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जून 30, 2010

मुल्ला नसरुद्दीन लुट गये राम नाम की लूट के फेर में

जैसे विचित्र मुल्ला नसरुदीन वैसे विचित्र उनके साथ होने वाली घटनायें। एक झोंक में काम करने वाले व्यक्ति ठहरे नसरुद्दीन। अगर कुछ करने की सोच लें तो न आगा देखें न पीछा बस जुट जाते थे उस काम को पूरा करने में। दूसरों से सीखने का तो मतलब ही नहीं उठा कभी उनके जीवन में। वे तो सेल्फ मेड व्यक्ति थे वैसे ये बात दीगर है कि कितना निर्माण उनके द्वारा किये कामों से होता था और कितना विध्वंस उनकी हरकतों की वजह से हो जाता था। करने के बाद सोचना उनकी फितरत में था।

खैर घरवाले उन्हे उलहाना दिये रखते कि वे घर के किसी काम से मतलब नहीं रखते और मोहल्ले के बाकी लोग अपने परिवार के साथ घुमने जाते हैं उन्हे मेला दिखाने ले जाते हैं, सिनेमा दिखाने ले जाते हैं पर नसरुद्दीन हमेशा घर और परिवार को नजरअंदाज किये रखते हैं।

नसरुद्दीन इन रोज रोज के वाद विवादों से परेशान होकर वादा कर बैठे कि वे भी परिवार को कहीं न कहीं बाहर ले जाकर सबका मनोरंजन करायेंगे पर स्थान आदि उनकी अपनी मर्जी का होगा।

उनके परिवार वाले ऐसा कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे सो उन्होने झट से हाँ कर दी।

नसरुद्दीन ने सोचा कि मेरी शांति के दुश्मन इन लोगों को कहीं भी ले जाना बिना मतलब की परेशानी को मोल लेना है और सबसे अच्छा इन सबको फिल्म दिखाने ले जाना रहेगा, कम से कम सिनेमा हॉल के अंधेरे में मैं सो तो सकता हूँ।

नसरुद्दीन ने परिवार में क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या स्त्री और क्या पुरुष सबको कह दिया कि अगामी रविवार को सब लोग तैयार रहें और वे उन सबको फिल्म दिखाने ले जायेंगे। चाहें तो वे लोग अपने अपने मित्रों को भी आमंत्रित कर सकते हैं।

पूरे मोहल्ले के लिये चर्चा का विषय बन गया नसरुददीन जैसे आदमी द्वारा परिवार और मित्रों को फिल्म दिखाने ले जाने का कर्यक्रम। रविवार तक पूरी फौज तैयार हो गयी फिल्म देखने जाने के लिये।

नसरुद्दीन उन दिनों तुलसी की राम चरित मानस का अध्ययन कर रहे थे। मुकेश द्वारा गायी राम चरित मानस की कैसेट्स तो उनके साथ ही रहती थीं और वे उनके वॉकमैन में बजती ही रहती थीं।

फिल्में उन्होने बहुत कम देखी थीं पर कुछ फिल्मी लोगों के नाम से वे परिचित थे। अपने रशियन दोस्तों से उन्होने राज कपूर और उनकी फिल्मों की रुस में लोकप्रियता के बारे में भी सुन रखा था।

शुक्रवार को ही राज कपूर की “राम तेरी गंगा मैली” प्रदर्शित हुयी थी। नसरुद्दीन ने फिल्म का नाम पढ़ा और सोचा कि धार्मिक फिल्म लगती है और राम का नाम शीर्षक में मौजूद है तो उनके जीवन के प्रसंग भी इसमें होंगे और हो सकता है कि मेरी रुचि से मिलती जुलती बातें भी फिल्म में मिल जायें। फिल्म के गाने चारों तरफ कुछ दिनों पहले से बजने लगे थे और नसरुद्दीन भी उन गानों से वाकिफ हो चले थे। लता मंगेशकर द्वारा गाया एक गीत “एक राधा एक मीरा” तो उन्हे इतना भाया कि उन्होने एक सज्जन से पूछ ही लिया कि किस फिल्म का गाना है और फिल्म का नाम जानकर उन्हे पूरी तसल्ली हो गयी कि वे एक धार्मिक फिल्म देखने जा रहे हैं। उन्होने तकरीबन दो दर्जन टिकट रविवार के मैटिनी शो के खरीद लिये।

रविवार आया। नसरुददीन सबको सिनेमा हाल ले गये।

सभी समझ गये होंगे कि नसरुद्दीन गये तो थे रामायण देखने और दिखाने पर वहाँ से लेकर आये महाभारत होने के बीज और कल्पना ही की जा सकती है कि कैसी फसल उगी होगी उन बीजों से। फिल्म शुरु होने के एक घंटे के अंदर ही सब लोग वापिस घर पर थे। नसरुद्दीन रास्ते से ही गायब हो गये।

विचित्रताओं के सम्राट नसरुद्दीन ऐसे घटनाचक्रों से दो चार तो होते ही रहते थे। ऐसा ही उन्होने कुछ बरस बाद फिर से किया। पर दूसरा किस्सा किसी और दिन।

…[ राकेश]

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