Posts tagged ‘Resham’

मई 22, 2016

मीना कुमारी …(गुलज़ार)

GulzarMeenaKumari-001शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना
बुनती है रेशम के धागे
लमहा-लमहा खोल रही है
पत्ता-पत्ता बीन रही है
एक-एक साँस बजाकर सुनती है सौदायन
एक-एक साँस को खोल के, अपने तन
पर लिपटाती जाती है
अपने ही तागों की क़ैदी
रेशम की यह शायर इक दिन
अपने ही तागों में घुटकर मर जाएगी।
(गुलज़ार)

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नवम्बर 29, 2013

महकता चहकता फिरता हूँ

महकता बदनwoman-001

रेशम सी छुअन

नज़र भर शफक

शर्म की सिहरन

जिस के देखे को तरसते थे

आज संग चलती है…

रखता  है दहका  के मुझे

तुम्हारा  शीशे सा बदन…

आज कहे बिना रहा नहीं जाता

तुमने पूछा भी कि

मैं क्या सोचता हूँ

पूछा है तो सुनो

जिस किसी शाम

मेरे सपने उगते हैं तुम्हारे कंधो पे

उस शाम की महक में

तुम्हारी साँसे घुल जाती हैं

रात भर बूँद बूँद उतरती है

ये खुशबू मुझमे…

और फिर महकता चहकता रहता हूँ

मैं दिन भर…

Rajnish sign

नवम्बर 20, 2013

ज़िन्दगी ख्वाब क्यूँ न हुयी…

रात की खुमारी,MB-001
तेरे बदन की खुशबू,
नथुनों में समाती मादक गंध
तेरे होठों से चूती शराब…
तेरे सांचे में ढले बदन की छुअन
रेशम में आग लगी हो जैसे
तराशे हुए जिस्म पे तेरे

फिरते मेरे हाथ
वो लरजना
वो बहकना
वो दहकना
वो पिघलना
हाय वो मिलना

अगर वो ख्वाब था तो इतना कम क्यूँ था
अगर वो ख्वाब था तो ज़िन्दगी ख्वाब क्यूँ न हुयी…

(रजनीश)

नवम्बर 5, 2013

उफ़! कभी यूँ भी तो हो

mausam1-001उफ ये जागती आँखों के सपने!

आँखों में चुभते हैं किरच किरच…

अभी देखा एक ख्वाब मैंने खुली आँखों से

देखो तो ज़रा कितना गहरा जा धंसा है…

तुम्हारा दौड़ते हुए आना मुझ तक

उलझे हुए श्यामल रेशम बाल

एक लय में उठता गिरता सीना

माथे पर चुहचुहाती बूंदे पसीने की

आरक्त गालों पर शर्म से जन्मी लाली की छटा

एक दूसरे से लडती उलझती साँसे

नशे से झुकती हुयी सी आँखे

तुम्हारा आके लिपट जाना मुझसे

फिर शर्मा के कुछ और सिमट जाना मुझमे

मेरा तुम्हे कुछ चिढाना और

तुम्हारा मुक्का बनाके डराना मुझको

देखो उस मुक्के का निशान

चस्पा है अब तक यहाँ मेरे सीने पे…

उफ़ तुम्हारा मौन निमंत्रण!

पढ़ सके जिसे मेरे लरजते होंठ…

वो जुड़ना अधरों का

वो फिसलना बाहों का

वो पोर पोर चुम्बन

वो सीने का स्पंदन

वो दो दिलों का मिल के धडकना

वो मेरा नशा नशा बहकना

न तुम्हारा कुछ सुनना

न अपना कुछ कहना

गर्म होना साँसों का

और कसना बांहों का

देखो तुम्हारे निशान

यहाँ मेरे सीने पे…

सपना जो उतरा खुली आँखों में

आओ पढ़ लो उसके गहरे धंसने के निशान

यहाँ मेरे सीने पे…

अभी भी फिर रही हैं तुम्हारी

बाहें जैसे मेरे बदन पे हर ओर

पोर पोर हैं स्पंदित अभी भी

सपना किरच किरच होने पे भी…

कभी यूँ भी तो हो कि दिल चाहे और तुम आ जाओ

पीछे से आके मेरी आँखों  को अपने हाथों से ढक

मुझे आनंद की यात्रा पर भेज दो मुझको…

स्पर्श तुम्हारे हाथों का कभी ख्वाब से निकल कर

हकीकत तो बने…

खुशबू तुम्हारे सीने की

एक बार तो आ बसे साँसों में…

कभी यूँ भी तो हो…

और कभी ऐसा भी हो

छुअन कांपते हाथों की सिमट जाए मुझमे

लरजते, थरथराते होंठों की तपन

रह जाये मेरे साथ तेरे बाद भी

मैं पा जाऊं वो सब जो अभी अभी खवाब में

तुमने दिया है मुझे…

कभी हो ऐसा भी…

(रजनीश)

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