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जनवरी 14, 2014

दोपहर, साथ, नींद और पलायन

इस तरह तो न थे, हम-तुम! avishkar-001

दुश्वारियां जिंदगी की तो पता थीं

कल भी|

ये फिरकते वृत्त है रौशनी के

किनारियाँ अंधेरों की तो पता थीं

कल भी|

बुद्धू बुद्ध की नींद भी गहरी

लाचारियाँ असमंजसों की तो पता थीं

कल भी|

सयानेपन की तुम्हारे भी सीमाएं हैं

पारियां बचपने की मेरी तो पता थीं

कल भी|

निर्वात तोडता है देह का चुम्बक

सीढियां लम्बी समाधानों की तो पता थीं

कल भी|

रिश्ते हैं कई मेरे और तुम्हारे तईं

गारियाँ सर्द अबोलों की तो पता थीं

कल भी|

कई तो हैं संजोग, ऐसे-वैसे

कलाकारियाँ कायनात की तो पता थीं

कल भी|

सिर्फ बोलों के आईने में रिश्तों का सच

दीवारियाँ रंग-ऐ-नस्ल की तो पता थीं

कल भी|

अपने-अपने सुखों में चटख आए दुख

बीमारियाँ सुखों -दुखों की तो पता थीं

कल भी|

प्यार भरे वो तरंगित, शर्मीले स्पंदन

यारियाँ दिल से दिल की तो पता थीं

कल भी|

Yugalsign1

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अक्टूबर 1, 2011

अपनी आग में जलते घर

लुटेरों के कमांडर इन चीफ हैं सरकार
पब्लिक प्रोपर्टी के बड़े थीफ हैं सरकार
ये सब पीठ पीछे का गुबार है मालिक
मुहँ आगे आप सबसे शरीफ़ हैं सरकार
………….

तीर सीने के निकाल कर रखना
अमानतों को संभाल कर रखना
वक्त आने पर करना है हिसाब
ज़ख्म दिल में पाल कर रखना
* * *

फेंकने वाले हाथ खुद अपने थे करते भी क्या
कभी सर का लहू देखा कभी पत्थर को देखा
माँ का दूध जब खट्टे रिश्तों में शामिल हुआ
अपनी आग में हमने जलते हुए घर को देखा
* * *

भूल गए हैं हवाओं का एहसान, देख रहे हैं
खुद को मान बैठे हैं आसमान, देख रहे हैं
गुब्बारे कल फुस्स होने हैं फिर कौन देखेगा
अभी तो सब लोग उनकी उड़ान देख रहे हैं
* * *

कहता है खरा सौदा है आओ मुस्कानें बाँटें
रोतों की बस्ती के लिए आराम मांग रहा है
आया कहाँ से है दीवाना कोई पूछो तो सही
आँसू के बदले खुशी का इनाम मांग रहा है

(रफत आलम)

जुलाई 22, 2011

मौसम

रिमझिम मौसम में
हरी दूब पर
नंगे पाँव चलाना सुहाता है,
बे-एतबार फुहारों में
अक्सर खिलते हैं
रिश्तों के मासूम फूल,
सर्द रूत जमाने लगती है
गुलाबों की पंखडियों पर ओस,
बर्फ होते दिलों के
अजनबी बनते एहसास
बेरुखी के लिहाफ में
करवटें बदल कर सो जाते हैं।

बल खाती नदियों की जवानी
सोख लेती हैं बेदर्द गर्मियां,
जज़्बात की जलन में
चिता होते देखे रेश्मी आँचल
और चौड़े-चकले फौलादी सीने,
संबंधों के सूखे तीरों के बीच
समय का चिरस्थाई समुद्र
बचा रह जाता है.
सूनी आँख से रिसता
मौसमों के बदलाव में।

(रफत आलम)

मार्च 28, 2011

रिश्ते…

रिश्ते पिघल गए बर्फ के टुकड़ों की तरह
रिश्ते पिघल गए मोम की कंदीलों की तरह

रिश्ते पिघल गए जमे हुए आंसुओं की तरह
रिश्ते पिघल गए कोहरे के मंज़रों की तरह

रिश्ते पिघल गए वक्त के लम्हों की तरह
रिश्ते पिघल गए माटी के जिस्मों की तरह

बंजर माहौल में बस कैक्टस जिंदा रहते हैं

(रफत आलम)

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