखों में

कुछ है मगर कोई शिकवा

कोई  शिकायत तो नहीं

मैं आवारा बेहिस बादल की तरह

थोडा सा बरसूँगा…

चला जाऊंगा…

तुम परेशान न होना कभी मेरे लिए….

ज़िन्दगी के सफ़र में सौ मोड़ आयें चाहे

किसी भी मोड़ पे तुम को अहसास-ऐ-तन्हाई न मिले

हर मोड़ पे किसी का साथ रहे

आज के बाद से हर तन्हा रात मेरी

मैं किसी भी तरह गुज़रता चला जाऊंगा

तुम परेशान न होना कभी मेरे लिए

खुद को इलज़ाम भी न देना कोई

मेरा क्या है…

कुछ देर पुकारूँगा…

चला जाऊँगा…

Rajnish sign

फ़रवरी 27, 2013

बस ऐसे जीवन बीत गया

कितने तूफानों से गुजरा

कितनी गहराई में उतरा

दोनों का ही कुछ पता नहीं

बस ऐसे जीवन बीत गया |

राजीव-नयन तो नहीं मगर मद भरे नयन कुछ मेरे थे

इन उठती-गिरती पलकों में खामोश सपन कुछ मेरे थे |

कुछ घने घनेरे से बादल

कब बने आँख का गंगाजल

दोनों का ही कुछ पता नहीं

बस ऐसे जीवन बीत गया

कब कैसे यह घट रीत गया|

जगती पलकों पर जब तुमने अधरों की मुहर लगाईं थी

तब दूर क्षितिज पर मैंने भी यह दुनिया एक बसाई थी |

कितनी कसमें कितने वादे

आकुल-पागल कितनी यादें

दोनों का ही कुछ पता नहीं

किस भय से मन का मीत गया

मैं  हार गया वह जीत गया|

तुम जब तक साथ सफर में थे, मंजिल क़दमों तक खुद आई

अब मंजिल तक ले जाती है मुझको मेरी ही तन्हाई|

कब कम टूटा कब धूप ढली

उतरी कब फूलों से तितली

दोनों का ही कुछ पता नहीं

कब मुझसे दूर अतीत गया

बस ऐसे जीवन बीत गया

{कृष्ण बिहारी}

अक्टूबर 13, 2011

मुक्त हो अर्थहीन काया

कभी आँखों से गिरे होंगे अश्रु
पानी की बहती बूंदे थाम लेने के वास्ते
तब, एक रेशमी आँचल था।

आसान था धूप का सफर भी
घनेरी जुल्फ के साये में
जिंदगी सुस्ता लेती थी।

फिर चल पड़ता था आशाओं का कारवां
मरीचिकाएं भी उन दिनो
मंजिलों के निशान हुआ करती थीं
हर प्यास का इलाज थे
अमृत भरे होठ किसी के।

समय के घने कोहरे पीछे
छिप गए सायों का ज़िक्र ही क्या?
खुद अपना अस्तित्व तक
बेबसी के अँधकार के पास गिरवी है
ना राह, ना सफर, ना मंजिल की आरजू
बस सोचता है शून्य सा दिमाग
किसी तरह साँसों का क़र्ज़ कटे
किसी तरह हाड-माँस की केद से
मुक्त हो अर्थहीन काया

(रफत आलम)

अक्टूबर 7, 2011

घाटियों में प्रेम की, फिर कोई उतार ले

एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

प्यार से कोई मेरी ज़ुल्फ को संवार दे
बोझ सभी ज़िंदगी के प्यार से उतार दे
हाथ मेरा थामकर हर सफर में वो चले
इस चमन से जो गई वही मुझे बहार दे

प्रसून सा कहीं खिलूँ फिर कोई निहार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

मेरे नयनों में फिर सपने वो जागने लगें
तस्वीर दिल में फिर वही हम टांगने लगें
मंदिरों में, मस्जिदों में मौन होके या मुखर
साथ उम्र भर का झुके माथ मांगने लगें

घाटियों में प्रेम की, फिर कोई उतार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

नज़र मिला नज़र गिरा, ओट में ही मुस्करा
खुले बहुत मगर फिर भी लाज हो ज़रा-ज़रा
इस तरह लगे कि जैसे अंग-अंग भर उठे
धरा अगर लगे परी तो आसमां भरा-भरा
मन के तार छेड़ दे फिर कोई सितार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले

{कृष्ण बिहारी}

मई 1, 2011

जीवन-मृत्यु

जीवन
साँसों की सरगम
मृत्यु
सुर की चिरस्थाई
खामोशी।
……

अनिश्चित सफर की
गाड़ी है जीवन
मुसाफिरों को
अक्सर
रास्ते में उतरते देखा है।
……

बेवफा प्रेयसी है
मृत्यु
फिर भी
इसकी बाहों में आई नींद
कभी टूटती नहीं।
……

गीत गाते रहो
साज़ बजाते रहो
खामोश होने है आखिर
गायक, वाद्य और सुर।
……

अनोखा खेल
अबूझ चालें
तलिस्मी घालमेल
अनूठा खिलाडी
बिसात उलट कर कहता है
मैं जीता।

(रफत आलम)

अप्रैल 27, 2011

पत्थर नहीं हीरा बन

जिंदगी की ठोकरों से
घबरा कर
पत्थर न बन यार!

तेरे भीतर छिपा है हीरा
तलाश उसे
तराश उसे।

माना बहुत लंबा है
सडक पर लुढ़कते फिरने से
मुकुट की शोभा बनने तक का सफर।

बुद्धि और बदन को कठोर कर
हाथ की लकीरों को रोने वाले
उठा हाथ में
कलम हो के कुदाल
पसीने की नदी में बहकर ही
सफलता के सागर की मिलती है थाह।

याद रखना
बिना तपे
सोना निखरता कब है
भीतरी आग अगर नहीं होती
सूरज रात बना रहता।

कटने-छटने-सँवरने की पीड़ा में ही
छिपा है
पत्थर से हीरा बनने का राज़
जिसकी  कुंजी
तेरी पहुँच से दूर नहीं!

(रफत आलम)

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