Posts tagged ‘road’

जनवरी 19, 2014

धुंध में…

जब धुंध में fog-001

हाथ को हाथ नहीं

सूझता था

मैं चला उसके साथ

सीमेंट की

पुरानी रोड पर !

एक दूसरे को

तलाशते, पहचानते और जानते

हम चले गये दूर तक

और तब मैंने पाया

कि हम तो एक से हैं

अलग अलग खोलों के अंदर

मुझे बेहतर महसूस हुआ

ज्यादा शान्ति और संतुष्टि

ने मुझे घेर लिया

और मैं पहले से ज्यादा इंसान बना!

Yugalsign1

जनवरी 13, 2014

पूर्णिमा का चाँद

पूर्णिमा का चाँद manmoon-001

लुका-छिपी खेलता है

जाने मुझसे

कि इन आते-जाते पहाड़ों से

(न, पहाड़ नहीं, अरावली की छोटी पहाडियों से)

पर, हर बार, अब वह झांकता है-

पहाडियों के पार

तुम्हारी कलाएं,

दिखाता है, हर बार-

कभी मासूम, कभी गुम-सुम,

कभी शोखी, कभी हँसी

कभी मोहक, कभी मादक

कभी स्नेह, कभी दुलार

कभी रूठना, कभी तकरार

कभी लाड, कभी प्यार

बाराहों पहाडियों के बीच

तुम्हारे रंग

आते हैं, जाते हैं-

इतने पास,

कि बस

अब छुआ

कि तब छुआ

इतना पास,

कि महसूस होती है साँस

और तपिश दहकते होठों की|

पर तभी,

ऊँची पहाड़ी सड़क से

अजमेर जगमगाता है

और चाँद

छिटक कर

जा बैठता है –

दूर आसमान पर

-शायद दिल्ली के-

बस ठीक उसी क्षण

फोन का बजना

उधर से तुम्हारा विभोर हो कहना

– आज का चाँद बेहद खूबसूरत निकला है!

Yugalsign1

मई 21, 2010

प्रोफेशनलिज्म, संवेदना और इंसानियत

वेशभूषा और पास पड़े बैग से वह कॉलेज की छात्रा प्रतीत होती थी। वह अपनी स्कूटी से गली से मुख्य सड़क पर पहुँची ही थी कि पीछे से तेजी से आने वाले मिनी ट्रक और एक सवारी बस की आगे निकल जाने की होड़ की शिकार बन गयी। बस के पिछले हिस्से से लगी सीधी टक्कर ने उसे स्कूटी समेत हवा में लगभग उड़ाते हुये कई फुट दूर जा फेंका।
बुरी तरह से घायल वह सड़क के एक किनारे पड़ी थी।
लोग भागे उस ओर।
भीड़ तो जल्दी ही जुट गयी घायल पड़ी लड़की के चारों तरफ। परन्तु कोई भी उसे अस्पताल ले जाने को तैयार नहीं दिखता था।
सभी में एक हिचक दिखायी दे रही थी।
शायद सोच रहे हों कि अगर अस्पताल ले जाते हुये वह रास्ते में ही … तो पुलिस हमें अलग से परेशान करेगी।
कुछ लोग अंधाधुंध बसों, ट्रकों और अन्य वाहनों को लापरवाही से चलाते ड्राइवरों को कोस रहे थे।

अपनी मोटर साइकिल पर उधर से गुजर रहे एक पत्रकार ने भीड़ देख कर मोटरसाइकिल रोक दी। भीड़ देख कर उसे लगा होगा कि शायद उसे कोई स्टोरी ही मिल जाये आज का कोटा पूरा करने के लिये।

उसने सारा नजारा देखा और अपने बैग से कैमरा निकालकर वह घायलावस्था में अस्त व्यस्त पड़ी लड़की की तस्वीरें लेने लगा।

पहले से गुस्साये लोग उसकी इस हरकत पर झल्ला उठे।
कुछ चिल्लाये,” अबे क्या कर रहा है“?

कुछ उसकी ओर लपके और उसे पकड़ लिया।

कुछ ने उसे डाँटा,” अबे शर्म वर्म है कि नहीं तुझे, फोटो लेने में लगा पड़ा है। साले तेरी तो स्टोरी बन जायेगी, लड़की की क्यों ऐसी तैसी कर रहा है। उसे अस्पताल क्यों नहीं ले जाता?”

मीडिया से भी नाराज रहने वाले कुछ लोगों का पारा और ऊपर चढ़ गया यह सब देखकर और उनमें से कोई बोला।

इसकी मरम्मत करो ढ़ंग से. साले हर जगह अपनी रोटी सेकने पहुँच जाते हैं। लोगों की भावनाओं से तो इन्हे कोई मतलब है नहीं।

इससे पहले कि पत्रकार पर लोग हाथ साफ करते वह लोगों की पकड़ में कसमसाया और चिल्ला कर बोला।

आप में से कोई क्यों नहीं इसे अस्पताल ले जाता

लोग थोडा ठिठके! असर होता देख पत्रकार में हिम्मत आयी कि वह लोगों को शायद अपनी बातों से मना लेगा। उसने आगे कहा।

मैं भी आप लोगों की तरह एक आम आदमी हूँ। निजी तौर पर मैं भी आप लोगों की ही तरह सक्षम या विवश हूँ

लोगों ने उसे छोड़ दिया। पर अभी भी वह गुस्से से भरे हुये थे।

पत्रकार अपनी खाल बचाने के मिशन में और आगे बढ़ा ,” भले ही आपको मेरा फोटो खींचना एक असंवेदनशील हरकत लगे परन्तु एक प्रोफेशनल के तौर पर मैं कम से कम इस घटना पर काम तो कर रहा हूँ। यदि पुलिस के लोग और डाक्टर्स भी अपनी अपनी जिम्मेदारियाँ ढ़ंग से निभाते रहें तो क्या किसी भी आम आदमी को कभी भी ऐसी किसी दुर्घटना के समय घायल की मदद करने में हिचक महसूस होगी

कुतर्की अपनी क्षमता के प्रदर्शन में व्यस्त थे।

दिखावट करने वाले अपनी अभिनय क्षमता दिखाने में व्यस्त थे।

गरजने वाले बादल गरज रहे थे।
पर इस बीच इंसानियत से भरे कुछ मानव वहाँ भी पहुँच ही गये और जो बन सकता था उसे करने में जुट गये।

…[राकेश]

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