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अप्रैल 30, 2014

दाने दाने पर कहाँ लिखा है जरूरतमंद का नाम?

हैम्बुर्ग पहुंचकर हम एक रेस्त्रां के अंदर गये| अंदर हमने देखा कि ज्यादातर मेजें खाली थीं| एक मेज पर एक युवा जोड़ा खाना खा रहा था| हमने ध्यान दिया कि उनके सामने मेज पर केवल दो तश्तरियाँ और दो ग्लास बीयर के रखे थे|
जर्मनी एक विकसित और औधोगिक देश है| ऐसा अनुमान सहज ही प्रतीत होता है कि ऐसे विकसित देश के निवासी आरामदायक और ऐश्वर्य से भरपूर ज़िंदगी जीते होंगे|

युवा जोड़े को इतना सादा खाना खाते देख लगा कि इस दावत में रोमांटिक भाव कहाँ हैं और निश्चित ही यह युवती इस कंजूस लड़के को जल्द ही अलविदा कह देगी|

एक अन्य कोने की मेज पर कुछ वृद्धाएं बैठी थीं| जब भी वेटर कोई डिश लेकर आता वह उन सबमें उसे बांट देता और महिलायें अपनी प्लेटों में परोसे गये खाने को पूरी तरह से खाकर समाप्त कर देती थीं|

हम लोगों को बहुत भूख लगी थी| स्थानीय साथी ने हम लोगों के लिए बहुत सा खाना आर्डर कर दिया| जब हमने मेज छोड़ी तो हमारे मेज पर कम से कम एक तिहाई से ज्यादा खाना बचा हुआ था|

जब हम रेस्त्रां से निकल रहे थे| एक वृद्धा ने हमसे अंग्रेजी में बात शुरू कर दी| हमें महसूस हुआ कि उन महिलाओं को हमारा मेज पर इतना सारा खाना छोड़ना अच्छा नहीं लगा|

“हमने खाने का पैसा दिया है और यह आप लोगों का मसला नहीं है कि हम कितना खाते हैं या कितना प्लेट में छोड़ देते हैं”| साथी ने थोड़े गुस्से से महिला को जवाब दिया|

महिलायें क्रोधित हो गयीं| उनमें से एक ने तुरंत पर्स से फोन निकाल कर किसी को फोन किया और कुछ ही देर में वर्दी पहने हुए सोशल सिक्योरिटी संस्था का प्रतिनिधि वहाँ हमारे सामने खड़ा था|
मामले को जानकर उसने हम पर 50 यूरो का फैन लगा दिया| हम चुप रहे|
अधिकारी ने गंभीर आवाज में हमें चेताया,” उतना ही आर्डर करो जितना आप लोग खा सकते हो| धन अवश्य ही आपका अपना है पर संसाधन पूरे देश और समाज की सामूहिक संपत्ति हैं| दुनिया में बहुत हैं जिनके पास साधन नहीं हैं और आपको कोई हक नहीं है संसाधनों को नष्ट करने का”|

धनी जर्मनी के लोगों के विचारों ने हमें शर्मिंदगी में धकेल दिया| हमें वाकई गहरे में विचार करने की जरुरत है| हमारा देश एक गरीब देश है| संसाधनों की कमी है|

हम भारी मात्रा में खाना बेकार करते हैं| दावतों में भी और रोजमर्रा के स्तर पर व्यक्तिगत जीवन में भी|

[जर्मनी में एक व्यक्ति के साथ हुये हादसे की कथा]

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