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मई 12, 2016

अज्ञेय से … (शमशेर बहादुर सिंह)

अज्ञेय से

जो नहीं है
जैसे कि ‘सुरुचि’
उसका गम क्‍या?
वह नहीं है।

किससे लड़ना?

रुचि तो है शान्ति,
स्थि‍रता,
काल-क्षण में
एक सौन्दर्य की
मौन अमरता।

अस्थिर क्‍यों होना
फिर?

जो है
उसे ही क्‍यों न सँजोना?
उसी के क्‍यों न होना!-
जो कि है।

जो नहीं है
जैसे कि सुरुचि
उसका गम क्‍या?
वह नहीं है।

* * * * *

एक पीली शाम
 

 

एक पीली शाम
पतझर का जरा अटका हुआ पत्ता
शान्त
मेरी भावनाओं में तुम्‍हारा मुखकमल
कृश म्‍लान हारा-सा
(कि मैं हूँ वह
मौन दर्पण में तुम्‍हारे कहीं?)     वासना डूबी
शिथिल पल में
स्‍नेह काजल में
लिये अद्भुत रूप-कोमलताअब गिरा अब गिरा वह अटका हुआ आँसू
सान्‍ध्‍य तारक-सा
अतल में।

आओ

1
क्‍यों यह धुकधुकी, डर, –
दर्द की गर्दिश यकायक साँस तूफान में गोया।
छिपी हुई हाय-हाय में
सुकून
की तलाश।

                 बर्फ के गालों में है खोया हुआ
या ठंडे पसीने में खामोश है
शबाब।

तैरती आती है बहार
पाल गिराए हुए
भीने गुलाब – पीले गुलाब
के।
तैरती आती है बहार
खाब के दरिया में
उफक से
जहाँ मौत के रंगीन पहाड़
है।
जाफरान
जो हवा में है मिला हुआ
साँस में भी है।
मुँद गयी पलकों में कोई सुबह
जिसे खून के आसार कहेंगे।
– खो दिया है मैंने तुम्‍हें।

2
कौन उधर है ये जिधर घाट की दीवार… है?
वह जल में समाती हुई चली गयी है;
लहरों की बूँदों में
करोड़ों किरनों
की जिन्दगी
का नाटक-सा : वह
मैं तो नहीं हूँ।

फिर क्‍यों मुझे (अंगों में सिमिट कर अपने)
तुम भूल जाती हो
पल में :
तुम कि हमेशा होगी
मेरे साथ,
तुम भूल न जाओ मुझे इस तरह।  * *

एक गीत मुझे याद है।
हर रोम के नन्‍हें-से कली-मुख पर कल
सिहरन की कहानी मैं था;
हर जर्रे में चुम्‍बन के चमक की पहचान।
पी जाता हूँ आँसू की कनी-सा वह पल।

ओ मेरी बहार!
तू मुझको समझती है बहुत-बहुत – – तू जब
यूँ ही मुझे बिसरा देती है।

खुश हूँ कि अकेला हूँ,
कोई पास नहीं है –
बजुज एक सुराही के,
बजुज एक चटाई के,
बजुज एक जरा-से आकाश के,
जो मेरा पड़ोसी है मेरी छत पर
(बजुज उसके, जो तुम होतीं – मगर हो फिर भी
यहीं कहीं अजब तौर से।)

तुम आओ, गर आना है
मेरे दीदों की वीरानी बसाओ;
शे’र में ही तुमको समाना है अगर
जिन्दगी में आओ, मुजस्सिम…
बहरतौर चली आओ।
यहाँ और नहीं कोई, कहीं भी,
तुम्‍हीं होगी, अगर आओ;
तुम्‍हीं होगी अगर आओ, बहरतौर चली आओ अगर।
(मैं तो हूँ साये में बँधा-सा
दामन में तुम्‍हारे ही कहीं, एक गिरह-सा
साथ तुम्‍हारे।)

3
तुम आओ, तो खुद घर मेरा आ जाएगा
इस कोनो-मकाँ में,
तुम जिसकी हया हो,
लय हो।

उस ऐन खमोशी की – हया-भरी
इन सिमतों की पहनाइयाँ मुझको
पहनाओ!
तुम मुझको
इस अंदाज से अपनाओ
जिसे दर्द की बेगानारवी कहें,
बादल की हँसी कहें,
जिसे कोयल की
तूफान-भरी सदियों की
चीखें,
कि जिसे ‘हम-तुम’ कहें।

(वह गीत तुम्‍हें भी तो
याद होगा?)

टूटी हुई, बिखरी हुई


टूटी हुई बिखरी हुई चाय
की दली हुई पाँव के नीचे
पत्तियाँ
मेरी कविता
बाल, झड़े हुए, मैल से रूखे, गिरे हुए, गर्दन से फिर भी
चिपके… कुछ ऐसी मेरी खाल,
मुझसे अलग-सी, मिट्टी में
मिली-सीदोपहर बाद की धूप-छाँह में खड़ी इंतजार की ठेलेगाड़ियाँ
जैसे मेरी पसलियाँ…
खाली बोरे सूजों से रफू किये जा रहे हैं…जो
मेरी आँखों का सूनापन हैं

ठंड भी एक मुसकराहट लिये हुए है
जो कि मेरी दोस्‍त है।

कबूतरों ने एक गजल गुनगुनायी . . .
मैं समझ न सका, रदीफ-काफिये क्‍या थे,
इतना खफीफ, इतना हलका, इतना मीठा
उनका दर्द था।

आसमान में गंगा की रेत आईने की तरह हिल रही है।
मैं उसी में कीचड़ की तरह सो रहा हूँ
और चमक रहा हूँ कहीं…
न जाने कहाँ।

मेरी बाँसुरी है एक नाव की पतवार –
जिसके स्‍वर गीले हो गये हैं,
छप्-छप्-छप् मेरा हृदय कर रहा है…
छप् छप् छप्व

वह पैदा हुआ है जो मेरी मृत्‍यु को सँवारने वाला है।
वह दुकान मैंने खोली है जहाँ ‘प्‍वाइजन’ का लेबुल लिए हुए
दवाइयाँ हँसती हैं –
उनके इंजेक्‍शन की चिकोटियों में बड़ा प्रेम है।

वह मुझ पर हँस रही है, जो मेरे होठों पर एक तलुए
के बल खड़ी है
मगर उसके बाल मेरी पीठ के नीचे दबे हुए हैं
और मेरी पीठ को समय के बारीक तारों की तरह
खुरच रहे हैं
उसके एक चुम्‍बन की स्‍पष्‍ट परछायीं मुहर बनकर उसके
तलुओं के ठप्‍पे से मेरे मुँह को कुचल चुकी है
उसका सीना मुझको पीसकर बराबर कर चुका है।

मुझको प्‍यास के पहाड़ों पर लिटा दो जहाँ मैं
एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ।
मुझको सूरज की किरनों में जलने दो –
ताकि उसकी आँच और लपट में तुम
फौवारे की तरह नाचो।
मुझको जंगली फूलों की तरह ओस से टपकने दो,
ताकि उसकी दबी हुई खुशबू से अपने पलकों की
उनींदी जलन को तुम भिगो सको, मुमकिन है तो।
हाँ, तुम मुझसे बोलो, जैसे मेरे दरवाजे की शर्माती चूलें
सवाल करती हैं बार-बार… मेरे दिल के
अनगिनती कमरों से।

हाँ, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं
…जिनमें वह फँसने नहीं आतीं,
जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं
जिसको वह गहराई तक दबा नहीं पातीं,
तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मैं तुमसे करता हूँ।

आईनो, रोशनाई में घुल जाओ और आसमान में
मुझे लिखो और मुझे पढ़ो।
आईनो, मुसकराओ और मुझे मार डालो।
आईनो, मैं तुम्‍हारी जिंदगी हूँ।

एक फूल उषा की खिलखिलाहट पहनकर
रात का गड़ता हुआ काला कम्‍बल उतारता हुआ
मुझसे लिपट गया।

उसमें काँटें नहीं थे – सिर्फ एक बहुत
काली, बहुत लम्बी जुल्‍फ थी जो जमीन तक
साया किये हुए थी… जहाँ मेरे पाँव
खो गये थे।

वह गुल मोतियों को चबाता हुआ सितारों को
अपनी कनखियों में घुलाता हुआ, मुझ पर
एक जिन्‍दा इत्रपाश बनकर बरस पड़ा –

और तब मैंने देखा कि मैं सिर्फ एक साँस हूँ जो उसकी
बूँदों में बस गयी है।
जो तुम्‍हारे सीनों में फाँस की तरह खाब में
अटकती होगी, बुरी तरह खटकती होगी।

मैं उसके पाँवों पर कोई सिजदा न बन सका,
क्‍योंकि मेरे झुकते न झुकते
उसके पाँवों की दिशा मेरी आँखों को लेकर
खो गयी थी।

जब तुम मुझे मिले, एक खुला फटा हुआ लिफाफा
तुम्‍हारे हाथ आया।
बहुत उसे उलटा-पलटा – उसमें कुछ न था –
तुमने उसे फेंक दिया : तभी जाकर मैं नीचे
पड़ा हुआ तुम्‍हें ‘मैं’ लगा। तुम उसे
उठाने के लिए झुके भी, पर फिर कुछ सोचकर
मुझे वहीं छोड़ दिया। मैं तुमसे
यों ही मिल लिया था।

मेरी याददाश्‍त को तुमने गुनाहगार बनाया – और उसका
सूद बहुत बढ़ाकर मुझसे वसूल किया। और तब
मैंने कहा – अगले जनम में। मैं इस
तरह मुसकराया जैसे शाम के पानी में
डूबते पहाड़ गमगीन मुसकराते हैं।

मेरी कविता की तुमने खूब दाद दी – मैंने समझा
तुम अपनी ही बातें सुना रहे हो। तुमने मेरी
कविता की खूब दाद दी।

तुमने मुझे जिस रंग में लपेटा, मैं लिपटता गया :
और जब लपेट न खुले – तुमने मुझे जला दिया।
मुझे, जलते हुए को भी तुम देखते रहे : और वह
मुझे अच्‍छा लगता रहा।

एक खुशबू जो मेरी पलकों में इशारों की तरह
बस गयी है, जैसे तुम्‍हारे नाम की नन्‍हीं-सी
स्‍पेलिंग हो, छोटी-सी प्‍यारी-सी, तिरछी स्‍पेलिंग।

आह, तुम्‍हारे दाँतों से जो दूब के तिनके की नोक
उस पिकनिक में चिपकी रह गयी थी,
आज तक मेरी नींद में गड़ती है।

अगर मुझे किसी से ईर्ष्‍या होती तो मैं
दूसरा जन्‍म बार-बार हर घंटे लेता जाता :
पर मैं तो जैसे इसी शरीर से अमर हूँ –
तुम्‍हारी बरकत!

बहुत-से तीर बहुत-सी नावें, बहुत-से पर इधर
उड़ते हुए आये, घूमते हुए गुजर गये
मुझको लिये, सबके सब। तुमने समझा
कि उनमें तुम थे। नहीं, नहीं, नहीं।
उसमें कोई न था। सिर्फ बीती हुई
अनहोनी और होनी की उदास
रंगीनियाँ थीं। फकत।

 

 

 

 

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जनवरी 11, 2014

तुम हो…तुम रहोगी..

सारी हसरतें सब तमन्नाएँ love story-001

रंगीन उमंगें खो गयीं थी कहीं

तुम नहीं थीं

जब नहीं थी तुम…

तब

कवितायें सो गयीं थी कहीं

दब कुचल कर उदासी के बोझ तले

पलकों पे रखा प्रेम का मोती

पिघल जाता था आंसुओं में…

तुम नहीं थी जब…

बहुत ज़मानों के बाद फिर…

कल याद दिला दिया आकर…

तुमने कि…

है मुझमे कहीं बाकी कुछ

वज़ह मुस्कुराने की मरी नहीं अभी…

सपने फिर जिए जा सकते हैं

तुम थीं नहीं!

तुम हो…

तुम हो

और

तुम रहोगी…

Rajnish sign

दिसम्बर 22, 2013

मेरा ये नशा…

नशाlovers-001

चढ़ता है जब हौले हौले

सब कुछ रंगीन लगता है

मन में तरंग

तन में उमंग

आँखों में सपने

लाल डोरे खिंचते से

रक्त-शिराएँ तनती सी

उष्ण उत्तप्त कल्पनाएँ…

सब कुछ अपना

खुद जहाँपनाह

केवल मैं…

और केवल मैं….

अपने में ग़ुम…

सुबह से शाम

बस…नशा… नशा

और नशा…

नशा और उसका असर…

जब हो तो…

और जब ना हो तो

टूटने लगता है…

ऐंठने लगता है…

ये तन…ये मन…

बिखरने लगता है अपना साम्राज्य

शीशमहल जैसे चूर…

किरच किरच…

चुभता है सब कुछ…

धूप भी…

अँधेरा भी…

जलाता है सब कुछ

तपता दिन भी…

ठंडी रात भी

शराब मगर बेखबर…

कोई जिए

कि कोई मरे…

कोई जले

कि कोई फूंके…

कोई बिखरे

कि कोई तडपे…

बहुत कुछ तोड़ जाता है मगर ..Rajnish sign

नवम्बर 9, 2013

तुम आयी थीं क्या?

stars-001यही कोरा सफ़ेद कागज़ है जहाँ

हर रोज़ मुझे अकेला छोड़ जाती है तू

तेरे जाने के बाद भी बहुत देर तलक

मैं अंधेरों में जुगनू तलाशा करता हूँ

कुछ अहसास तेरे  होने का

आ आ के टटोलता रहता हूँ…

गाल पे सूखे हुए आंसुओं के निशान की तरह

मेरी उँगलियों के निशान इस की शिनाख्त करते हैं

मैं हर रोज़ सोचता हूँ कि इस

सफ़ेद कोरे कागज़ पे

तेरी नीली हंसी टांक दूँ

तेरी आवाज़ पिरो दूँ इसमें

हर शाम तेरे आने तक फिर सुनूँ

तेरी मखमली आवाज़ इंतज़ार को कुछ

रंगीन कर दे शायद…

वरना इस अँधेरे में

जुगनू की चमक क्या रंग देगी…

कुछ छोड़ जाया कर इस मोड़ पे हर रोज़

कुछ गर्म साँसे उतार कर अपनी

कुछ अपनी महक…

कुछ उजाले अपनी आँखों के

मैं हर दफा कुछ बहाने से इधर आता हूँ

पूछ जाता हूँ कि तुम आयी तो नहीं…

तुम आयी थीं क्या?

(रजनीश)

अक्टूबर 4, 2011

बेज़ुबान अहसास

यूँ ही भटकते हुए पता नहीं
क्यों लौटा था बरसों बाद
पार्क के उस कोने की ओर
जहाँ खुशबू भरे माहौल में
रंगीन सपने बुने जाते थे कभी।

लकड़ी की बेंच अब वहाँ नहीं है
जिस पर बिखरा करता था
अल्हड़ उमंगों का ताना-बाना।

चहचहाते पंछी कब के उड़ गये
प्रेमगीत गाकर
नीम के मोटे तने पर,
नादान उम्मीदों ने गोदे थे नामों
के पहले अक्षर
सूखा ठूठ बना खडा है वह।

आज भी हवाओं के दामन पर
मंज़र दर मंज़र धुंधलाई हुई कहानियाँ
फव्वारों की इंद्रधनुषी फुहारों में
बिखर रही हैं कतरा कतरा।

खामोशी की भाषा पढ़ने वाली आँखे
अब कहाँ उस अहसास के साथ
जिसके पास केवल बेज़ुबानी बची है।

(रफत आलम)

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