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अप्रैल 19, 2013

पकड़ो मत! जकड़ो मत!

या तो पकडे बैठे रहो,
जकड़े बैठे रहो,
पर तब
हर पल का,
हर कदम का,
हर गति का,
हर इशारे का,
हिसाब लगाते रहना होगा|

और तय है यह भी कि
इस पकडन में,
इस जकडन में,
ऐठन भी होगी,
तनाव भी होगा,
तंगी का अहसास भी होगा|

समय लाएगा ही लाएगा
घुटन भी,
विचलन भी,
विवशता भी,
और असली अलगाव भी|

असली मुक्ति,
पकड़ने से मुक्त रहने में है,
स्वतंत्रता,
जकड़ने से दूर रहने में है,
स्वायत्ता,
अपने साथ बंधी
पकडन,
और जकडन से
भी परहेज करने में है|

विकल्प हमेशा है-
या तो जकडन और पकडन
के रास्ते हैं –
जहां भीड़ है,
सबके साथ खड़े होने,
सबके साथ होने
के अहसास हैं,
पर समय ही
यह अहसास भी कराता है
कि ये साथ झूठे हैं,
नकली हैं,
तनाव और दुख के जन्मदाता हैं,
या फिर रास्ते हैं
आनंद के,
पर इन पर चलने की शर्त वही –
पकड़ो मत!
जकड़ो मत!

[राकेश]…

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सितम्बर 22, 2011

खुदकशी – मर्ज़ और दवा

बिखरे हुए सपने अपनी जिंदगी से गए
बूढ़े कुछ चश्मे आँख की रोशनी से गए
झुका हुआ एक दरख्त ठूंठ हुआ बेचारा
बेरुते फल थे टूट कर खुद-खुशी से गए

दुःख को साथी मानते कट जाता दुःख
कबीर-गालिब को पढ़ते बट जाता दुःख
तुम मोल तो करते अमूल्य जीवन का
बिन अश्रु आँखों में सिमट जाता दुःख

जलते दीपक से सीख जीने का करीना
दुनिया के आगे हँसना पीछे अश्रु पीना
सोच ये हो तेरे साथ बिताये पल जीलूँ
ये सोच गलत है तेरे बिना क्या जीना

टूटे आस तो खुदा का आसरा है बहुत
हो भरोसा तो स्वयं का सहारा है बहुत
सपनों के साथ आँखे नहीं मरा करती
देख तो सही आगे अभी रास्ता है बहुत

नफा-नुकसान, दुख-सुख, मिलना–बिछड़ना
अनुभव है जिंदगी के, इनसे सीख समझ
समय का शिकारी तो खुद तेरी टोह में है
उसके जाल में न आ, फंदों में न उलझ

(प्रेम में असफलता पाने से की गई आत्महत्या की खबर से जन्मा ख्याल)

(रफत आलम)

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