Posts tagged ‘Saagar’

नवम्बर 30, 2014

अरी ओ करुणा प्रभामय…अज्ञेय

जियो उस प्यार में जो मैंने तुम्हें दिया हैagyeya
उस दुख में नही जिसे बेझिझक मैने पिया है।
उस गान में जियो जो मैंने तुम्हें सुनाया है,
उस आह में नही जिसे मैंने तुमसे छिपाया है।

उस द्वार से गुजरो जो मैंने तुम्हारे लिए खोला है
उस अंधकार से नहीं जिसकी गहराई को
बार बार मैंने तुम्हारी रक्षा की भावना से टटोला है।

वह छादन तुम्हारा घर हो
जिसे मैं असीसों से बुनता हूँ, बुनूँगा,
वे काँटेगोखतो मेरे हैं
जिन्हें मैं राह से चुनता हूँ, चुनूँगा।

वह पथ तुम्हारा हो
जिसे मैं तुम्हारे हित बनाता हूँ, बनाता रहूँगा,
मैं जो रोड़ा हूँ, उसे हथौड़े से तोड़तोड़
मैं जो कारीगर हूँ, करीने से
सँवारता सजाता हूँ, सजाता रहूँगा।

सागर के किनारे तक
तुम्हें पहुँचाने का
उदार उद्यम मेरा होः
फिर वहॉ जो लहर हो, तारा हो,
सोनतरी हो, अरुण सवेरा हो,
वह सब, ओ मेरे वर्ग !
तुम्हारा हो, तुम्हारा हो, तुम्हारा हो।

(अज्ञेय)

जनवरी 1, 2014

सावित्री मंदिर … पुष्कर

सावित्री मंदिर की सीढ़ियों पर savitri-001

अस्ताचल को जाता सूर्य

खूब सिंदूरी हो,

सतरंगी बादलों को

नारंगी कर गया है!

घाटी की हरियाली,

पहाड़ के दोनों छोर पकड़ कर

सांवली सी हो,

मटियाली धरती को

समेट सी गई है!

मंद समीर,

हिचकोले खा- सम और विषम पर

ताल सा देता,

तीखी सी पहाड़ी को

तरंगित कर गया है!

दूर पुष्कर का नीला जल,

नारंगी, हरे और सफ़ेद रंगों के बीच

शांत सागर सा,

मेरे मन को

विश्रांत कर गया है!

रिधिम – रिधिम,

मंद – मंद थाप

पवन की, गगन की, मन की

पड़ती है इस हरी-भरी काया पर

और मेरा तन- शून्य हो गया है !

और मन –

वो उड़ा, वो उड़ा

जैसे में खुद रुई का फाहा

मंद समीर के झकोरे में

तिरता चला जाता हूँ!

परत-दर-परत

मन में शान्ति

तन में विश्रान्ति

देवताओं के द्वार के पास

शायद यही निर्वाण है कि

मैं- खो बैठा – सुध-बुध

तन की, मन की !

और,

पुष्कर के नील जल पर

सावित्री मंदिर से मैंने कहा –

– तीर्थ

दिव्य!

Yugalsign1

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