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मई 4, 2013

सहयात्री के लिए शुभकामनाएँ

वह कामगार मैं कामगार

दोनों लौटते थे घर

कभी वह बैठती मैं खड़ा रहता

कभी मैं बैठता और वह खड़ी रहती थी|

कभी-कभी मैं देख लेता था

उसकी आँखों की ओर

और उतर जाती थी मेरी थकान,

कभी-कभी मैं खोल देता था

उसकी खिड़की का शीशा

उससे जो खुलता न था|

इससे ज्यादा मेरा उससे नाता न था

वह कामगार मैं कामगार

दोनों लौटते थे घर

बहुत दिनों तक वह नहीं दिखी

बहुत दिनों तक खिडकी के पास वाली

वह सीट खाली रही

बहुत दिनों तक याद आती रही उसकी आँखें

आज वह दिखी तो वह वह न थी

आज उसकी आँखें रोज से कुछ बड़ी थी

होंठ रोज से कुछ ज्यादा लाल

पैर रोज से कुछ ज्यादा खूबसूरत

सिर से पाँव तक

सुहाग-सिंदूर में लिपटी ओ स्त्री|

मैं तुम्हारा कोई नहीं था

पर तुम्हारे कुंआरे दिनों का साक्षी हूँ

भले ही ठसाठस भरी बस में

मैं तुम्हारे लिए थोड़ी-सी ही जगह बनाई है

अच्छे-बुरे रास्तों से गुजरा हूँ तुम्हारे साथ|

मैं तुम्हारा कोई नहीं

पर भले दिन रहें हमेशा तुम्हारे साथ

दुख तुम्हारे दरवाजे दस्तक न दे

तुम्हारा आदमी कभी राह न भूले,

और ठौर-कुठौर न चले

तुम्हारा घर और घडा कभी खाली न हो

तुम्हारे भोजन में कभी मक्खी न गिरे

तुम्हारी गृहस्थी में दूध न फटेअचार में फफूंद न पड़े

तुम्हारे फल कभी सड़े नहीं

तुम्हारे पाले पंछे पिंजरों में मरे नहीं

कोई भूखा-प्यासा न जाए तुम्हारे घर से

तुम पहचान लो भीख मांगते

रावण को और देवता को

वह दिन भी आये

जब तुम्हे इस बस का मोहताज न होना पड़े|

(राजेन्द्र उपाध्याय)

,

जुलाई 23, 2010

मुल्ला नसरुद्दीन: दो उपलब्धियों वाली दास्तान

युगों युगों से महान हिमालय पर्वत श्रंखला के साये में रहने वाले लोग जानते हैं कि उनके आदि पुरुष, देवों में श्रेष्ठतम स्थान पाने वाले शंकर महादेव कितने भोले थे, उन्हे तो भोले शंकर के नाम से भी जाना जाता है। मुल्ला नसरुद्दीन में भी यही भोलापन कूट कूट कर भरा था। भोले शंकर से मिलते जुलते कई गुण उनमें थे।

रावण द्वारा रचित शिव-ताण्डव-स्त्रोत को वे बहुत पसंद करते थे और उसे पूरे भाव से गाते भी थे और नाचते भी थे। उनके गायन को सुन और नृत्य को देख पाने वाले चुनींदा अतिभाग्यशाली मित्र दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते थे। कुछ होने लगता था सबको।

उनके करीबियों को इस बात का पता था कि जब वे करीब पैंतीस साल के थे तो उनके एक परिचित, जिनका बहुत योगदान था पर्वतों से घिरे एक स्थान पर एक खूबसूरत से विश्वविद्यालय की शुरुआत करने में, ने उन्हे उस विश्वविद्यालय में पढ़ाने के लिये राजी कर लिया था। नसरुद्दीन उनका बेहद सम्मान करते थे अतः उन्हे राजी होना पड़ा परंतु वे राजी हुये इस शर्त पर कि वे किसी भी तरह का वेतन न लेंगे छात्रों को पढ़ाने के लिये। उन्होने कहा कि छात्रों को विद्या देकर धन न कमायेंगे, आजीविका के और बहुत सारे साधन हैं। विवाह उन्होने तब तक किया नहीं था और उनके मुताबिक एक अकेली जान को कितना पैसा चाहिये जीने के लिये? वे विवाह के खिलाफ न थे, पर जो काम वे करते थे और बाकी की जिन्दगी में उन्हे करने थे उनकी प्रकृति को देख कर उन्हे लगता था जिससे भी उनका विवाह होगा वह अकारण कुछ परेशानियाँ झेलेगी। मजाक करते हुये वे कहते थे कि वे भी बजरंग बली की तरह पचास साल तक ब्रह्मचर्य को साधना चाहते थे। हालाँकि कुछ साल बाद अड़तीस साल की आयु में उनका विवाह हुआ। कैसे हुआ, किन परिस्थितियों में हुआ, वह कथा किसी और दिन के लिये मुनासिब है।

बहरहाल, विश्वविद्यालय में पढ़ाने से इतना हुआ कि एक तो उन्हे अपनी रुचि के विषयों में शोध करने के लिये एक व्यवस्थित रास्ता मिल गया और बाद में तो वे एक घुमंतु अध्यापक बन गये। आज यहाँ ज्ञान बाँट रहे हैं तो कल किसी और जगह। विभिन्न विश्वविद्यालयों में अनेक मित्र बने, अनगिनत शिष्य और प्रशंसक बने। उनके घनघोर प्रशंसकों और शिष्यों में से एक थे शांतनु।

वे दसवीं में ही रहे होंगे जब उनके माता पिता का देहांत एक दुर्घटना में हो गया था। उनके सामने बहुत मुश्किलें आयीं पर मेहनत, सूझबूझ और अपनी प्रतिभा के दम पर पायी छात्रवृत्ति के बलबूते वे पढ़ते रहे। संयोग से उन्हे बाबा नसरुद्दीन की छत्रछाया मिल गयी।

शांतनु ने नसरुद्दीन के मार्गदर्शन में डाक्टरेट की और बाद में उनकी ही छत्रछाया में उपनिषदों पर बहुत शोध किया और एक सूक्ति ने उन्हे जीवन भर के लिये काज दे दिया। उपनिषद का वह वाक्य था,

अज्ञान तो अंधकार में रखता ही है, ज्ञान उससे भी बड़े अंधकार में धकेल सकता है“।

ये वाक्य उन्हे रात दिन कचोटता और इस एक वाक्य ने उन्हे एक सजग विधार्थी और शोधार्थी बना दिया।

बाद में शांतनु भी एक अन्य विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे। कुछ साल गुजर गये।

इस बीच शांतनु कुछ साल के लिये अमेरिका भी रह आये एक अमेरिकन विश्वविद्यालय के निमंत्रण पर। वे जाना नहीं चाहते थे और उन्होने नसरुद्दीन से सलाह की तो उन्होने कहा कि जाओ बरखुद्दार उधर की दुनिया भी तो देख आओ। जाने से कुछ अरसा पहले ही उनका विवाह भी सम्पन्न हो गया|

जब शांतनु अमेरिका में ही थे तो वहाँ उन्हे एक अन्य भारतीय प्रोफेसर मिले जो कि उनकी तरह ही कुछ समय के लिये वहाँ पढ़ाने के लिये गये हुये थे। प्रोफेसर साब की पत्नी भी उनके साथ थीं और शांतनु की पत्नी और उनमें परदेस में खूब छनने लगी। बच्चे प्रोफेसर साब के थे नहीं। आयु उनकी इकतालिस बयालिस के आसपास ही होगी उस समय, उनकी पत्नी उनसे कोई दसेक साल छोटी थीं।

यूँ तो वे विद्वान थे पर उनमें कुछ सनकें भी थीं। उन्हे अपना तखल्लुस रखने की सनक थी। तखल्लुस तो बहुत लोग रखते हैं पर इन साहब के साथ दिक्कत ये थी कि ये अब तक कम से तीन तखल्लुस बदल चुके थे। उन दिनों वे हिन्द्स्तानी शायरी पर शोध कर रहे थे और उलझन में थे कि क्या तखल्लुस रखें। उनके सामने बहुत सारे विकल्प मौजूद थे।

मीर की शायरी की तर्ज पर अपना तखल्लुस रखें “तीर” कयोंकि बकौल उनके मीर की शायरी एक तीर की तरह सुनने वाले के ह्र्दय में प्रवेश कर जाती है और वह मीरमयी हो जाता है। अमीर खुसरो का काव्य उन्हे “प्रेम” कहकर पुकार रहा था तो गालिब शरारत कर रहे थे कि मियाँ “विद्रोही” हो जाओ| मजाज़ पेश कर रहे थे उन्हे “मिजाज़“।

शायरी की बात हो तो नसरुद्दीन का जिक्र शांतनु को करना लाजिमी था, आखिरकार नसरुदीन ठहरे शायरी के बहुत बड़े कद्रदानों में से एक। शांतनु ने प्रोफेसर से बातचीत करते वक्त्त अपने गुरु नसरुद्दीन के शायरी के प्रति प्रेम को बताया और उनकी विद्वता का बखान भी किया और बखान इतना किया कि प्रोफेसर के दिल में नसरुद्दीन के दर्शन करने की तलब हिलोरे मारने लगी।

उस समय भारत के शायरों पर काम कर रहे प्रोफेसर को कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। खासकर मजाज़ पर शोध करने में उन्हे कठिनाइयाँ आ रही थीं। शांतनु ने उन्हे बताया कि गुरुदेव नसरुद्दीन उनकी सहायता कर सकते हैं। प्रोफेसर साब खिल उठे उन्होने हाथ पकड़ लिये शांतनु के कि तुरंत खत लिखो अपने गुरु को। दिल में कहीं उनके नसरुद्दीन को आजमाने की बात भी थी कि जरा देखें इन नसरुद्दीन साहब का दम खम।

कुछ ही दिन बाद शांतनु को एक बड़ा सा पैकेट पार्सल द्वारा मिला। अपने लिये भेजे गये व्यक्तिगत सामान को निकाल उन्होने प्रोफेसर को नसरुद्दीन द्वारा भेजे गये कागजात दे दिये। प्रोफेसर सारी रात सो नहीं पाये। डिनर करने के बाद नसरुद्दीन द्वारा भेजी गयी सामग्री पढ़नी शुरु की तो कब रात बीती उन्हे पता ही नहीं चला, जब सुबह के सूरज ने अपनी लालिमा से खिड़की के शीशों की मार्फत अंदर आकर कमरे के बाकी स्पेस और साजो सामान को जगा दिया तब उनका ध्यान भंग हुआ।

“कमाल कर दिया गुरु” बड़बड़ाते हुये वे कुर्सी से उठे और एक भरपूर अंगड़ायी लेकर वे तैयार होने चले गये। शांतनु से मिलते ही उन्होने घोषणा कर दी कि वे भी आज से उनके गुरु नसरुद्दीन के मुरीद और शिष्य हो गये हैं और उन्होने तय कर लिया है कि भारत लौटते ही चल रहे शोध कार्य से इतर वे हिन्दुस्तानी शायरी पर एक किताब भी लिखेंगे जो नसरुद्दीन को समर्पित होगी। उन्होने भावविभोर होकर नसरुद्दीन को एक लम्बा सा आभार पत्र लिख भेजा और उसमें भी उन्होने अपने द्वारा उनके शिष्य होने की घोषणा लिख भेजी और उनसे प्रार्थना की कि वे भी उन्हे शिष्य रुप में स्वीकार करें।

अमेरिका से लौटने के कुछ अरसे बाद संयोग कहिये या प्रोफेसर साब के प्रयास, वे भी शांतनु के विश्वविद्यालय में आ गये पढ़ाने। उन्होने दो शोध छात्रों को शायरी पर चल रहे अपने शोध कार्य से जोड़ लिया। भारत आते ही वे नसरुद्दीन से मिलना चाहते थे पर संयोग ऐसा बैठा कि शांतनु और प्रोफेसर के अमेरिका से लौटने से पहले ही नसरुद्दीन चले गये तजाकिस्तान और वहाँ से उन्हे तुर्की जाना था। वे खुद रुमी पर शोध कर रहे थे उन दिनो और इसी सिलसिले में वे दो साल के लिये बाहर चले गये थे। मजाज़ पर शोध के संदर्भ में प्रोफेसर साब उनसे नियमित पत्र व्यवहार करते रहे और नसरुद्दीन भी पत्रों के द्वारा ही उनका मार्ग दर्शन करते रहे। जहाँ भी नसरुद्दीन कहते प्रोफेसर अपने दोनों दोनों शोधार्थियों को वहाँ भेज देते। काम बड़ी तन्मयता से चल रहा था।

नसरुद्दीन के वापिस आने से कुछ अरसा पहले ही प्रोफेसर साब ने शोध कार्य खत्म कर दिया और एक किताब भी तैयार कर दी। प्रोफेसर साब तो नसरुद्दीन को भी सहलेखक के रुप में शामिल करना चाहते थे पर नसरुद्दीन ने विनम्रता पूर्वक मना कर दिया। प्रोफेसर ने किताब को छपवाने के लिये नहीं भेजा, उन्होने कहा कि नसरुद्दीन आयेंगे और पांडुलिपी का ही विमोचन करेंगे और किताब का नाम तय करेंगे और उनसे मूल पांडुलिपी पर ऑटोग्राफ लेकर ही उसे छपने के लिये प्रेस में भेजा जायेगा।

सारा कार्यक्रम उन्होने शांतनु के साथ मिल कर तय कर दिया कि भारत आते ही नसरुद्दीन वहाँ आयेंगे और पांडुलिपी का विमोचन करेंगे। नसरुद्दीन को मानना पड़ा और पत्र द्वारा उन्होने स्वीकृति और भारत वापसी का अपना कार्यक्रम भेज दिया।

आज का किस्सा सीधे उनके द्वारा की गयी किसी कारगुजारी से सम्बंधित नहीं है पर वे भी उस घटना के एक महत्वपूर्ण पात्र थे।

संयोग अगर संयोग ही उत्पन्न न करें तो उन्हे संयोग ही क्यों कहा जाये? इधर प्रोफेसर साब का शोध पूरा हुआ, पांडुलिपी तैयार हुयी और उधर प्रोफेसर की पत्नी की कोख से भी एक कृति का जन्म हो गया और उन्होने एक पुत्र को जन्म दिया। प्रोफेसर तो नहीं परंतु उनकी पत्नी ग्रह नक्षत्र को बहुत मानती थी। उनके विवाह के लगभग दस ग्यारह साल बाद उन्हे संतान की प्राप्ति हुयी थी सो वे किसी किस्म का कोई रिस्क लेना नहीं चाहती थी। बच्चे के जन्मते ही उसकी जन्मकुंडली बनवाने का इंतजाम उन्होने अस्पताल जाने से पहले ही कर दिया था और ऐसा ही हो भी गया। परंतु दिक्कत ये आ गयी कि पंडित ने घोषणा कर दी कि बालक ने ऐसे नक्षत्रों में जन्म लिया है कि बालक की माता के मातापिता भाई बहन आदि बच्चे को तीन माह तक न देखें। पर दिक्कत ये थी कि प्रोफेसर की पत्नी के परिवार में पीढ़ियों से रिवाज चला आ रहा था कि नवजात शिशु का नामकरण बच्चे का नाना या अगर वह जीवित नहीं है तो बच्चे का मामा करेगा। अगर दोनों ही जीवित नहीं हैं तो जिसे भी बच्चे की माता दिल से अपने पिता या भाई स्वरुप मानती है वह यह कार्य करेगा। और बड़ी दिक्कत यह आयी कि पंडित ने आगे कहा कि बच्चे का नामकरण दो माह के अंदर करना बहुत जरुरी है और जो भी बच्चे का नामकरण करेगा उसे बच्चे के जन्म के बारे में कुछ मालूम नहीं होना चाहिये और बच्चे को एकदम से उसके सामने लाया जाना चाहिये और उसे कुछ ही क्षणों में एक सुयोग्य नाम बच्चे को देना चाहिये।

प्रोफेसर इन सब ग्रह नक्षत्रों की बातों को नहीं मानते थे पर पत्नी को नाहक नाराज भी नहीं करना चाहते थे। नसरुद्दीन वहाँ आ ही रहे थे सो प्रोफेसर की पत्नी और शांतनु की पत्नी ने भी तय कर लिया कि नसरुद्दीन के आने के अवसर पर ही बच्चे के जन्म की खुशी का समारोह आयोजित किया जाये और नसरुद्दीन ही बच्चे का नामकरण भी करें। पर ये बात दोनों ही स्त्रियों ने प्रोफेसर को न बतायी और साथ ही साथ शांतनु को भी विवश कर दिया कि यह बात प्रोफेसर को न बतायी जाये।

प्रोफेसर अपनी पुस्तक की पांडुलिपी के विमोचन की तैयारी में व्यस्त थे पर इसी बीच उपकुलपति के आदेशानुसार उन्हे एक सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिये कुछ दिनों के लिये बम्बई जाना पड़ गया और अब उन्हे उसी दिन वापिस आना था जिस दिन नसरुद्दीन का वहाँ पधारने का कार्यक्रम था। प्रोफेसर ने अपनी पत्नी को निमंत्रण पत्र का मसौदा और किसे किसे निमंत्रण भेजना है, उन सब नामों की लिस्ट दे दी और कहा कि शांतनु और उनके छात्रों की सहायता से वे निमंत्रण पत्र छपवा कर सबको भेज दें। वे नसरुद्दीन के समारोह में आगमन को एक यादगार घटना बनाना चाहते थे। उनके जाने के बाद प्रोफेसर की पत्नी ने किताब के विमोचन के निमंत्रण पत्र को बच्चे के जन्म की खुशी में आयोजित समारोह का निमंत्रण पत्र बना कर सब लोगों को भिजवा दिया। वैसे लगभग सारे नाम तो उन्ही परिचितों के थे, जिन्हे चाहे किसी भी कारण से बुला लो। अतिथियों को भी इस बात का अहसास था कि प्रोफेसर और उनकी पत्नी को निस्संदेह बहुत ज्यादा खुशी होगी विवाह के इतने साल बाद संतान प्राप्ति से। आखिर उनका आँगन भी बच्चे की किलकारियों से गूँजेगा।

नियत दिन आ गया। नसरुद्दीन तो पहुँच गये। शांतनु उन्हे स्टेशन से ले आया और उन्होने बच्चे के नामकरण की रस्म भी विधिवत अदा कर दी और बच्चे को नाम दिया “पुलकित”।

समारोह में अतिथिगण आने लगे पर प्रोफेसर साब न पहुँच पाये थे, रेलवे स्टेशन पर पता किया गया तो पता चला की गाड़ी कुछ देरी से आयेगी।

उधर प्रोफेसर साब भी इस चिंता में घुले जा रहे थे कि नसरुद्दीन वहाँ पहुँच गये होंगे और वे अभी भी रेल में ही हैं। जाने क्या सोचते हों नसरुद्दीन? उन्होने उपकुलपति को थोड़ा कोसा।

ऐसे ही बैचेनी में भरे वे रेल के स्टेशन पर पँहुचने का इंतजार करते रहे और जैसे ही रेल स्टेशन पर पँहुची वे गाड़ी के रुकने से पहले ही रेल के डिब्बे से बाहर प्लेटफॉर्म पर कूद पड़े और तीर की तरह बाहर की ओर भागे। टैक्सी लेकर वे फौरन से पेश्तर घर पँहुचे।

उनका ही इंतजार हो रहा था। घर पँहुचते ही वे सबसे पहले नसरुद्दीन से मिले। उनकी पत्नी ने उन्हे याद दिलाया कि मेहमान कितनी देर से इंतजार कर रहे हैं उनके आने का।

प्रोफेसर ने हाथ मुँह धोकर वस्त्र बदले और अपनी लिखी पुस्तक की पांडुलिपी लेकर वे घर के बाहर ही स्थित समारोह स्थल पर पँहुच गये। लोगों ने ताली बजाकर उनका स्वागत किया।

प्रोफेसर के हाथों में हल्के लाल रंग के रेशमी वस्त्र में लिपटी पांडुलिपी थी। वे नसरुद्दीन, अपने छात्रों और शांतनु को लेकर मंच पर चले गये जहाँ उनकी पत्नी नवजात शिशु को गोद में लिये बैठी थी और पास ही शांतनु की पत्नी भी खड़ी थी। प्रोफेसर ने सबको शांत रहने के लिये अपना एक हाथ उठाकर इशारा किया सब उनकी तरह देखने लगे।

प्रोफेसर ने बोलना शुरु किया।

आज मेरी जिंदगी का बहुत अहम दिन है। आज हमारे बीच शांतनु के गुरु नसरुद्दीन जी मौजूद हैं। उनकी उपस्थिति मुझे कितनी खुशी दे गयी है मैं उसका वर्णन नहीं कर पाऊँगा और आप लोग शायद अनुमान न लगा पायेंगे। उनकी यहाँ उपस्थिति एक बहुत महत्वपूर्ण काम की परिणति होने के परिणामस्वरुप संभव हो पायी है अतः मेरा फर्ज बनता है कि मैं उस महत्वपूर्ण काम पर कुछ प्रकाश डालूँ।

लोगों ने तालियाँ बजानी शुरु कर दीं। वे तो समझ रहे थे कि जैसे उन्हे बच्चे के जन्म की खुशी बाँटने के लिये आमंत्रित किया गया है वैसे ही नसरुद्दीन भी निमंत्रण पर आये होंगे।
प्रोफेसर लोगों को शांत करते हुये आगे बोले।

कई बरसों से मैं जिस काम में लगान हुआ था वह अपनी परिणति को पँहुच गया है। मेरे गुरु नसरुद्दीन ने इतना मेरा मार्गदर्शन किया है इस कठिन कार्य को सम्पन्न करने में कि मैं ताउम्र उनका शुक्रगुजार रहूँगा। आज वे उस कृति को अपने आशीर्वाद से सुशोभित करने आये हैं जिसका जन्म ही उनके आशीर्वाद से सम्पन्न हो पाया है।

लोग नसरुद्दीन की तरह कौतुहल की दृष्टि से देखने लगे। उन्हे नसरुद्द्दीन कोई पीर या संत लगे। प्रोफेसर लोगों का ध्यान नसरुद्दीन की तरफ देख कर बहुत प्रसन्न हुये और उन्होने कहा।

मैं बहुत ज्यादा आभारी हूँ डा. शांतनु का जिन्होने मुझे गुरु के सम्पर्क में लाने का सौभाग्य प्रदान किया। यह उनका कर्ज रहा मुझ पर। अब तो वे मेरे गुरुभाई हैं।

अपने दोनों छात्रों को स्नेहमयी दृष्टि से देखकर मुस्कुराते हुये उन्होने कहा।

उम्र अपना असर दिखाती है और मेरे लिये इतना कठिन कार्य करना संभव न हो पाता यदि ये दो नौजवान अपनी भरपूर शक्ति, लगन और मेरे प्रति भक्ति से इस कार्य को पूरा करने में मेरी सहायता न करते। इन्होने दिन देखा न रात, जब भी मुझे इनकी जरुरत पड़ी ये उपस्थित रहे। इनके कठिन परिश्रम की बदौलत ही यह कार्य सम्पूर्ण हो पाया है। मैं इनके उज्जवल भविष्य़ को साफ साफ देख पा रहा हूँ।

बच्चे के जन्म के अवसर पर आयोजित समारोह में प्रोफेसर और उनकी पत्नी की खुशी में सम्मिलित होने आये अतिथिगण थोड़े भौचक्के से खड़े प्रोफेसर, नसरुद्दीन और प्रोफेसर के छात्रों को देख रहे थे। कुछ मुस्कुरा भी रहे थे।

खैर उन सबको अनर्गल लगने वाले प्रोफेसर के भाषण का रहस्य तब खुल ही गया जब प्रोफेसर ने रेशमी कपड़े में बंधी पांडुलिपी बाहर निकाली पर उन क्षणों की कल्पना ही की जा सकती है जब अतिथि प्रोफेसर के भाषण को बच्चे के जन्म से सम्बंधित समझ रहे थे और प्रोफेसर यह सोचकर बोल रहे थे कि सब अतिथि उनकी पुस्तक की पांडुलिपी के विमोचन के अवसर पर वहाँ एकत्रित हुये हैं।

किस्सा बहुत साल तक विश्वविद्यालय में हास्य उत्पन्न करता रहा।

…[राकेश]

जून 22, 2010

रावण और अमिताभ बच्चन : नैतिक और जिम्मेदार पत्रकारिता का क्या होगा

इस बात से इंकार करना मुश्किल हो जायेगा कि पिछले दस पंद्रह सालों में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पूरी तरह से भारत में बस जाने के बाद से TRP के भूत और रिपोर्टंग में कुछ भी कह देने की प्रवृति ने प्रिंट मीडिया को भी अपने वश में कर लिया है और अब बहुत सारे पत्रकार रिपोर्ट करने से पहले मामले की थोड़ी सी भी छानबीन करना जरुरी नहीं समझते।

सबसे पहले – सबसे आगे – सबसे तेज, जैसे शब्द पत्रकारिता के बेहद जिम्मेदारी भरे कर्तव्य पर जल्दबाजी के कारण गैर-जिम्मेदारी का मुलम्मा चढ़ाने में कामयाब हो गये हैं। अब किसी भी बात का बतंगड़ बना दिया जाता है। झूठ को इतनी शक्ति से और जोर शोर से प्रसारित और प्रचारित किया जाता है कि एकबारगी जो बताया जा रहा है वह सच लगने लगता है और अगर पाठक या दर्शक अपनी आँखों से न देख लें तो वे रिपोर्ट की गयी बातों को ही सच मान लेते हैं।

हालात उस निम्न स्तर तक पहुँच गये हैं जहाँ अगर मीडिया गलत रिपोर्टिंग करता हुआ पकड़ा भी जाये तो वह कोई क्षमा याचना नहीं करता बल्कि उसके द्वारा सीनाजोरी वाली प्रवृति ही ज्यादा दिखायी जाती है।

लोकतंत्र का यह स्तम्भ कभी बेहद मजबूत, स्वस्थ, निष्पक्ष, और कर्तव्यपरायणता हुआ करता था और जवाबदेही की भावना से ओतप्रोत रहा करता था पर बदले समय ने इसे भी बहुत हद तक बाजारु बना दिया है और इसके सरोकारों को पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होने के कारण संदेहास्पद बना दिया है।

चिंताजनक बात यह है कि यह न तो लोकतंत्र के लिये अच्छा है और न ही मीडिया के लिये। भेड़िया आया की तर्ज पर यदि मीडिया की झूठे और गैर जिम्मेदार होने की छवि बनती चली जायेगी तो दिन दूर नहीं जब इसकी विश्वसनियता बिल्कुल ही खत्म हो जायेगी।

यूँ तो अमिताभ बच्चन से जुड़ी नवीनतम घटना छोटी सी है पर यह मीडिया की गैर जिम्मेदाराना हरकत को स्पष्टत: दर्शाती है इसलिये इस घटना को उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकता है।

अमिताभ बच्चन ने ट्विटर पर फिल्मफेयर के सम्पादक जितेश पिल्लई को रावण फिल्म के ऊपर निम्नलिखित ट्विट्स लिखे।

@jiteshpillaai  Yes it was all there, but sadly edited. Abhishek’s erratic behavior was due to symbolic 10 heads visually appearing..contd

@jiteshpillaai  contd ..and each giving him different attitudes to adopt for a situation, he would then finally shake them off and decide ..

@jiteshpillaai  ..in the edit all the visual heads got cut and you see a confused Beera expression and wonder why .. it was after he removed

@jiteshpillaai  .the other head visuals from his thinking.. in the edit you see the after effect of that thinking process, hence inconsistent

और मीडिया और समाचार पत्रों ने अमिताभ द्वारा लिखी बातों को इस बात के रुप में प्रचारित किया कि “अमिताभ रावण फिल्म की एडिटिंग से नाराज हैं“।

अमिताभ फिल्म के केवल  उन दृष्यों की बात कर रहे हैं जिन दृष्यों में बीरा द्वारा अपने सिर को इधर उधर हिलाने और उस वक्त कुछ जिबरिश सा कहने को दिखाया गया है, पर पत्रकारों ने बिना पूरी बात समझे प्रचारित करना शुरु कर दिया कि अमिताभ रावण के संपादन से नाराज हैं।

अमिताभ बिल्कुल रावण के संपादन या निर्देशन या पूरी फिल्म से ही नाराज हो सकते हैं परन्तु उनके जिन ट्विट्स को उदाहरण के तौर पर मीडिया ने उठाया है वहाँ वे कतई वे बातें नहीं कह रहे हैं जो मीडिया प्रचारित कर रहा है।

कुछ रिपोर्ट्स तो कल्पना में इतना आगे बढ़ गयी हैं कि वहाँ ऐसा अमिताभ बच्चन के ब्लॉग के हवाले से लिखा है जबकि अमिताभ ने अपने ब्लॉग पर रावण की तारीफ में ही एक संक्षिप्त सा ब्लॉग लिखा था। जाहिर है लिखने वाले पत्रकारों ने न उनका ब्लॉग पढ़ा और न ही ढ़ंग से उनके ट्विट्स ही बाँचे।

जाहिर है कि ऐसे सनसनीखेज शीर्षक और खबरें देने से रिपोर्ट को ज्यादा फोकस मिल सकता है पर इस प्रक्रिया में पत्रकारिता की जिम्मेदारी और नैतिकता का क्या हश्र हो रहा है?

बात छोटी सी है पर यही सब बहुत महत्व के मामलों में भी हो रहा है।

क्या चल रहा है यह?

सबसे चिंताजनक बात है कि ऐसी निम्न कोटि के हथकंडों भरी पत्रकारिता के प्रचलन में आने से नैतिकता भरी पत्रकारिता करने वाले बेहद प्रतिभावान पत्रकार और मीडियाकर्मी पीछे रह जाते हैं। उन्हे पुरातनपंथी कहकर पीछे ढ़केल दिया जाता है और उन्हे कुंठा में जीने को विवश किया जाता है।

ऐसी प्रवृति पत्रकारिता जैसे समाज के लिये बेहद महत्वपूर्ण और सम्मानजनक क्षेत्र के लिये शुभ नहीं है।

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