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अक्टूबर 4, 2011

बेज़ुबान अहसास

यूँ ही भटकते हुए पता नहीं
क्यों लौटा था बरसों बाद
पार्क के उस कोने की ओर
जहाँ खुशबू भरे माहौल में
रंगीन सपने बुने जाते थे कभी।

लकड़ी की बेंच अब वहाँ नहीं है
जिस पर बिखरा करता था
अल्हड़ उमंगों का ताना-बाना।

चहचहाते पंछी कब के उड़ गये
प्रेमगीत गाकर
नीम के मोटे तने पर,
नादान उम्मीदों ने गोदे थे नामों
के पहले अक्षर
सूखा ठूठ बना खडा है वह।

आज भी हवाओं के दामन पर
मंज़र दर मंज़र धुंधलाई हुई कहानियाँ
फव्वारों की इंद्रधनुषी फुहारों में
बिखर रही हैं कतरा कतरा।

खामोशी की भाषा पढ़ने वाली आँखे
अब कहाँ उस अहसास के साथ
जिसके पास केवल बेज़ुबानी बची है।

(रफत आलम)

जुलाई 14, 2010

प्रेम, प्रेमी और प्रेम-गीत अगली पायदान पर

आज जब वह आया
तो आनंदित था,
खुशी सिर्फ बाहरी नहीं थी
वरन लगता था
कि अंदर तक
खुशी से लबरेज है।

पुरुष को,
जिसे एक स्त्री से प्रेम है,
एक कागज मिला।

उसकी प्रेमिका के
लिये लिखी गयी
एक पाती है यह,
जो कभी किसी समय
उसके प्रति प्रेम होने का दावा करने वाले ने लिखी है,
इस पत्र को पढ़कर पुरुष को जलन नहीं हुयी,
वह गुस्से से भड़भड़ा कर
प्रेमिका पर नहीं गरजा।

आज उसने अपनी प्रेमिका के स्त्रीपन को उसी रुप में स्वीकारा,
जैसे कि अपने पुरुष होने को स्वीकारता रहा है,
आज उसने स्त्री को भी पुरुष की भाँति ही एक मानव जाना,
और उसके अपनी ही तरह जीवित होने को मान्यता दी।

स्त्री हो या पुरुष
चरित्र और भावनायें,
तो आखिरकार
सबमें एक जैसी ही तो होती हैं!

भाई शहर भर की लड़कियों को प्रेम पत्र लिखता रहे
और बहन द्वारा एक भी ऐसा पत्र पाने
पर वह उसका और लिखने वाले का
खून करने पर आमादा हो जाये
तो ऐसी प्रवृति को क्या कहेंगे?
अमानवीय ही न!

अपना खून खून
और दूसरों का पानी
वाला भाव नहीं चल सकता हमेशा!

पुरुष तो कहीं भी कैसे भी अपने बदन की नुमाइश कर ले
और थोड़ा सा भी अंग छलकाने वाली नारी वेश्या लगने लगती है
समाज को!

ऐसे कैसे पुरुष सारी धरती पर राज करता चलेगा?

ये सब परिभाषायें तो खोटी हैं,
थोथी हैं,
शरीर अगर शरीर है तो सबका एक सा है
आत्मा अगर आत्मा है तो सबमें एक सी है।
भेद क्यों शरीर के आधार पर?
यह तो असभ्यता की निशानी हुयी!

प्रेम ने इतने पाठ पढ़ा दिये
उस पुरुष को,
उसके और उसकी प्रेमिका के
मध्य प्रेम से उपजे प्रेम-गीत
को उत्थान मिला
और वे तीनों,
पुरुष, स्त्री और उनका प्रेम
मानवीय विकास की
अगली सीढ़ी पर चढ़ गये।

इसीलिये वह आनंदित था।

...[राकेश]

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