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मार्च 23, 2017

भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव : आज का भारतीय उन्हें श्रद्धांजलि देने लायक है भी?

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत पर उनकी शान में आज की तारीख में कसीदे काढने वाली भारतीय जनता में से बहुसंख्यक क्या जीते जागते इन क्रांतिकारियों को आज की परिस्थितियों में स्वीकार भी कर पाते?

भगत सिंह और उनके साथी तो आज भी समाज के सबसे निचले पायदान पर जी रहे वंचित तबके के हितों के लिए संघर्ष कर रहे होते, आदिवासियों के हितों, देश के जंगल, पानी और आकाश और पर्यावरण की रक्षा के लिए अलख जगा रहे होते और निश्चित तौर पर वे जन-शोषक कोर्पोरेट हितों के विरुद्ध खड़े होते, और निश्चित ही किसी भी राजनैतिक दल की सरकार भारत में होती वह उन्हें पसंद नहीं करती|

उन पर तो संभवतः आजाद भारत में भी मुक़दमे ही चलते|

झूठे कसीदों से फिर क्या लाभ, सिवाय फील गुड एहसासात रखने के कि कितने महान लोगों की स्मृति में हम स्टेट्स लिख रहे हैं ?

भगत सिंह एवं उनके साथियों के पक्ष में खड़ा होना आज भी क्रांतिकारी ही है और आधुनिक भारत का बाशिंदा इस बात से मुँह नहीं मोड़ सकता कि अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के वशीभूत होने के कारण किसी भी किस्म के सजग आंदोलन के पक्ष में वह खड़ा हो नहीं सकता|

आज भगत सिंह और उनके साथी होते तो उनके क्रांतिकारी विचारों के कारण, सोशल मीडिया पर ट्रोल्स उन्हें गरिया रहे होते, उनके साथ गाली-गलौज भी हो सकती थी|

ऐसे में भगत सिंह और उनके साथियों को श्रद्धांजलि देने के प्रयास दोहरेपन के सिवाय कुछ भी नहीं हैं| उनके कार्यों की ताब आज की तारीख में न सहने की मानसिकता के कारण उन्हें झूठी श्रद्धांजलि देने के प्रयास २५ साल से कम उम्र में ही देश की खातिर फांसी पर चढ़ जाने वाले इस महावीर और उनके साथियों के बलिदान के प्रति अवमानना ही कहे जायेंगें|

पुनश्चा:

१) डा. राम मनोहर लोहिया का जन्म २३ मार्च को हुआ पर वे इन शहीदों की सहादत की स्मृति में अपना जन्मदिन नहीं मनाते थे|

२) पंजाब के अनूठे कवि पाश, भगत सिंह और उनके शहीद साथियों के बहुत बड़े प्रशंसक थे, और संयोगवश पंजाब में आतंकवादियों दवारा उनकी ह्त्या भी इसी दिन २३ मार्च १९८८ को हुयी|

 

#BhagatSingh #Sukhdev #Rajguru

 

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मार्च 23, 2015

भगतसिंह की सेक्युलर विरासत

Bhagat Singh

जुलाई 23, 2010

शहीद चन्द्रशेखर आजाद : तीन रोचक प्रसंग

23 जुलाई अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद की जयंती तिथि है।

पंडित जी की प्रचंड देशभक्ति के तमाम किस्से मशहूर हैं। उनके सामने एक ही लक्ष्य था, भारत की आजादी और बाकी सारे मुद्दे गौण थे इस लक्ष्य के सामने। व्यक्तिगत जीवन का तो कोई मोल था ही नहीं उनके लिये इस लक्ष्य को पाने के लिये तो जीवन में सुख सुविधाओं की चिंता करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता उनके मामले में।

अर्जुन की तरह पंडित जी अपना पूरा ध्यान इसी एक बात पर लगाये रहते थे कि कैसे आजादी प्राप्त की जाये। मुल्क की आजादी पाने के लिये उन्होने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन की स्थापना की थी और शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव एवम बटुकेश्वर दत्त आदि भी इसके सदस्य बने।

उनके जीवन से विशुद्ध आजादी के प्रयासों के अलावा भी और बहुत सारे रोचक प्रसंग जुड़े हुये हैं। उनमें से कुछ का जिक्र यहाँ किया जा सकता है।

बात उन दिनों की है जब भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और बटुकेश्वर दत्त भी इलाहाबाद में प्रवास कर रहे थे। एक दिन सुखदेव कहीं से एक कैलेंडर ले आये जिस पर शायद किसी सिने तारिका की मनमोहक तस्वीर छपी थी। सुखदेव को कैलेंडर अच्छा लगा और उन्होने उसे लाकर कमरे की दीवर पर टांग दिया और बाद में वे बाहर चले गये। उनके जाने के बाद पंडित जी वहाँ पँहुचे और ऐसे कैलेंडर को देखकर उनकी भृकुटी तन गयी, उनके गुस्से को देखकर वहाँ मौजूद अन्य साथी डर गये। वे सब पंडित जी का मिजाज़ जानते थे। पंडित जी ने किसी से कुछ नहीं कहा पर कैलेंडर को उतार कर फाड़कर फेंक दिया। कुछ समय बाद सुखदेव वापिस आ गये। दीवार पर कैलेंडर न देख कर वे इधर उधर देखने लगे और उन्हे उसके अवशेष दिखायी दिये तो वे क्रोधित हो गये। वे भी गर्म मिजाज़ के व्यक्ति थे। उन्होने गुस्से में सबको ललकारा कि किसने उनके लाये कैलेंडर की यह दशा की है?

पंडित जी ने शांत स्वर में उनसे कहा,” हमने किया है “?

सुखदेव थोड़ा बहुत कसमसाये परंतु पंडित जी के सामने क्या बोलते सो धीरे से बोले कि अच्छी तस्वीर थी।

पंडित जी ने कहा,”यहाँ ऐसी तस्वीरों का क्या काम”।

उन्होने सुखदेव को समझा दिया कि ऐसे किसी भी आकर्षण से लोगों का ध्यान ध्येय से भटक सकता है।

दूसरी घटना दूसरे दशक के अंत की है। अंग्रेजों का दमन चक्र तेजी से चल रहा था और जनता में खासा रोष था। एक दिन महिलायें इलाहाबाद में जुलूस निकाल रही थीं और हाथ पड़ जाने वाले किसी भी पुरुष पर खासी लानत भेज रहीं थीं उन्हे चुनौती देकर कि वे कुछ नहीं कर पा रहे हैं। आजाद अपने किसी साथी के साथ वहाँ से गुजर रहे थे। महिलाओं ने उन्हे घेर लिया और एक महिला ने गरजते हुए उन पर शब्दों से आक्रमण कर दिया,” आप लोगों से कुछ होने वाला नहीं है, आप सब मर्दों को चूड़ी पहन कर घर बैठ जाना चाहिये”।

एक दो महिलाओं ने आजाद के हाथ पकड़ लिये और कहने लगीं कि इन्हे चूड़ियां पहनाओ।

जाहिर था कि उन्होने आजाद को पहचाना नहीं था।

आजाद मुस्कुराये और उन्होने अपनी कलाइयाँ बढ़ाते हुये कहा कि लो बहन पहना लो चूड़ियाँ।

कद्दावर शरीर के मालिक आजाद के हष्ट-पुष्ट हाथों के चौड़े गट्टों में भला कौन सी चूड़ी चढ़ सकती थी?

कुछ देर में महिलायें शर्मिंदा हो गयीं।

तीसरी घटना उस समय की है जब आजाद चाकू चलाने की कला में माहिर एक उस्ताद से चाकू चलाना सीखा करते थे। उस्ताद जी पंडित जी को छत पर चाकू चलाना सिखाते थे। पास ही स्थित एक दूसरे घर की छत से, जो इस घर की छत से थोड़ा ऊँची थी, रोज एक युवती और उसका छोटा भाई इस ट्रेनिंग को देखा करते थे। दोनों नियत समय पर छत पर आकर बैठ जाते थे और आजाद को ट्रेनिंग लेते हुये देखते थे।

एक दिन ऐसा संयोग हुआ कि सीखते हुये आजाद का ध्यान थोड़ा हट गया और उस्ताद जी का चाकू उनके शरीर को छीलता हुआ निकल गया। उस्ताद जी और उनके शागिर्द पंडित जी के घाव को देख रहे थे कि उस दूसरी छत से बहुत सारी चीजें वहाँ बरसनी शुरु हो गयीं। युवती, जो भी उसके हाथों में आ रहा था वह उसे निशाना साध कर उस्ताद जी के ऊपर फेंक रही थी और उसका छोटा भाई भी उसकी सहायता कर रहा था।

उस्ताद जी ने मुस्कुराते हुये पंडित जी से कहा,”लगता है लड़की का दिल लग गया है तुमसे”

प्रेम, विवाह, परिवार, धन-सम्पत्ति आदि सब तरह के सुख जो एक सामान्य मनुष्य अपने जीवन में चाहता है, उन्हे पंडित चन्द्रशेखर आजाद जैसे देशभक्तों ने अपने जीवन में प्रवेश करने ही नहीं दिया। जिस बहुमूल्य आजादी का आज हम सब जीवित लोग दुरुपयोग करके देश को रसातल में पहुँचा रहे हैं, वह ऐसी महान आत्माओं के बलिदान से हमें मिली है। ये सब लोग इतने कर्मठ और काबिल थे कि ऐश्वर्य से भरपूर जीवन जी सकते थे पर वे तैयार नहीं थे स्वाभिमान को ताक पर रखकर गुलामी में जीने को और देशवासियों को गुलामी की जंजीरों से छुड़वाने के लिये उन्होने अपने जीवन होम कर दिये।

नमन पंडित जी जैसी महान आत्माओं को।

पुनश्च : प्रंसग यशपाल द्वारा लिखित अदभुत पुस्तक “फाँसी के फँदे तक” से स्मरण के सहारे प्रस्तुत किये गये हैं।

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