Posts tagged ‘Pitaa’

जून 30, 2011

पिता की चाह

मेरे बेटे,
किलकारियाँ मारता हुआ तुम्हारा बचपन
जवान हो
मुस्कुराए
हर नज़र तुम्हारी तरफ हसरत से उठे
बढ़ के आये,
और कहे –
तुम हो
जग के रचियता
की अद्वितीय कृति।

तुम्हे देखकर
तुम्हारे कंधे छूकर
मैं कहूँ –
शाबास… बेटे… शाबास।

तुम मेरी आँखों में देखो
और कहो –
मैं आपका बेटा हूँ,
अपने आपको उठाऊँगा मैं
बहुत ऊँचे, बहुत ऊँचे
अपने कर्म से
सच्चे धर्म से
मेरे प्रकाश में
आपके आशीर्वचन हैं।

तुम ऐसा कहोगे न!
मुझे कितनी खुशी होगी!

{कृष्ण बिहारी}

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जून 21, 2011

पिता की पाती पुत्र के नाम

अनचाही दूरियों का
अनचाहा दायरा
क्या किसी दिन हटेगा,
मिटेगा?
मैं तुम्हें आँखों से छूना और
हाथों से देखना चाहता हूँ,
मुझे पता है
तुम्हारे पास सब कुछ है,
सब कुछ …यानी कि माँ है
तुम्हे नहीं पता है कि
मेरे पास भी सब कुछ है
सिर्फ तुम नहीं हो
तुम्हारा मेरे पास न होना
किस कंगाली से कम है!

काश!
वह दिन आता
मेरी बाहों में मेरा आकाश होता
यानि कि तुम होते
और,
तुम्हारे कंधों पर मेरे आँसू
अविराम गिरते,
अजस्त्र…निर्भय…
जानता हूँ कि
प्रायश्चित से ही तो
सब कुछ सामान्य नहीं हो जाता
स्वीकारोक्ति भर से ही तो
सब कुछ मान्य नहीं हो जाता
फिर भी मुझे लगता है कि-
मैं अपने अधूरेपन को पाट गया हूँ
और,
स्वयं को सही ढ़ंग से बाँट गया हूँ।

मेरी आँखों में इंतजार के
दीप जल रहे हैं
मेरे सपने
अगन की मीठी आँच में पल रहे हैं
तुम इसमें ईँधन की ज्योति
जलाये रखना
मैं तुम्हे अवश्य मिलूंगा
एक सही समय पर।

{कृष्ण बिहारी}

जून 20, 2011

पिता तुम्हे याद करते हुये

हे पिता!
कितने वर्ष हो गये
तुम्हे इसी तरह कभी कभी याद करते हुये
जन्म से मृत्यु तक
तुम्हारा सघर्ष
सुना-जाना और देखा मैंने
अपराजेय काल से भी तो
खूब लड़े तुम,
उस एक पल के सिवा
कुछ भी तो नहीं झुका पाया तुम्हे
चाहा मैंने भी तो कितना
तुम्हे झुकाना
पराजित करना
पीढ़ियों के संघर्ष में
आपसी रण में
मगर समान ध्रुव थे हम
एक-दूसरे को दूर भगाने में ही
लगे रहे ताउम्र
पास आने की हर कोशिश में
दूर जाते रहे
और
अपनी असफलता को
विजय का सोपान समझ
मुस्कराते रहे हम
हार मानना
हमारे स्वभावों में नहीं
हार जाना
हमारी किस्मत में था
पर-
मैं तुम्हारा पुत्र
तुम्हारी तरह ही जिद्दी,
मैं समर से जूझूंगा
भले ही मारा जाऊँ अभिमन्यु की तरह
आशीर्वाद, अब तो दो
“वत्स, विजयी भवः”
मेरे लिये ईश्वर भी तुम
और देवता भी तुम।

हे पिता!
तुम्हारे सिवा
और किसकी ओर देखूँ मैं
संघर्ष के क्षणों में
तुम बहुत याद आते हो मुझे
कभी-कभी तो बहुत ज्यादा
जिस वक्त्त
लड़ रहा होता हूँ
मैं खुद से…

{कृष्ण बिहारी}

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