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सितम्बर 3, 2011

नारी! तुम कब, कैसे माता से हत्यारिन बन गयीं?


रोज ही बस्ती में
अनगिनत बेकफन अर्थियाँ
गंदे नालों की राहों से
कीचड़ में विसर्जित कर दी जाती हैं।

प्याज़-लहसुन से भी परहेज़ करने वाली माएँ,
चाक़ू से छिलवा कर
मरवा देती हैं बेटियाँ
अपनी ही गोद में,
आखिर क्या पाप हुआ था
जो ये अबोध धड़कने कत्ल हुईं?

किसी मजबूरी का बहाना न बनाना,
मजबूर तो वेश्यांए होती हैं!
किटी पार्टियों में बहलने की हदों के आगे तक
आज़ाद है आज की नारी|

हकीकत तो ये है
बतौर फेशन हत्यारिन बनी हो तुम
मासूमों को गर्भ में मारने वाली माताओं
क्या तुमने भविष्य के गर्भ में झाँका है?

अरी! निर्दयी ह्रदयहीनो
वर्तमान से ही सबक लेती
तुमने देखा नही क्या
देश की सर्वोच्च कुर्सी पर
बैठी है एक महिला
कल तुम्हारी जन्मी भी तो
ऐसी हो सकती थी!

(रफत आलम)

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