Posts tagged ‘Priy’

दिसम्बर 21, 2013

बंद हूँ तेरे ही प्राणों के मद में…

मेरे मन ने देह को त्याग दिया हैavishkar-001

और वह

बिस्तरे के सामने

ठीक सामने तस्वीर टांगने वाली

खूंटी पर जा बैठा है |

करवट पड़ी तुम्हारी आँखें

अब भी खुली हैं

जिनमें मेरे मन के ही प्रश्न हैं

सखे, सुन

मेरी देह से मेरे मन का न ले भान

जब तू मुझमें निमग्न हो

छूएगी अपने ही प्रान

तो पायेगी,

मन तो मेरा चिर तेरा कामी

पर देह अभ्यासी दुनियावी अनुगामी

मैं तो जब तुझमें डूबा था,

उस रात्री प्रथम

तब से,

बंद वहीं हूँ,

डूबता, तिरता, उतराता

तेरी ही साँसों की लय में,

तेरे ही प्राणों के मद में!

Yugalsign1

नवम्बर 10, 2013

प्रिय, अब तुम जाओ

shy woman-001

अब तुम जाओ|

बोलना तुम्हे होता नहीं है

क्या वास्तव में

मुझसे साझा करने को तुम्हारे पास कुछ नहीं होता?

मुझे तो तुम्हारे झगड़ने से

भी कोई परेशानी नहीं

पर तुम गूंगी गुडिया

के अपने अवतारी रूप से बाहर आकर

हमारी मुलाकातों को

सजीव और दो पक्षीय तो बनाओ

अभी तो होता यह है

कि मैं ही रेडियो की तरह

बोलता हूँ

हर पहल मुझे ही करनी होती है

इससे भी कोई शिकवा नहीं

अगर खामोशी तुम्हारा आनंद हो

पर खलता है

जब तुम अपने अंदर शिकायत

भरे रखते हो

पर उसे भी मुझसे न कह कर

उनकी संख्या

और तींव्रता बढाए चले जाते हो|

अरे, कभी-कभी मुझे

ऐसा लगता है कि तुमसे अच्छी तो तुम्हारी याद है

जो जब मैं चाहूँ

मेरे पास आ बैठती है

और मेरी हर बात में

पूरी गर्मजोशी से मेरा साथ देती है|

तुम्हे पता है तुम्हारे आने से पहले

मैं तुम्हारी याद के साथ ही बैठा था,

कितने रचनात्मक क्षण थे वे!

तुम्हारी याद के सामने, उसके साथ

मैंने दो पंक्तियाँ भी रचीं

तुम सुनोगे?

” मैंने जब झुक कर कहा,

बस शुक्रिया!

जिंदगी पशीमां हो गई|”

अब तुम जाओ!

तुम्हारे जाने के बाद

मैं तुम्हारी याद के साथ

कुछ पल ऐसे तो बिता लूंगा

जहां मुझे लगेगा

तुम पूरी की पूरी

बिना किसी लागलपेट के

मेरे साथ हो|

Yugalsign1

%d bloggers like this: