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नवम्बर 30, 2013

जलना कब तक…बता दो

हर रात dreamwo-001

जलता हूँ

गलता हूँ

ढलता हूँ

जिस भी रूप में

तेरी नीली लौ जलाती है

जिस भी रंग में तू मुझे ढालती है

हर रोज़…

हर रात…

हर बार तू मुझे एक नया रंग देती है

कितनी और रात

बता

कितनी और रात जलना है

कितनी और रात जलना है मुझे

गलना और

ढलना है मुझे

कितने और रंग बदलना है मुझे

बता कितनी और बार पिघलना है मुझे

एक आखिरी बार तुझमे पिघलने से पहले

बस हरदम  के लिए तेरे रंग में ढलने से पहले

कितनी और बार?

Rajnish sign

मई 7, 2013

प्रेम पत्र

अब असंभव है तुम्हे चिट्ठी लिख पाना

चाहता हूँ कितना खोलूँ खिड़की

जी भरकर पीऊँ समुद्र-पवन

फिर बैठूं लिखने जो दुनिया का

सबसे आवेगपूर्ण प्रेम पत्र हो और उसका हर पैराग्राफ

वर्णन करे एक सुवासित स्वप्न

उस स्वप्न के कुछ-कुछ आलोकित गलियारों से

मैं तुम्हारे होने की जगह जाता

वह चिट्ठी पढ़ने के बाद

मैं जानता हूँ तुम समझ जाती

मृत्यु का शीतल दुर्ग तोड़ने का जादू

मेरी साँसों में सारी ऋतुएँ स्थित हैं

जाड़े की रात में ढूंढोगी यदि बेला

वह मिलेगा मेरे आत्म समर्पण में|

किन्तु असंभव है अब

तुम्हे चिट्ठी लिख पाना,

केवल स्वप्न में अथवा

स्वप्न-सा निरर्थक लगने में

तुम देखोगी, जब आखें

खुली होंगी और अंग प्रत्यंग

मेरी सचेत इच्छानुसार चलेंगे

तुम बनोगी इतिहास ,

एक प्रागैतिहासिक शहर

जो दब गया समुद्र तले और

जिसकी बिखरी एकाध ईंटें

पड़ जाएँगी किसी दर्शक की दृष्टि में|

मैं भी बदल गया काफी |

मैंने तुम्हे खोया या खोया

मेरे जैसे दिखने वाले मेरे अन्य रूप ने?

उसकी आवाज मेरी आवाज सी थी

जबकि उसमें थी शीतलता, प्रच्छन, विद्रूप|

वह रूप मैं होऊं या वह हो

मेरी आत्मा के छुपे अंगार से बनी

एक प्रतिमूर्ति ,

मेरा नाम आज उसका नाम है

उसे मिलेगी आज दुनिया भर की सहानुभूति

मैं अंधेरी रत में

एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ तक चलता रहूंगा,

पूरा आकाश भरा होगा तारों से

न जाने कितनी दूर

और किस समघात से

मैं बनूंगा वह पत्र-लेखक

कई देहांत के बाद

जिसकी इतर सत्ताएँ मर जाएँगी,

निर्मल अतीत के साथ एकाकार होगा

शून्य भविष्य|

मुझे लगता हैशुरू हो गया है मेरा देहांत

झरने के कल-कल बहते शब्दों से

संभावना नियंत्रण कुछ भी नहीं है, सिर्फ

एक सह्रीर के ध्वस्त होने के बाद का

विलाप सुनाई देता है और

मेरे प्रेम पत्र की भाषा भी

सुनाई देती है अस्पष्ट स्वरों में|

(रमाकांत रथ)

उडिया से अनुवाद – राजेन्द्रप्रसाद मिश्र

फ़रवरी 17, 2013

सारा सावन पिघल न जाए

वही कहानी मत दुहराओ

मेरा मन हो विकल न जाए

भावुकता की बात और है

प्रीत निभाना बहुत कठिन है

यौवन का उन्माद और है

जनम बिताना बहुत कठिन है

आँचल फिर तुम मत लहराओ

पागल मन है मचल न जाए

दर्पण जैसा था मन मेरा

जिसमें तुमने रूप संवारा

तुम्हे जिताने की खातिर में

जीती बाजी हरदम हारा

मेघ नयन में मत लहराओ

सारा सावन पिघल न जाए

तोड़ा तुमने ऐसे मन को

पुरवा जैसे तोड़े तन को

सोचो मौसम का क्या होगा

बादल यदि छोड़े सावन को

मन चंचल है मत ठहराओ

अमरित ही हो गरल न जाए

कदम कदम पर वंदन करके

यदि में तुमको जीत न पाया

कमी रही होगी कुछ मुझमे

जो तुमने संगीत न पाया

तान मगर अब मत गहराओ

जीवन हो फिर तरल न जाए

{कृष्ण बिहारी}

फ़रवरी 10, 2012

तुम्ही बताओ क्या होगा?

जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?

रजनी-गंधा देह तुम्हारी
मन गंगा का पानी
जी चाहे तुम पर मैं लिख दूं
कोई प्रेम कहानी |

जब ऐसा अदभुत रूप नयन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?
जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो…

बेले में है खुशबू तुमसे
रूप में रंग तुम्हारा
रंग और खुशबू का बोलो कैसे हो बंटवारा
जब इतनी कठिन घड़ी उपवन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?
जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो…

केश तुम्हारे रेशम – रेशम
भौंह लचकती डाली
मधु- प्याले से नयन तुम्हारे
ओठ उषा की लाली
जब इतनी रूप-राशि दर्पण के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?
जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो…

यह तो शायद तुम ही जानो कौन बसा है तुम में
तुम्हे देख कर मैं यह मानूं
अघट नशा है मुझमें
जब बारिश की दो बूँद तपन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?

{ कृष्ण बिहारी }

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