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दिसम्बर 3, 2012

भोपाल गैस त्रासदी – अन्याय की 28वीं वर्षगाठं

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हमारे देश के इतिहास में घटित सर्वाधिक ह्रदय विदारक औद्योगिक त्रासदी को आज 28 बरस बीत गए, फिर भी उस खौफनाक मंज़र को वो लोग आज तक नहीं भुला पाए हैं, जिन्हें इस दुर्घटना ने ताउम्र रोने पर विवश कर दिया है। इस भयंकर मानवीय भूल ने निर्दोष और मासूम जानों के साथ ऐसा खिलवाड़ किया, की मानवता तार – तार हो बिखर गयी।

इस त्रासदी में हमेशा के लिए अपनी जान खो देने वाले निर्दोष व्यक्तियों को भाव भीनी श्रद्धांजलि अर्पित है —–

फोस्जीन गैस हज़ारों को लगा दे फांसी,
ये अगर भूल है तो ऐसी भूल क्या होगी,
ज़िन्दगी छीनकर लाशों के साथ हमदर्दी,
कब्र गंगा से भी धोओ तो फूल क्या होगी।

क्या कभी मौत ने ऐसा लिबास पहना है,
भीगी पलकों ने कभी ऐसी सदी देखी है,
तुमने देखी है फ़कत गंगो-जमन की धारा,
मैंने भोपाल में लाशों की नदी देखी है।

ज़िन्दगी थक गयी लाशों को कफ़न दे-देकर,
ये खबर लाये हैं भोपाल से आने वाले,
एक दीवार बनाना है वहां लाशों की,
हैं कहाँ चीन की दीवार उठाने वाले।

ये मुआवजों के लिए लाशों की हेरा – फेरी,
अब ये खतरा है के लाशों का भी सौदा होगा,
आईने तोड़कर पत्थर को पूजने वालों,
ये इबादत नहीं, भगवान से धोखा होगा।

राष्ट्रमाता के लिए फूट – फूट कर रोये,
उनके बेटों के लिए कोई अश्क़ पिघलेगा,
तुमने बांटे थे जिन्हें मौत के पट्टे घर – घर,
उन अभागों का कोई अस्थि कलश निकलेगा। *

नागासाकी सी सुबह जिनको मिली तोहफे में,
बस्तियां जिनकी हुयीं स्याह रात में तब्दील,
मेहरबां होके कभी उस तरफ से गुज़रो तो,
नकी कब्रों पे भी रख आना कभी एक कंदील।

[* इस दुर्घटना के एक माह पहले ही प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी का अवसान हुआ था, और सारे देश में उनका अस्थि कलश जुलूस के रूप में घुमाया गया था, इसी सन्दर्भ में यह पंक्ति कही गयी है।]

( यह कविता, भोपाल गैस त्रासदी के कुछ दिनों पश्चात् इंदौर के स्थानीय समाचार पत्र दैनिक नयी दुनिया में प्रकाशित हुयी थी और इस कविता ने दिल को ऐसा छुआ था कि इसे अपनी डायरी में लिखे बिना नहीं रह सकी थी। इस कविता के रचयिता का नाम भी नोट नहीं किया था। आज इस दुर्घटना की 28 वीं बरसी पर इस कविता की याद हो आई)

अजीत सिद्धू

Pic. Courtesy – The Bhopal Post

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