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दिसम्बर 21, 2013

बंद हूँ तेरे ही प्राणों के मद में…

मेरे मन ने देह को त्याग दिया हैavishkar-001

और वह

बिस्तरे के सामने

ठीक सामने तस्वीर टांगने वाली

खूंटी पर जा बैठा है |

करवट पड़ी तुम्हारी आँखें

अब भी खुली हैं

जिनमें मेरे मन के ही प्रश्न हैं

सखे, सुन

मेरी देह से मेरे मन का न ले भान

जब तू मुझमें निमग्न हो

छूएगी अपने ही प्रान

तो पायेगी,

मन तो मेरा चिर तेरा कामी

पर देह अभ्यासी दुनियावी अनुगामी

मैं तो जब तुझमें डूबा था,

उस रात्री प्रथम

तब से,

बंद वहीं हूँ,

डूबता, तिरता, उतराता

तेरी ही साँसों की लय में,

तेरे ही प्राणों के मद में!

Yugalsign1

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दिसम्बर 13, 2013

देखें सूरज को मिलते हुए प्रेयसी रात्रि से

बैठे रहें पास पासsunset1-001

चुपचाप

न हम बोलें ना तुम कुछ,

उठती हुयी तरंगें तुम में

गुज़र जाएँ मुझ में हो कर

बस देखते रहें बेचैन सूरज को

मिलते हुए प्रेयसी रात्रि से,

कितने अधूरे हैं ये उजाले-अँधेरे

एक दूसरे के बगैर

जैसे…हम-तुम…

बस चुपचाप ही समझें इशारे,

 रंग बदलती शाम के

लाल होते आसमान के

घर लौटती चिड़ियों के

झुकती आँखों के

बहकती हुयी साँसों के

दहकते हुए होठों के

कंपकपाती  उंगुलियों के…

बस चुपचाप…

बैठे रहें पास पास

मैं और तुम…

पीते रहें हवा में घुली शराब को

उतर जाए लाल शाम हम में

उतर जाए बुखार साँसों का

बस बैठे रहें सर टिकाये एक दूसरे से

चुपचाप

पास पास  बस बैठे रहें…

Rajnish sign

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