Posts tagged ‘Peeda’

सितम्बर 1, 2016

कील कहाँ से निकल कर चुभ जाती है? (रघुवीर सहाय)

Raghuvir Sahayयह क्या है जो इस जूते में गड़ता है
यह कील कहाँ से रोज़ निकल आती है
इस दु:ख को रोज़ समझना क्यों पड़ता है?

हम सहते हैं इसलिए कि हम सच्चे हैं
हम जो करते हैं वह ले जाते हैं वे
वे झूठे हैं लेकिन सबसे अच्छे हैं

पर नहीं, हमें भी राह दीख पड़ती है
चलने की पीड़ा कम होती जाती है
जैसे-जैसे वह कील और गड़ती है

हमको तो अपने हक सब मिलने चाहिए
हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन
कम से कम वाली बात न हमसे कहिए
(रघुवीर सहाय)

अप्रैल 5, 2014

क्रूरता…(कुमार अंबुज)

धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगा
प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी
झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा
क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा
एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग
पराजित न होने के लिए नहीं
अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे

तब आएगी क्रूरता
पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में
फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
निरर्थक हो जाएगा विलाप
दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आँसू
पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा

तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को
फिर वह चेहरे पर भी दिखेगी
लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी
सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे
सब अपनी-अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता
और सभी में गौरव भाव होगा
वह संस्कृति की तरह आएगी
उसका कोई विरोधी न होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी कि किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो

वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी
और सोख लेगी हमारी सारी करुणा
हमारा सारा ऋंगार

यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना।

(कुमार अंबुज)

नवम्बर 21, 2013

एक टुकड़ा सच

कल नहीं होंगे विषादvon-001

जब हम-तुम याद करेंगे

कि-

जीवन जितना भी देता है

सहेजने- संजोने को होता है

सखे, पीड़ा का सत्व

सुखकर होगा अवश्य ही|

कल,

जब हम-तुम संधान कर चुकेंगे

कि –

होती है एक छोटी सी मुलाक़ात भी,

सम्पूर्ण

नहीं होता है सब कुछ बेमानी

मौन भी है बोलता कभी-कभी

प्रिये,

अमूल्य हैं पोरों पर अटके ये मोती

कल फिर मिलेंगे हम,

तो जानेंगे कि-

हमने जिया है

एक टुकड़ा सच

साथ-साथ

Yugalsign1

मार्च 21, 2013

तब तुम मुझको याद करोगे…

अभी तुम्हारा ध्यान कहीं है

पीड़ा का अनुमान नहीं है

जिस दिन ठोकर लग जायेगी

उस दिन तुम फ़रियाद करोगे

तब तुम मुझको याद करोगे…

बालू की दीवार खड़ा कर

ताशों के तुम महल बना कर

अपने दिल की इस बस्ती को

जिस दिन तुम खुद बर्बाद करोगे

तब तुम मुझको याद करोगे…

मैं संयम का नहीं पुजारी

लंगडी नैतिकता लाचारी

मुझ बैरागी का दुनिया में

अनुरागी जब नाम धरोगे

तब तुम मुझको याद करोगे…

देखो तुम्हे बता देता हूँ

मैं सबको अपना लेता हूँ

सच कहता हूँ रुक न सकूंगा

जिस दिन लंबी सांस भरोगे

तब तुम मुझको याद करोगे…

सीता राम रटा डाला है

पंखों पर भी ताला जड़ा है

पिंजरे के पंछी को आखिर

एक दिन तो आज़ाद करोगे

तब तुम मुझको याद करोगे…

{कृष्ण बिहारी}

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