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अप्रैल 12, 2011

जय जवान

बर्फीले तूफान के कारण गाड़ी बहुत धीमे धीमे  चल पा रही थी। कप्तान साहब परेशान थे कि अगर समय रहते सुंरग तक न पहुँच पाये और किसी दुर्घटनावश सुरंग बंद हो गयी तो बहुत दिक्कत आ जायेगी। वे चालक से तेज चलाने के लिये कह भी नहीं पा रहे थे। इतने भारी हिमपात में वह गाड़ी चला पा रहा था यही बहुत बड़े साहस की और मूर्खता की बात थी। जब मैदानी बेस स्टेशन से चले थे तो हल्के हिमपात के ही आसार थे और उन्होने अनुमान लगाया था कि अगर हिमपात बढ़ा तो भी वे समय रहते सुरंग पार कर जायेंगे और उसके बाद तो धीरे धीरे भी गाड़ी चलायी तो भी अगले दिन तक कैम्प तक पहुँच ही जायेंगे। इसलिये वे सुबह छह बजे ही बेस स्टेशन से चल पड़े थे। पर दुर्भाग्य से रास्ते में ही हिमपात अनुमान से ज्यादा होने लगा और वे अपने अनुमानित समय से कुछ घंटे की देरी से सुरंग के पास पहुँचे। उनकी गाड़ी से पहले ही ट्रकों एवम अन्य वाहनों की कतारें सड़क पर खड़ी थीं। उनकी गाड़ी सुरंग से कम से कम १ किमी पहले ही रुक गयी। नीचे उतर कर पहले से खड़ी गाड़ियों से मालूम किया तो पता चला कि वहाँ लैंड-स्लाइडिंग होने से सुरंग का मुँह बंद हो गया है। बर्फबारी रुकने से पहले सुरंग की सफाई का काम शुरु नहीं हो सकता। इतनी भारी बर्फबारी में मशीने और मजदूर ही वहाँ तक नहीं आ सकते। बर्फबारी रुक भी जाये तो भी आड़े तिरछे खड़े वाहनों को हटाने में ही बहुत समय लग जाना है।
कप्तान साहब चिंतित हो गये। दुश्मन ने पर्वतों की चोटियों पर स्थित उनकी चौकियों पर चुपके से कब्जा कर लिया था। उनके लिये गाड़ी में रखी अत्यंत जरुरी सामग्री को अपने कैम्प तक ले जाना बहुत जरुरी था। चालक के अलावा उनके साथ सिक्योरिटी के लिये दो जवान और थे। उन्होने गाड़ी में मौजूद वायरलैस से बेस स्टेशन या कैम्प पर सम्पर्क साधने के लिये एक जवान से कहा परंतु सम्पर्क स्थापित नहीं हो पाया। आतंकवादियों ने अलग दहशत फैला रखी थी राज्य में।

वे चिंतित होकर इधर उधर टहल रहे थे। कभी सुरंग की ओर जाते वाहनों के बीच स्थान खोजते हुये और कभी अपनी गाड़ी के पीछे की तरफ जाते। पीछे से उनके बाद भी कई वाहन आ गये थे।
समय बीत नहीं रहा था।

कुछ देर बाद उन्होने सेना की वर्दी पहने कुछ जवानों को कमर पर पिट्ठू बैग कसे हुये पास के ढ़लान से उतरते हुये देखा। उन्हे ऐसा लगा जैसे वे सुरंग के दूसरी ओर से आये हैं। वे लपक कर उनके उतरने की जगह के करीब पहुँचे। छह जवान सावधानी से ढ़लान से नीचे उतर रहे थे। जवान भी अपने सामने सेना के एक अधिकारी को खड़े देखकर कुछ चौकन्ने हो गये। उन्होने कप्तान साहब को सेल्यूट किया।

कप्तान साहब ने पूछा,” क्यों मेजर, क्या सुरंग के दूसरी तरफ से आ रहे हो आप लोग”।

जी साहब, उधर भी ऐसा ही हाल है। सुरंग बंद हो गयी है और वाहन अटके खड़े हैं। हम लोग तो कोई चारा न देखकर पैदल ही चढ़ाई करके आ रहे हैं। हमें लगा था कि इधर आ जायेंगे तो हो सकता है कि कोई वाहन वापिस जाने की तलाश में हो और हमें जगह मिल जाये

कहाँ जा रहे हो आप लोग?

साहब हम लोग तो छुट्टी पर घर जा रहे हैं। आप यहाँ कैसे अटक गये?

कप्तान साहब बातें करते करते उन्हे अपनी गाड़ी तक ले आये थे। कप्तान के साथ सेना के जवानों को देखकर उनकी गाड़ी में बैठे चालक और दोनों जवान भी गाड़ी से बाहर आ गये।

उन्होने जवानों से पीछे गाड़ी में बैठने को कहा। सब अंदर बैठ गये तो कप्तान साहब ने अपने साथ आये जवानों से थर्मसों में रखी चाय सबको देने के लिये कहा।

चाय पीकर सबके शरीर भी खुले और दिमाग में भी चुस्ती आयी।

कप्तान ने जवानों को बताया कि कैसे वे यहाँ अटक गये हैं और कैसे उनका कैम्प पर पहुँचना बहुत जरुरी है। उन्होने समस्या की गम्भीरता उन्हे बतायी।

जवानों ने कहा,” साहब सुरंग के दूसरी ओर तो सड़क का भी बहुत बुरा हाल है। बर्फ हटाये बिना वाहन चल भी नहीं सकते। अगर आप हमारी तरह चढ़ाई करके उधर पहुँच भी गये तो उधर कोई वाहन मिल भी सकता है परंतु इंतजार तो करना ही पड़ेगा जब तक कि रास्ता साफ न हो जाये”।

कप्तान साहब चिंतित स्वर में बोले,” अरे बहुत दिक्कत हो जायेगी अगर सामान न पहुँचा समय पर”।

थोड़ी देर गाड़ी में चुप्पी समायी रही। जवान एक दूसरे की ओर देख रहे थे। नये आये जवानों ने आँखों-आँखों में कुछ बातें कीं और उनमें से एक जवान ने कहा,” साहब एक काम हो सकता है। हममें से दो पिछले साल सर्दियों में भी ऐसे ही सुरंग के पास फँस गये थे। इतना खराब मौसम नहीं था पर सुरंग के दूसरी ओर वाहनों की दुर्घटना होने के कारण रास्ता बंद हो गया था और जाम लग गया था। बर्फ भी पड़ने लगी थी पर इतनी भारी बर्फबारी नहीं थी उस वक्त। हम आठ लोग थे और हम लोगों को ड्यूटी ज्वाइन करनी थी। हम लोगों ने पैदल ही रास्ता पार किया था। सुरंग से करीब दस किमी चलना पड़ेगा पर आगे शायद मौसम ठीक हो और वाहन मँगवाया जा सके”।

कप्तान साहब की आँखों में चमक तो आयी पर उन्होने सीमायें भी जता दीं,” हम तो केवल तीन लोग हैं, चालक को तो यहीं गाड़ी के साथ रहना होगा, सामान हमारे पास बहुत है, बिना सामान के जाने का कोई मतलब नहीं और उसे छोड़ा भी नहीं जा सकता, बल्कि यहाँ गाड़ी के साथ भी एक और जवान चाहिये”।

कप्तान साहब कुछ कहना चाहते थे पर हिचकिचाहट के मारे कह नहीं पाये और गाड़ी से बाहर धुआँधार गिरती बर्फ को देखने लगे।

जवान कप्तान साहब की परेशानी समझ गये। सैनिकों के दिमाग और ह्रदय एक ही तरीके से काम करते हैं। उन्होने फिर से आपस में इशारों में बात की। आशायें, लाचारियाँ और फर्ज आपस में गुत्थमगुत्था हुये पर जो निकल कर आया उसने कप्तान साहब को चौंका दिया।

एक जवान ने कहा,” साहब, हम लोग आपके साथ चलते हैं। अपने अपने पिट्ठुओं में सामान भर लेंगे”।

“पर आप लोग छुट्टी पर जा रहे हैं। कितने समय बाद जा रहे होंगे। घर-परिवार के लोगों से मिलने की उत्सुकता होगी”।

“साहब आप इस बात की चिंता न करें। फर्ज छोड़कर तो भागेंगे नहीं। पीठ दिखाकर चले गये तो कैसी छुट्टियाँ? घरवालों के साथ रहते हुये भी कैसे कटेंगी वे”।

कप्तान साहब के पूरे चेहरे और आँखों में गर्व दमकने लगा। गर्वीले और जोशीले स्वर में उन्होने कहा,” शाबास मेजर! आप जैसे जाबांजों पर सेना और पूरा देश फख्र करता है”।


जवानों ने साहसी स्वर में कहा,” साहब चूँकि गाड़ी यहीं रहेगी आप चालक से इतना इंतजाम करने के लिये कह दीजिये कि हमारे घरों पर सूचना दे दे कि शायद आने में देरी हो जाये और एक दो दिन में हम सम्पर्क कर लेंगे।”

कप्तान साहब ने कहा,” उसकी आप लोग चिंता न करें। मैं कोशिश करुँगा कि आपके अधिकारी आपकी छुट्टियाँ रीशेडयूल कर दें। चालक के पास वायरलैस है वह बेस स्टेशन पर सम्पर्क साधने की कोशिश करता रहेगा और आप अपने डिटेल्स उसे देंदें वह सब सम्भाल लेगा”।

उन्होने झट से योजना बना दी। उन्होने कहा चूँकि हमारे पास केवल दो हथियारबंद जवान हैं सो दोनों हमारे साथ चलेंगे। गाड़ी के साथ चालक और आप में से कोई एक रुक जाओ।

जवानों ने झटपट अपने अपने पिट्ठुओं को खाली करके उनमें कप्तान साहब की दी हुयी सामग्री भर ली।

थोड़ी देर बाद ही बर्फीले तूफान को मात देते हुये अपने फर्ज़ को अंजाम देने के लिये भारतीय सेना के आठ जांबाज सैनिक अपने अपने कंधों पर भारी पिट्ठुओं को लादे चढ़ाई चढ़ते जा रहे थे।

…[राकेश]

अक्टूबर 11, 2010

उधार का भाग्य…

प्रकाश माइक के पास पहुँचे। उन्होने सामने बैठी और खड़ी भीड़ को देखा और बोलना शुरु किया।

आज मैं अंतिम बार इस स्कूल के प्रिंसीपल के रुप में आप सबसे बात कर रहा हूँ। इसी जगह खड़े होकर मैंने बरसों भाषण दिये हैं। आज जब मेरी नौकरी का अंतिम दिन है तो मैं सोचता हूँ कि इस शिक्षण संस्थान की नौकरी से तो मुक्ति मिल रही है पर क्या कल से मेरे अंदर बैठा शिक्षक भी सेवानिवृत हो जायेगा? क्या एक शिक्षक कभी भी अपने कर्तव्य से मुक्त्त हो सकता है? कुछ सवाल हैं जो मेरे अंदर उमड़ रहे हैं, उनके उत्तर भी मिल ही जायेंगे।
इस परिसर में इस मंच से अपने अंतिम सम्बोधन में एक कथा आप सबसे, विधार्थियों से खास तौर पर, कहना चाहूँगा।

बहुत साल पहले की बात है।

एक लड़का था। उम्र तकरीबन आठ-नौ साल रही होगी उस समय उसकी। एक शाम वह तेजी से लपका हुआ घर की ओर जा रहा था। दोनों हाथ उसने अपने सीने पर कस कर जकड़ रखे थे और हाथों में कोई चीज छिपा रखी थी। साँस उसकी तेज चल रही थी।

घर पहुँच कर वह सीधा अपने दादा के पास पहुँचा।

बाबा, देखो आज मुझे क्या मिला?

उसने दादा के हाथ में पर्स की शक्ल का एक छोटा सा बैग थमा दिया।

ये कहाँ मिला तुझे बेटा?

खोल कर तो देखो बाबा, कितने सारे रुपये हैं इसमें।

इतने सारे रुपये? कहाँ से लाया है तू इसे?

बाबा सड़क किनारे मिला। मेरे पैर से ठोकर लगी तो मैंने उठाकर देखा। खोला तो रुपये मिले। कोई नहीं था वहाँ मैं इसे उठा लाया।

तूने देखा वहाँ ढ़ंग से कोई खोज नहीं रहा था इसे?

नहीं बाबा। वहाँ कोई भी नहीं था। आप और बाबूजी उस दिन पैसों की बात कर रहे थे अब तो हमारे बहुत सारे काम हो जायेंगे।

पर बेटा ये हमारा पैसा नहीं है।

पर बाबा मुझे तो ये सड़क पर मिला। अब तो ये मेरा ही हुआ।

दादा के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आयीं।

नहीं बेटा, ये तुम्हारा पैसा नहीं है। उस आदमी के बारे में सोचो जिसका इतना सारा पैसा खो गया है। कौन जाने कितने जरुरी काम के लिये वह इस पैसे को लेकर कहीं जा रहा हो। पैसा खो जाने से उसके सामने कितनी बड़ी परेशानी आ जायेगी। उस दुखी आदमी की आह भी तो इस पैसे से जुड़ी हुयी है। हो सकता है इस पैसे से हमारे कुछ काम हो जायें और कुछ आर्थिक परेशानियाँ इस समय कम हो जायें पर यह पैसा हमारा कमाया हुआ नहीं है, इस पैसे के साथ किसी का दुख दर्द जुड़ा हो सकता है, इन सबसे पैदा होने वाली परेशानियों की बात तो हम जानते नहीं। जाने कैसी मुसीबतें इस पैसे के साथ आकर हमें घेर लें। उस आदमी का दुर्भाग्य था कि उसके हाथ से बैग गिर गया पर वह दुर्भाग्य तो इस पैसे से जुड़ा हुआ है ही। हमें तो इसे इसके असली मालिक के पास पहुँचाना ही होगा।

प्रकाश ने रुककर भीड़ की तरफ देखा, सभी रुचि के साथ उन्हे सुन रहे थे। वे आगे बोले।

किस्सा तो लम्बा है। संक्षेप में इतना बता दूँ कि लड़के के पिता और दादा ने पैसा उसके मालिक तक पँहुचा दिया।

इस घटना के कुछ ही दिनों बाद की बात है। लड़का अपने दादा जी के साथ टहल रहा था। चलते हुये लड़के को रास्ते में दस पैसे मिले, उसने झुककर सिक्का उठा लिया।

उसने दादा की तरफ देखकर पूछा,”बाबा, इसका क्या करेंगे। क्या इसे यहीं पड़ा रहने दें। अब इसके मालिक को कैसे ढ़ूँढ़ेंगे?”
दादा ने मुस्कुरा कर कहा,” हमारे देश की मुद्रा है बेटा। नोट छापने, सिक्के बनाने में देश का पैसा खर्च होता है। इसका सम्मान करना हर देशवासी का कर्तव्य है। इसे रख लो। कहीं दान-पात्र में जमा कर देंगे।

बाबा, इसके साथ इसके मालिक की आह नहीं जुड़ी होगी?

बेटा, इतने कम पैसे खोने वाले का दुख भी कम होगा। इससे उसका बहुत बड़ा काम सिद्ध नहीं होने वाला था। हाँ तुम्हारे लिये इसे भी रखना  गलत है। इसे दान-पात्र में डाल दो, किसी अच्छे काम को करने में इसका उपयोग हो जायेगा।

लड़के को कुछ असमंजस में पाकर दादा ने कहा,” बेटा उधार का धन, भाग्य और ज्ञान काम नहीं आता। वह अपने साथ मुसीबतें भी लाता है। अपने आप अर्जित किया हुआ ही फलदायी होता है”।

लड़के के दादा एक प्राइमरी स्कूल में शिक्षक थे।

आज वह लड़का आपके सामने आपके प्रिंसीपल के रुप में खड़ा है। ईमानदारी और स्वयं अर्जित करने की शिक्षा मैंने अपने बाबा से ग्रहण की थी। मुझे संतोष है कि उनकी शिक्षा के कारण मैं जीवन में ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सका। मुझे भरपूर संतोष है। आज मैं अपने बाबा के द्वारा दी गयी सीख आप सबको सौंपता हूँ। मुझे विश्वास है, कि यहाँ मौजूद सारे लोग नहीं तो कुछ अवश्य ही इस विरासत को अपनायेंगे। कुछ भी अर्जित करने की इच्छा हो उसे स्वयं ही अपनी बुद्धि और लगन से प्राप्त करें। ऐसा करना आपके लिये एक साफ-सुथरे और तनाव रहित जीवन की बुनियाद प्रदान करेगा।

…[राकेश]

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