Posts tagged ‘Rishta’

मई 15, 2014

रिश्ता क्या कहलाये?

रिश्ते क्यूँ परिभाषित करें हम?lovers-001

बोलो?

क्या कोई बिना नाम का रिश्ता नहीं हो सकता हमारे बीच?

कमिटमेंट के दस्तावेजों की कोई ज़रुरत है क्या?

क्या इतना नाकाफी है जानना

कि मैं पूरा पूरा तुम्हारा हुआ…

तुम में हुआ…

दिल से

रूह से

जिस्म से!

Rajnish sign

नवम्बर 18, 2013

दो रूहें हों नीम अँधेरा हो…

नाम देना ज़रूरी है क्या?ruhdark-001

हर रिश्ते को नाम देना

-क्या पागलपन है!

कुछ ऐसा क्यूँ नहीं कि

बस दो रूहें हों

नीम अँधेरा  हो

ख़ामोशी हो

मौन कहे

और

मौन सुने

हानि  लाभ

नफा नुकसान

इज्ज़त बेईज्ज़ती

शंका आशंका

भूत भविष्य

क्या पाओगे

क्या मिलेगा

क्यों कर रहे हो

क्या कर रहे हो

क्या मिलेगा

दूरी नजदीकी

जिम्मेदारियां

मजबूरियां

हालात

क्यों ऐसा नहीं हुआ

क्यों वैसा नहीं हुआ…

इन तमाम प्रश्नों के पार भी कुछ हो सकता है

और

इन सब के पार जो कुछ भी होगा

बहुत पाक होगा

बहुत निश्छल होगा

(रजनीश)

नवम्बर 7, 2013

जली तो तुम भी मेरी याद की तपिश में

कल रात भर fire-001

आग बीनता रहा मैं…

हर करवट पे चटकते जिस्म से

जैसे धुंआ सा उठता रहा

उस दिन देखा था चटकती लकड़ियों से

निकलती नीली-नीली चिंगारियों को

उड़-उड़ मुझ तक आती थीं

कल मुझसे भी निकली आग

लेकिन

शायद तुम तक पहुँची नहीं …

शायद दूरियां…

शायद मजबूरियां…

शायद बेरुखी…

शायद बेहिसी…

शायद बे-ताल्लुकी…

पता नहीं क्या…

पता नहीं क्या-क्या सोचता रहा दिमाग

और पता नहीं क्या-क्या समझाता रहा दिल

दिल जीता…

मैं हारा

दिल कहता है बेचैन तो तुम भी होती हो

चाहे थोडा ही सही…

उदासी मेरी जाती जरुर है तुम तक…

थकी-थकी सी सही…

कुछ कहो न कहो

सामने रहो…

मुझे बा-होश रखो

खुद चाहे बे-होश रहो

जान पाया इन दूरियों की वज़ह से ही

कि इन दूरियों के माने कुछ भी नहीं

तुमको हर दम मैंने देखा है

अपने आस पास यहीं

मेरे जलते बदन के कोयलों को टटोलते

कल रात

हाँ कल रात ही तो…

नहीं पता कब सोया

लेकिन तुम्हे शिकायत करते पाया आज

 उँगलियों के जलने की

(रजनीश)

 

मार्च 16, 2013

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

चाहे यह ज़िंदगी खंगालो

या तुम इसकी रूह निकालो

ठंडी आहें नहीं भरूँगा

सब कुछ चुपचाप सहूंगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

मैंने कभी विरोध न माना

हर अनुरोध तुम्हारा माना

मान तुम्हारा रख पाऊं

मैं यह कोशिश दिन रात करूँगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

दुख से मेरा वैर नहीं है

कोई रिश्ता गैर नहीं हैं

यदि वह मेरा साथ निभाए

तो मैं उसके साथ रहूंगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

बहुत मौत से डरते होंगे

वे जीते-जी मरते होंगे

मैं उनमे से नहीं बंधु !

जो समझौतों की मार सहूंगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

तुम भटको तो वापस आना

मन में कोई बात न लाना

दरवाजे पर जब पहुंचोगे

तुम्हे द्वार पर खड़ा मिलूंगा

तब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

{कृष्ण बिहारी}

सितम्बर 23, 2011

बूँद और समंदर

 

जिंदगी गुजारनी थी सो गुज़र की है
ये न पूछो किस तरह से बसर की है

घायल हैं सभी पर बताता नहीं कोई
पत्थरों को तलाश किसके सर की है

छप्पर जले तो महल भी नहीं बचेंगे
आग कब देखती है हवा किधर की है

रिश्तों की मौत पर अब रोता है कौन
हर आँगन के बीच दीवार घर की है

चूड़ियों के टकराव से टूटे हैं भाईचारे
बर्तनों की खनक तो रौनक घर की है

जिधर देखा, हैं आँसू आहें और कराहें
हम कैसे कहें ये दुनिया पत्थर की है

जहाँ पर शुरू, वहीं आखिर है आलम
बूँद से है समंदर तो बूँद समंदर की है

(रफत आलम)

अगस्त 20, 2011

जिहादी हूँ, दहशतगर्दी नहीं इंसानियत मेरा इस्लाम है

अजीब हैं दर्द का रिश्ता जो टूट कर भी नहीं टूटता कभी
ज़ख्म को सूखे बरस बीते फिर भी दिल को आराम नहीं

हम भी जिहादी हैं मगर इंसानियत की राह पर चलते हैं
ये जो तेरा इस्लाम है दहशतगर्द वो अपना इस्लाम नहीं

सच दिखाने की सजा किरच किरच पायी है दर्पणों ने
पत्थरों की इस बस्ती में शीशा दिल लोगों का काम नहीं

अपना ही लहू पीने वालों को क्या गरज मयखानो से
हमारी प्यास अलग है साकी जिसका मकसद जाम नहीं

ख़्वाबों में जीने की सजा नींद खोकर पाई है, क्या बताएं
जागती आँखें पूछती हैं पगले क्यों तुझको आराम नहीं

इस मयकदे में अपनी प्यास का मुदावा खुद करना होगा
यहाँ साकी को क्या परवाह किसे है किसको जाम नहीं

हराम खाने से बेहतर है पेट पर पत्थर बांधे गुज़र जाना
तलब वो ही है सच्ची जो हाथ फैलाने को बदनाम नहीं

आप बादलों के सायों से चाहे बहल लो वरना ऐ आलम
जिंदगी के रास्ते में कोई मंजिल नहीं कोई मुकाम नहीं

दहशतगर् – आतंकवादी, मुदावा – इलाज

(रफत आलम)

जुलाई 13, 2011

दिल की लगी

फ़िक्र बहुत थी हमें दुनिया जहान की
सर पे गिरी छत अपने ही मकान की

दिल से दुआ हो हर एक मेहमान की
अल्लाह इज़्ज़त रखे मेरे मेज़बान की

किसी ने कुत्तों में खोजी वफ़ा की बू
वो समझ गया था फितरत इंसान की

कौन समझा दिल की कतरनों का दर्द
लोग तो कैंचियाँ चला गए ज़बान की

रिश्ते बहुत थे मगर कौन से रिश्ते थे
हमने जिनके वास्ते दुनिया वीरान की

मुस्कानों का बहरूप धरे अपनी काया
असल में बस्ती है जंगल बयाबान की

गुलशन के उजड़ने में किसका है दोष
मौसम का फरेब के भूल बागबान की

दीवाने तो तिरछी चितवन पे मर मिटे
ज़रूरत कहाँ पड़ी प्यारे, तीर-कमान की

सर इबादत से उठे ही कब दीवानों के
सजदों को ज़रूरत कहाँ थी अज़ान की

यूँ तो ज़मीन माटी का गोला है मगर
उठाए फिर रही है बुलंदी आसमान की

हमने कब कहा ये है गज़ल ऐ आलम
है दिल की लगी जो दिल ने बयान की

(रफत आलम)

अप्रैल 24, 2011

दर्द की दवा

गज़ल…रफत आलम

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किसी से उम्मीद है फ़िज़ूल आज कोई क्या देगा
दिल की दौलत छुपा लेगा खाली हाथ दिखा देगा

हमारी भूख को राशनकार्ड थमा कर हाकिमे शहर
जलती प्यास पर टूटे मटकों की मुहर लगा देगा

अभी तो कीचड ने लगाए हैं दामन पर चंद धब्बे
गंद के शिकवे की सज़ा देखिए दौर हमें क्या देगा

कलम की जगह झूठे बरतन नन्हे हाथों में देकर
वक्त गरीब बच्चों को जिंदगी के ढंग सिखा देगा

कौन सा खज़ाना है आँसू जिसे छुपाये फिरते हो
ये दरिया अगर बह निकला तो तुमको डूबा देगा

सोचता हूँ देने वाला आखिर दर्द देता ही क्यों है
ये मान लिया जिसने दर्द दिया है वही दवा देगा

दुनिया क्या याद रहती अपना पता भी भूल गए
हमें मालूम नहीं था तेरा गम इस कदर नशा देगा

एक छोटी सी विज्ञापनी खबर पल में बन जाओगे
आलम  माटी का हर रिश्ता कल तुमको भुला देगा

(रफत आलम)

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