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नवम्बर 24, 2013

अंतस के परिजन: एक डॉक्टर की डायरी

antasमनुष्य जीवित है तो उसका साथ शारीरिक और मानसिक कष्टों और रोगों से होता ही रहेगा और ऐसी परिस्थितियों में चिकित्सिक से दूरी तो रह नहीं सकती| किसी भी विधा में अभ्यास करता हो चिकित्सिक, चाहे वह वैध हो, हकीम हो, एलोपेथिक डॉक्टर हो या होमियोपैथी से इलाज करता हो, वह हर काल में समाज का एक महत्वपूर्ण भाग रहा है|

जीने से मनुष्य का अगाध मोह है और एक ही नहीं हजारों भगवद गीता रच दी जाएँ, सामूहिक स्तर पर  मनुष्य जीवन से इस मोह को मिटाना संभव नहीं है और लाखों-करोड़ों में से कोई एक ही जीवन और शरीर के मोह से ऊपर उठ पाता है| जीने के प्रति इस गहरे भाव के कारण ही मनुष्य के लिए चिकित्सक ईश्वर का ही प्रतिनिधित्व करता है| वही है जो उसे मौत के मुँह में से भी खींच लाता है और उसकी काया से रोगों को दूर भगाने में उसकी सहायता करता है उसका पथ –प्रदर्शक बनता है| इस आदर के कारण मानव की चिकित्सिक से अपेक्षायें भी बहुत ज्यादा होती हैं| बीमारी की हालत में चिकित्सिक के वरदहस्त में पहुँचते ही रोगी को आशा बांधने लगती है कि अब शायद वह अच्छा हो जायेगा और फिर से जीवन की ओर वापस करेगा|

असल जीवन में नर्स बोलते ही मानव के मन मस्तिष्क में Florence Nightingale नाम तैरने लगता है| डा. कोटनिस एक त्यागमयी चिकित्सिक के रूप में मनुष्य को देवता स्वरूप लगते आए हैं|

साहित्य, नाटक और फ़िल्में जैसी विधाएं भी चिकित्सक के विभिन्न चरित्रों को मानव के सम्मुख प्रस्तुत करती रही हैं, उनमें से कुछ ऐसे चरित्र हैं जिनकी अच्छाइयों के कारण वे दर्शक के मनमानस में गहरे जाकर बैठ जाते हैं|

कौन भूल सकता है आनंद फिल्म के डा. भास्कर बनर्जी, जिसे अमिताभ बच्चन ने अपने बेहद अच्छे अभिनय से जीवंत किया था, को जो अपने पास आने वाले रोगियों को कभी भी गलत सलाह नहीं देता और चिकित्सीय पेशे की ईमानदारी उसके लिए खुद की कमाई से ज्यादा महत्वपूर्ण है जबकि उसी के साथी लोगों से छल करके धनी बनते रहते हैं वह ईमानदारी का दामन पकडे रखता है| खामोशी फिल्म की नर्स राधा (वहीदा रहमान) को क्या भुलाया जा सकता है जो अपने को नर्स होने के दायित्व के प्रति इस कदर समर्पित कर देती है कि मानसिक संतुलन खो बैठती है|

भारत जैसे विकासशील देश में तो चिकित्सक वाकई ईश्वर का ही एक रूप लगता है| लोगों की भावनाएं किस तरह चिकित्सक से जुडी रहती है इसके लिए कुछ वर्ष पूर्व प्रदर्शित हुयी हिंदी फिल्म- मुन्नाभाई एम्.बी.बी.एस, याद की जा सकती है| एक महाबली, पर सह्रदय गुंडे की भावनाओं से जनता की भावनाओं का मेल ज्यादा गहरे स्तर पर होता है न कि एक कठोर ह्रदय विशेषज्ञ डॉक्टर के अनुशासन से| धोखे से मेडिकल कालेज में प्रवेश लेकर पढ़ रहे गुंडे के वचन और दयालू कर्म जनता के अंतर्मन को भिगो देते हैं और बहुत पढ़ा लिखा, बहुत बड़ा डॉक्टर जो मेडिकल कालेज का प्रिंसिपल भी है खलनायक लगने लगता है क्योंकि उसके पास भावना नाम के चीज है ही नहीं| रोगी इंसान है ही नहीं उसके लिए|

मनुष्य जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह चिकित्सा के क्षेत्र में भी अच्छे और बुरे दोनों किस्म के व्यक्ति मिलते हैं पर मनुष्य की चिकित्सक पर निर्भरता कुछ इस कदर गहरी है कि चिकित्सा के क्षेत्र में हम सिर्फ और सिर्फ अच्छे मनुष्यों को ही देखना चाहते हैं| प्रेमचंद की कहानी “मंत्र” का डा. चड्ढा, घमंडी और रोगी के प्रति असंवेदनशीलता से भरा हुआ होने के कारण एक खलनायक है और जब मन्त्रों से सर्पदंश का इलाज करने वाला, डा. चड्ढा की असंवेदनशीलता और दुर्व्यवहार का शिकार होकर अपने इकलौते पुत्र को खोने वाला, बूढ़ा भगत, डा. चड्ढा के पुत्र को मौत के मुँह से निकाल लाता है और डा. चड्ढा भोर की हल्की रोशनी में बूढ़े भगत को पहचान कर शर्मिन्दा होते हैं तो जीवन में केवल अच्छे चिकित्सकों से ही मिलने की आस लगाए पाठक ही नहीं विजेता महसूस करते बल्कि पूरी मानवता जीतती हुयी प्रतीत होती है|

जीवन के अन्य क्षेत्रों की भांति भारत में चिकित्सा के क्षेत्र में भी ईमानदारी और मूल्यों का बहुत बड़ी मात्रा में ह्रास हुआ है| ऐसे ऐसे किस्से मिल जाते हैं पढ़ने-देखने को जहां पैसे के लिए चिकित्सिक ने अपने व्यवसाय में उतरने से पहले ली गयी कसम को तो भुलाया ही मानवता को भी भुला दिया और अपनी आँखों के सामने मरीज को मर जाने दिया पर उसका इलाज करना शुरू न किया क्योंकि मरीज के परिवार वाले उसकी फीस भरने में असमर्थ थे| ऐसे भी मामले प्रकाश में आए हैं जहां चिकित्सिक मरीज के शरीर से अंग निकाल लिए हैं किसी और धनी मरीज को जीवनदान देने के लिए और गरीब मरीज गरीबी का शाप भोगने को विवश रहकर विकलांग जीवन जीने को भी विवश हो जाता है|

हालत ऐसी हो गयी है कि बीस-बीस साल के अनुभव के बाद भी चिकित्सक कहते पाए जा सकते हैं कि उन्होंने नई “दुकान” खोली है|

दुकान!

क्लीनिक और डिस्पेंसरी अब अनुभवी चिकित्सकों तक के लिए भी दुकान बन गये हैं|

साहित्य ने मरीजों की तरफ से लिखी गयी सामग्री प्रस्तुत की है, अगर साहित्यकार खुद मरीज बन गया है तो उसने अपने व्यक्तिगत अनुभव से अच्छा साहित्य दुनिया को दिया है| रशियन

Aleksandr Solzhenitsyn ने Cancer Ward जैसे कालजयी उपन्यास की भेंट दुनिया को दी| लेखकों ने दूर से देखे या पूर्णतया कल्पित चिकित्सक चरित्रों की रचना भी की है और उनमें से बहुत से विश्वसनीय भी लगते हैं| पर तब भी उन्होंने चरित्र के उन्ही भागों का वर्णन किया है जो उनके व्यक्तिगत जीवन से सम्बंधित है और उनके व्यवसाय से सतही सामग्री ही सामने आती रही है| ऐसे में ऐसा तो लगता ही है कि अगर किसी चिकित्सक में लेखकीय गुण भी हों तो उसका लेखन बेहद विश्वसनीय तरीके से इस क्षेत्र का गहराई से वर्णन कर पायेगा|

डा. भवान महाजन की स्व:अर्जित अनुभवों से सम्पन्न मराठी पुस्तक – मैत्र-जिवाचे, उस ओर एक कदम है|

अशोक बिंदल, जो अपनी तरह के एक अलग ही कला -दीवाने, कवि एवं लेखक हैं, ने मराठी मूल की पुस्तक को हिंदी में इस तरह प्रस्तुत किया है कि “अंतस के परिजन” कहीं से भी अनुवादित किताब होने का आभास नहीं देती|

मरीज, उनके नाते-रिश्तेदार, चिकित्सक का त्रिकोण रोगी और चिकित्सा के हर मामले से सम्बंधित पाया जाता है और “अंतस के परिजनतीनों प्रकार के चरित्रों को पाठक के सम्मुख लाती है|

एक उम्र होती है जब पाठक हर किस्म की पुस्तक पढ़ने के लिए लालायित रहता है क्योंकि उसमें नये से नया पढ़ने की भूख होती है और उतना पढ़ने की ऊर्जा और समय भी| उम्र के साथ पाठक चुनींदा साहित्य ही पढ़ने लग जाते हैं क्योंकि समय अन्य कामों में भी लगने लगता है, ऊर्जा में कमतरी होने लगती है| ऐसे में जब तक कोई बहुत ही किसी पुस्तक की चर्चा न करे, ऐसा संदेह रहता है कि हर पाठक हर किस्म की पुस्तक अपने आप पढ़ ही लेगा|

“अंतस के परिजन की चर्चा किसी तक न पहुंचे तो ऐसा नहीं कि पाठक दरिद्र रह जाएगा पर अगर वह इसे पढ़ ले तो जीवन में सवेदनशीलता के थोड़ा और नजदीक आएगा|

हरेक व्यक्ति कभी न कभी या तो स्वयं बीमार पड़ता है या किसी नजदीकी व्यक्ति की तीमारदारी करता है और इस नाते उसका पाला चिकित्सक से पड़ता ही पड़ता है और लगभग हरेक व्यक्ति को चिकित्सक से मुठभेड़ का कोई न कोई अनुभव जरुर ही होता है| अब यह अनुभव खट्टा भी हो सकता है, मीठा भी और कड़वा भी|

“अंतस के परिजन सब तरह के अनुभवों को समेटती है|

ये डा. भवान महाजन के चिकित्सीय जीवन के संस्मरण हैं जहां देहात के इलाकों में वे भिन्न-भिन्न किस्म के मरीजों से मिले, उनके नाते-रिश्तेदारों से मिले अलग अलग किस्म के रोगों से सीमित साधनों के बावजूद जूझे|

एक सरल, और सहज भाषा में अशोक बिंदल ने डा. महाजन के संस्मरण हिंदी में प्रस्तुत किये हैं| डा. महाजन ने न केवल मोती-माणिक सरीखे मरीजों का वर्णन किया है जिनसे मिलकर कोई भी अंदर से अच्छा महसूस करेगा बल्कि ऐसे मरीजों और उनके रिश्तेदारों का भी वर्णन किया है जो किसी भी चिकित्सक को भलमनसाहत का रास्ता छोड़ देने पर विवश कर दें| ऐसे चिकित्सक भी इस पुस्तक में हैं जो चिकित्सा के क्षेत्र की दैवीय छवि को दीमक की तरह से नष्ट कर रहे हैं और जो इस बात का लिहाज भी नहीं करते कि उनका मरीज उनके ही हमपेशा चिकित्सक का करीबी है| वे प्रेमचंद द्वारा रचित डा चड्ढा के आधुनिक अवतार ही लगते हैं, जिनके लिए उनके सुख और ऐश्वर्य मरीज के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाते हैं|

पुस्तक में शामिल संस्मरण पाठक को अंदर तक छू जाते हैं|

ऐसी पुस्तक को कम से कम छोटे परदे पर एक धारावाहिक के रूप में जरुर अवतरित होना चाहिए|

पुस्तक के बारे में अधिक जानकारी यहाँ प्राप्त की जा सकती है|

एक संस्मरण भोर को यहाँ पढ़ा जा सकता है|

अंतस के परिजन” के बारे में कुछ लेखों एवं कवियों के वचन|

गुलज़ार लिखते हैं –

अशोक बिन्दल ने कमाल किया। पढ़ कर ये नहीं लगता कि ये किसी और का अनुभव है जो वो अपनी ज़बान में बता रहे हैं।

विश्वनाथ सचदेव कहते हैं |

अनुवाद सृजन से कम महत्वपूर्ण और कम मुश्किल नहीं होता | पुस्तक पढ़कर लगता है जैसे अशोक बिंदल ने काम बड़ी आसानी से किया है | मराठी में इस पुस्तक की काफी प्रशंसा हुई है | मुझे विश्वास है हिंदी-जगत में ही वैसा ही स्नेह सम्मान मिलेगा…

बालकवि बैरागी लिखते हैं|

‘अंतस के परिजन’ मैं पढ़ गया | अच्छे संस्मरण यदि ऐसी सलिल भाषा में मिल जाएं तो मन भीग ही जाता है | डा. श्री भवान महाजन ने अशोक बिंदल के माध्यम से प्रभावित किया…

कवि नईम लिखते हैं|

अंतस के कई परिजनों ने रुला दिया | उनसे एक उनसियत हो गई जैसी डा. भवान महाजन को उनसे थी | लेखक की आत्मीयता के ये पात्र हैं बल्कि लेखक इतना आत्मीय अंतस का नहीं होता, तो इन्हें पुनर्जीवित नहीं कर सकता था| कमोबेश उसी भावावेश में हिचकोले खाते हुए अशोक ने भावानुवाद किया है…..

…[राकेश]

सितम्बर 21, 2010

एक अंजान पाठक की दास्तान… (रफत आलम)

एक मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का, घर के हालात से बिल्कुल बेपरवाह, हरदम खेल के मैदान में चौके और छक्के उड़ने में लगा रहता था। एक दोस्त ने उसे इब्ने सफी की जासूसी पुस्तक पढ़ने को पकड़ा दी। फिर क्या था उसे तो जैसे चस्का सा लग गया, इब्ने सफी, कर्नल रंजीत, हामिद विनोद, वेदप्रकाश काम्बोज और जाने कैसे कैसे लेखकों के रहस्य–रोमांच से भरे उपन्यास पढ़ने का।

चवन्नी रोज के हिसाब से मोहल्ले की चालू पुस्तकों की दुकान से किताबें लाने का एक बेताब सा सिलसिला शुरू हो गया। खेल के मैदान में चौक-छक्के लगाने वाला लड़का अब रोज जासूसी किताबों के चौके-छ्क्के लगाने लगा।

एक दिन हाथ आ गयी गुलशन नंदा रचित किताब “झील के उस पार“। कलम के रोमांस का ऐसा जादू चढ़ा लड़के पर कि सम्मोहित सा होकर इब्ने सफी आदि को एक कोने में रखकर गुलशन नंदा और रानू वगैरहा के साथ चल दिया। किशोर उम्र में प्राकृतिक रूप से भी मन चंचलता की ओर स्वत: ही आकर्षित होने लगता है। वयस्कता के अंजान तिलस्मी सपने सुहाने लगने लगते हैं। लड़का अब शेव करने लगा था ओर कॉलेज में पहुच गया था।

स्कूल के समय पढ़ी कोर्स की किताबों में प्रेमचंद की कहानियाँ अब उसे बोर लगती थी पर बर्थ-डे पर पडोस में भोले बचपन की दोस्त ने गोदान गिफ्ट कर कहा था – पढ़ कर बताना कैसी लगी।

सो दिली फ़र्ज़ मानते हुए किताब पढ़ी गयी। पड़ोस वाली भोली लड़की को पढ़ कर क्या बताया गया उसकी अलग कहानी है। प्रेमचंद की किताब में लड़के ने जीवन की ज़ालिम और कड़वी वास्तविकता देखी जो वो आपने आसपास के माहौल में काफी समय से महसूस कर रहा  था पर समझ  नहीं पा  रहा था।

लड़का प्रेमचंद की डगर पर चलता हुआ शरतचंद्र तक जा पंहुचा। यानि शुद्ध साहित्य के चस्के में पड़ गया। चौके-छ्क्के मारने वाला  खिलाडी वैसे भी पढ़ने लिखने में सामान्य था दीवाना पाठक बनने से भी उसके अंक २-४ ही उधर उधर हुए। मगर समझ के कैनवास  पर उमराव जान से लेकर पारो तक ऐसे ऐसे विलक्षण रंग उभरने लगे कि अभिभूत होकर प्यासे हिरण सामान पुस्तकों की मरीचिका में वो भटकने लगा। मरीचिका इस लिए कि मध्यम वर्ग के लड़के को जेब खर्च २ रूपये मिलते ओर किताब २० – ४० रुपये  की आती थी। ऐसे  में पढ़ने हेतु किताब मिले कहाँ से? पर जहाँ प्यास होती है, पानी भी कहीं ना कहीं से मिल ही जाता है।

किसी दोस्त ने बातों बातों में बताया शनिवार के हाट बाज़ार में रद्दी किताबें बिकने आती हैं। बस फिर क्या था शनिवार को साइकिल दौड़ा कर हाट बाज़ार जा पंहुचा। चारों तरफ फैले पुराने कपड़ों, फर्नीचर, औजार, और खिलौनों आदि के ढ़ेरों के पास एक कोने में किताबों का फैला ढ़ेर भी मिल गया।

पुरानी रंग बिरंगी पत्रिकाओं में उलझी अंग्रेजी  भाषा  की पुस्तक “ऐ स्टोन फॉर डैनी फिशर“,  जिस पर एक अर्धनग्न सी लड़की के चित्र के नीचे  हेरोल्ड रोबिंस लिखा था, ने वयस्क होते दिमाग की यौवन ग्रंथियों को झिंझोड़ सा दिया। फिर वही किताब का जादू नए सिरे से सर चढ़ कर बोल रहा था।
पुस्तक हाथ में लेकर लड़का कंपकपाते होटों से बोला,” कितने… की है… यह किताब”?
अधेड कबाड़ी ने पुस्तक पर सरसरी निगाह डाली और बिना सर उठाये  ही कह दिया,” २० रूपए की”।
लड़के का दिल डूब  सा गया। बड़ी मुश्किल से दस रूपये माँ से मांग कर लाया  था और किताब बीस की। किताब वापस ढ़ेर पर छोड़ कर चलते चलते मरे से मन से बोला,” दस रुपए में दोगे”?
कबाड़ी ने कहा.”ला”।
पुस्तक लड़के के हाथ में थी। एक अजीब सी उत्तेजना से मन पखेरू फड़फड़ा रहा था। सो लड़का घर आते ही किताब पड़ने बैठ गया। कहाँ उसकी मातृभाषा हिंदी की फरफर और कहाँ यह अंग्रेजी का नया बवाल। अटक अटक कर गाड़ी चल रही थी। एक बार तो लड़के ने सोचा  छोड़ यार किस चक्कर में फँस गया? पर विचित्र से उन्माद ने लड़के से डिक्शनरी उठवा ली और उसके हाथ “ऐ स्टोन फॉर डैनी फिशर” के पन्ने उलटते चले गये।

शालीन भाषा की हिंदी पढ़े लड़के पर अंग्रेजी का यह नया खुलेपन वाला अंदाज़ पूरा हावी हो गया था। अब हेरोल्ड रोबिंस ओर उन जैसे लेखकों की किताबे नया चाव बन गयी थी। लड़के का ३ कमरों वाला छोटा सा घर था। जिसका छोटा सा स्टोर उसे कमरे के रूप में मिला था। उसका बिस्तर और पढ़ने की कुर्सी टेबल भी उस ज़रा से स्थान में बा-मुश्किल आती थी। यहाँ पुस्तकों हेतु अलमारी रखना तो  सपना सा था। स्टोर में सामान रखने की एक ही बारी थी। सो यह बारी ही लड़के की किताबें रखने का स्थान बन गयी। एक एक करके बारी  में किताबे जमा होने लगीं। हर सप्ताह एक दो किताब या पैसे की सुविधा अनुसार अधिक भी किताबें आती गयीं। 

हेरोल्ड रोबिंस के साथ साथ स्वत: ही तरह तरह की एक्शन, मिस्ट्री ओर हॉरर आदि की किताबों के ज़रिये  रोबर्ट लुडलुम से लेकर स्टीफन  किंग तक लड़के के नए  दोस्त बनते गये। युवक बनते लड़के का किताबों की तलाश में साप्ताहिक सफर जारी था।

कबाड़ी के ढेर में कई सदा-उदास से कवर और बिना तस्वीर के आवरण वाली किताबें भी पड़ी रहती थीं जो लड़के को आकर्षित नहीं करती थी।

एक बार एक पतली सी पुस्तक “द प्रोफेट” पड़ी देखी। हमारा वो लड़का, जो अब युवक  के नाम से जाना जायेगा, जाने क्यों किताब के आवरण के पीछे लिखी प्रशंसा से इम्प्रेस हो गया। वो उस पुस्तक को  भी ५ रूपये में उठा लाया। इस किताब से तो युवक पर नया ही नशा तारी हो गया।

द प्रोफेट” इक ही बार में पूरी पढ़ डाली। देर तक जाने क्या सोचता रहा ओर फिर नए सिरे से किताब खुल गयी। अब तो युवक की दुनिया ही बदल गई थी।

शेक्सपीयर, बर्नाड शॉ, काफ्का, बालज़ाक, तोल्स्तोय, सोल्ज़त्सिन, लाओत्से, से कीट्स, शेली और रूमी तक युवक के दिमाग में अस्तित्व दर्शन ओर चिंतन की गुत्थियाँ सुलझाने आने लगे।

हर सप्ताह हाट बाज़ार से किताबें आती गयीं और हमारे युवक की किताबों वाली बारी पूरी भर गयी। एक रविवार ४-५ किताबों को बिस्तर पर पडा देख युवक ने सोचा – नई किताबें रखने के लिए कुछ पुरानी पुस्तकें पैकेट में बिस्तर के नीचे रख दी जायें।

उसने किताबे बारी से निकाली पर यह क्या?
उसका तो सारा खज़ाना ही लुट गया था। बारी की पुस्तकों में नीचे से दीमक ने लग कर अधिकांश पुस्तकों को चाट लिया था।
युवक की आँखों के सामने अंधकार सा छा गया। अपने आप ही आँसू बहने लगे।
उसकी धुंधलाई आँखों के सामने पड़ी कटी मिटी पुस्तक “रुबाईयात-ए-उमरखय्याम” जैसे हँस कर नश्वरता के गीत सुना रही थी।
युवक को भी शायद उमरखय्याम की रुबाई का असली अर्थ समझ आ गया।
पुस्तकों की खाली बारी की ओर देख कर वो भी मुस्कारने लगा।

(रफत आलम)

जून 11, 2010

हिन्दी सिनेमा के अभिनेता : क्विज

[1] नायक के रुप में अपनी पहली ही फिल्म में इन्हे उत्कृष्ट अभिनय के लिये
राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया परन्तु इन्होने सत्तर के दशक के एक सुपर स्टार
की एक फिल्म में दो मिनट से भी कम समय का एक शराबी का रोल भी
किया था, बाद में ये भी सुपर स्टार रहे। ये कौन हैं? चाहें तो उपरोक्त्त
दोनों फिल्मों के नाम भी याद कर लें।

[2] इन्होने अधिकतर हास्य उत्पन्न करने वाले रोल्स ही किये परन्तु निजी जीवन
में ये हॉरर फिल्मों के दीवाने थे। इन्होने फिल्में बनायी भीं और निर्देशित भी
कीं, इन्होने एकाधिक शादियाँ कीं और कुछ फिल्मों में इन्होने अपनी पत्नी के
साथ भी काम किया। इन्होने एक ऐसी फिल्म में काम किया था जिसमें फिल्म
का नायक इन्हे जिस नाम से पुकारता था वह नाम बाद में इनका एक
निकनेम बन गया। बाद में एक भारतीय विश्व सुंदरी को लेकर इस नाम
के शीर्षक वाली एक फिल्म बनी।

[3] इन्होने लगभग पाँच साल की अवधि के अंदर ही एक ही अभिनेत्री के पति,
प्रेमी, पिता और ससुर का रोल अलग अलग फिल्मों में किया।

[4] इन अभिनेता ने अपनी पहली फिल्म में कुछ मिनटों की अवधि वाली भूमिका
निभाई। इस फिल्म की अभिनेत्री को अभिनय तो नहीं परन्तु एक दूसरे ही
क्षेत्र में किये कार्य के कारण अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का पुरस्कार मिला और और
अब ये और अभिनेता दोनों ही अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शख्सियत हैं।

[5] इन अभिनेता को एक अंतर्राष्ट्रीय फिल्म में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति वाले व्यक्ति की
भूमिका, ऑडिशन देने के बावजूद निभाने को नहीं मिली पर ड्रामा और फिल्म
स्कूल में ट्रेनिंग के समय से ही वे दिल्ली के रहने वाले एक प्रसिद्ध
ऐतिहासिक व्यक्ति का रोल करना चाहते थे और उन्हे वह रोल मिल ही गया
हालाँकि वह रोल एक प्रसिद्ध टीवी सीरियल में निभाने को मिला। बाद में एक
फिल्म में उन्हे वह रोल भी करने को मिल गया जो उन्हे अंतर्राष्ट्रीय फिल्म में
नहीं मिल पाया था।

[6] इन्होने और देव आनंद की एक फिल्म से शुरुआत करने वाले एक
अभिनेता ने एक ही शीर्षक और विषय वाली दो फिल्मों में एक जैसा चरित्र
निभाया। इन्होने सिर्फ एक ही फिल्म का निर्देशन किया और उस फिल्म को
अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी अभिनीत एक हिट फिल्म के लिये एक
प्रेरणा स्त्रोत माना जा सकता है।

[7] ये अकेले ऐसे भारतीय अभिनेता रहे जिन्हे अंतर्राष्ट्रीय स्तर का एक पुरस्कार
एक रोचक श्रेणी में दिया गया। वैसे इन्होने एक बार ऐसा काम भी किया जो
दिवंगत अमजद खान द्वारा किये गये एक प्रसिद्ध काम से सम्बंध रखता था।

[8] इनमें और हॉलीवुड के एक एक्शन फिल्म स्टार, जिनकी लिखी एक फिल्म
का ऑस्कर में नामांकन हुआ था, में एक समानता है। इनके माता पिता,
मामा और जीजा भी फिल्मों से सम्बंधित रहे हैं।

[9] इन अभिनेता के फिल्मी जीवन में और हॉलीवुड के स्टार्स मार्लन ब्रांडो,
डस्टिन हॉफमैन के फिल्मी जीवन में कुछ एक जैसा है।

[10] इन्होने भारत के एक जाने माने अभिनेता के साथ सिर्फ दो ही फिल्मों में
काम किया। पहली फिल्म में वे प्रसिद्ध अभिनेता के भाई बने और दूसरी में
दोस्त और दुश्मन दोनों बने। इन्होने मुंशी प्रेमचंद की कहानी पर बनी एक
फिल्म में भी काम किया।

[11] सालों एक मशहूर अभिनेता रहने के बाद इन्होने अपने द्वारा निर्देशित पहली
फिल्म में भारत की एक दुश्मन देश के साथ लड़ाई को पृष्ठभूमि में रखा और
उसमें नायक की भूमिका भी निभाई। एक निर्माता और निर्देशक के रुप में ये
समसामायिक विषयों पर फिल्में बनाने के लिये प्रसिद्ध रहे। अपने द्वारा
निर्मित दो फिल्मों में इन्होने गेरुये वस्त्र धारण किये।

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