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सितम्बर 3, 2011

भ्रष्टाचार: कुछ अनबुझे सवाल

एक किसान होकर मैं
पूछता हूँ कि,
बीज बोने से लेकर
फसल काटने तक
किसान, खेत मज़दूर जो
जीतोड़ मेहनत करके
अपनी फसल तैयार करके
मंडी में बेचने ले जाता है
और वहां कौड़ियों के भाव
अपनी फसल बेचने के बाद
खाली हाथ लौटकर
क़र्ज़ के बोझ तले
घुटन भरी जिंदगी जीने को मजबूर
आत्महत्या को विवश होता है,

और

किसान से खरीदी गयी
उसी फसल को
चौगुने दाम बेचने वाले’ दलालों’
और जो खुली बाज़ार व्यवस्था के नाम पर
किसान, मज़दूर के भाग्य से
खुलकर खेलतें हैं
उन मुनाफाखोरों से निबटने का
क्या लोकपाल के पास
कोई उपाय है?

जो किसान, खेत-मजदूर अन्न उगाए
वही पेट भर न खाए
व्यवस्था की इससे बड़ी नाकामी
और कोई है क्या?

यह केवल अन्याय ही नहीं
एक बड़ा अत्याचार भी है
जो रोटी पैदा करे
उसी से रोटी छीन ली जाए
और अन्न
बड़े बड़े ताले लगे गोदामों में
ज्यादा कीमतों के फेर में
भूखे गरीब का पेट भरने के बजाय
सड़, गल कर फैंक दिया जाए
तो ऐसे जमाखोरों से
निबटने के लिए
लोकपाल के पास
है कोई उपाय?

इसलिए
उस शहरी पढे लिखे मध्यम वर्ग
जिसने थाली में पड़ी
गोल रोटी तो देखी है
पर जिसे यह अहसास नहीं कि
इस रोटी के पीछे
किसान खेत मज़दूर की
कितनी पसीने की बूंदे बहीं हैं
भला सोचो वह क्योँ और
कितनी कशिश से
इसके विरुद्ध लड़ाई लड़ सकता है?

सबको रोटी कपड़ा
पैदा करने वाला किसान, खेत मज़दूर
जब तक पेटभर रोटी और
पूरा तन ढकने के लिए कपड़ा
तक भी न जुटा पाएगा
तब तक
भ्रष्टाचार के विरुद्ध
लड़ी जाने वाली कोई भी लड़ाई
इसलिए सफल न होगी

क्योंकि…

अत्याचार और अन्याय
किसी भी किस्म के
भ्रष्टाचार से बढकर होता है!

(अश्विनी रमेश)

अगस्त 10, 2011

भ्रष्टाचार की परिभाषा

भ्रष्टाचार के विरुद्ध
जंग लड़ने से पहले
स्पष्ट करना होगा
भ्रष्टाचार का अर्थ
तय करनी होगी इसकी परिभाषा
ताकि भूखा, नंगा और
खुले आसमान के नीचे
सोने वाला इन्सान कहीं
भ्रष्टाचार के अर्थ की
गिरफ्त में न आ जाए
और यदि ऐसा हुआ तो
प्रकृति-रुप सत्य पर भी
लग जाएगा प्रश्नचिन्ह
क्योंकि
भूखा, नंगा और बेघर व्यक्ति
यदि दिन रात मेहनत कर
रोटी, कपड़ा और मकान न कमा पाया
तो होगा सत्य-प्रकृति और
उसके अंश इन्सान पर
घोर अन्याय क्योंकि
रोटी, कपड़ा और मकान
इन्सान की वह कुदरती जरूरत है
जो उसे शरीर मिलने के साथ मिली है
शरीर प्रकृति का अंश है
शरीर टूटेगा तो
प्रकृति-नियम के प्रति
अन्याय होगा क्योंकि
शरीर प्रकृति है
भूखे नंगे और बेघर इन्सान को
इन्सान ही रहने दो
मेहनत करने का उसका हक
और मेहनत करके
कमाए जाने वाले
रोटी, कपड़ा और मकान को
उससे छिनने का प्रयास न करो
वर्ना वह डाका डालेगा और
चोरी भी करेगा
और तुम उसे भी
भ्रष्टाचारी कहोगे क्योंकि
तुमने अपने समर्थन में
जोड़ना है हर व्यक्ति
ताकि बड़ी भीड़ में
तुम्हे कोई आसानी से पहचान न सके
लेकिन याद रखो कि
भूखा. नंगा और बेघर आदमी
अपना शरीर तो बेच सकता है
अपनी आत्मा नहीं
कभी नहीं
वह बिके हुए शरीर होते हुए भी
तुमसे लाख दर्ज़े अच्छा है
क्योंकि उसने अभी तक भी
तुम्हारी तरह अपनी आत्मा नहीं बेचीं
और यह भूल जाओ कि
प्रकृति नियम
तुम्हारी भ्रष्टाचारी के रुप में
पहचान करने में असमर्थ होंगे
प्रकृति में
भूख और वासना का स्वरुप
स्वतः निर्धारित है
और तुम्हारा निर्दयी अन्त
तुम्हारी अपनी ही वासना से होगा
सत्य हमेशा सत्य ही रहेगा
क्योंकि भूख सत्य है
वासना नहीं
और तुम आज भी
हारे हुए हो
और कल भी
क्योंकि तुम वासना यानि
असत्य के रास्ते पर हो
और असत्य की हमेशा
हार होती है और
सत्य की हमेशा जीत !

(अश्विनी रमेश)

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