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जुलाई 25, 2017

पथ-हीन

कौन-सा पथ है?

मार्ग में आकुल – अधीरातुर बटोही यों पुकारा :

कौन-सा पथ है?

‘महाजन जिस ओर जाएँ’- शास्त्र हुंकारा

‘अंतरात्मा ले चले जिस ओर ‘ – बोला न्याय पण्डित

‘साथ आओ सर्व-साधारण जनों के’ – क्रान्ति वाणी|

पर महाजन-मार्ग-गम्नोचित न संबल है, न रथ है,

अंतरात्मा अनिश्चय – संशय-ग्रसित,

क्रान्ति-गति-अनुसरण-योग्य है न पद-सामर्थ्य|

कौन-सा पथ है?

मार्ग में आकुल-अधीरातुर बटोही यों पुकारा :

कौन सा पथ है?

 

(भारतभूषण अग्रवाल)

फ़रवरी 22, 2017

समर शेष है … रामधारी सिंह दिनकर

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो ,
किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो?
किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से,
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?

कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान ।

फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले !
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!
सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है,
दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है ।

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,
ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार ।

वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है
माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज
सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में

समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा
और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा

समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा
जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा
धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं

कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे
अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे

समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो
पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे
समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे

समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर

समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं
गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है

समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल

तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना
सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना
बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर औ’ मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

नवम्बर 30, 2014

अरी ओ करुणा प्रभामय…अज्ञेय

जियो उस प्यार में जो मैंने तुम्हें दिया हैagyeya
उस दुख में नही जिसे बेझिझक मैने पिया है।
उस गान में जियो जो मैंने तुम्हें सुनाया है,
उस आह में नही जिसे मैंने तुमसे छिपाया है।

उस द्वार से गुजरो जो मैंने तुम्हारे लिए खोला है
उस अंधकार से नहीं जिसकी गहराई को
बार बार मैंने तुम्हारी रक्षा की भावना से टटोला है।

वह छादन तुम्हारा घर हो
जिसे मैं असीसों से बुनता हूँ, बुनूँगा,
वे काँटेगोखतो मेरे हैं
जिन्हें मैं राह से चुनता हूँ, चुनूँगा।

वह पथ तुम्हारा हो
जिसे मैं तुम्हारे हित बनाता हूँ, बनाता रहूँगा,
मैं जो रोड़ा हूँ, उसे हथौड़े से तोड़तोड़
मैं जो कारीगर हूँ, करीने से
सँवारता सजाता हूँ, सजाता रहूँगा।

सागर के किनारे तक
तुम्हें पहुँचाने का
उदार उद्यम मेरा होः
फिर वहॉ जो लहर हो, तारा हो,
सोनतरी हो, अरुण सवेरा हो,
वह सब, ओ मेरे वर्ग !
तुम्हारा हो, तुम्हारा हो, तुम्हारा हो।

(अज्ञेय)

जनवरी 11, 2014

ठूंठ जीवन

पतित है वह RKap-001

या कि चेतना उसकी

है सुप्त प्राय:

दिवस के प्रारम्भ से

अवसान तक

धुंधलका सा है

– सोच में भी

– कर्म में भी

-देह में भी

तिरती घटिकाएं

प्रात: की अरुनोदायी आभा

या कि तिमिर के उत्थान की बेला

शून्यता की चादर से हैं लिपटीं

सूनी आखों से तकती है

समय के रथ की ओर!

अल्हड यौवन की खिलखिलाहट

गोरे तन की झिलमिलाहट

युगल सामीप्य की उष्णता

युवा मानों की तरंगित उर्जस्विता

को-

सराहकर भी अनमना सा,

अन्यमनस्क शुतुरमुर्ग!

पहिये की रफ़्तार से

संचालित जीवन

जैसे कि हो पहिये ही का एक बिन्दु

एक वृत्ताकार पथ पर

अनवरत गतिमान

पर दिशाहीन!

– कोई इच्छा नहीं

– कोई संकल्प नहीं-कोई माया नहीं

-कोई आलोड़न नहीं

बस एक मशीन भर!

एहसास है कचोटता

जीवन चल तो रहा है

पर कहीं बुझ रही है आग

धीरे-धीरे, मर-मर कर

आत्मा की चमक

होती जाती है मंद

क्षण-प्रतिक्षण!

Yugalsign1

दिसम्बर 13, 2013

तुम्हारी पीड़ा

morgan-001तुम्हारी पीड़ा

आसुंओं को अंतर में पी लेने की विवशता है

कायरता का श्राप पाए पुरुष में

अनिश्चय के भंवर में डूबते नर में,

कोमल ह्रदय के स्वामी मानव में

अपनी सार्थकता तलाशने की पीड़ा है|

शब्दों को छल के लिए उगालना

योग-संयोगों से अर्थ बदलना

आत्मसंतुष्टि हेतु ओढें कर्त्तव्य

तुम्हारी पीड़ा

गहनतम भाव समझ कर अंजान बनने की पीड़ा है|

क्या देता है जगत जीव को

क्या लेता है जगत जीव से

क्या सार्थकता, क्या श्रेष्ठता

आखिर क्या है, पराकाष्ठा?

तुम्हारी पीड़ा

चादर के चारों कोने तलाश न कर पानी की पीड़ा है|

सहज सजीली राह छोड़कर

ऊंचे – नीचे,

दुर्गम पथ की चोटी को तकना

तकना, उतरना, चढ़ना सबकी भूलभुलैया

तुम्हारी पीड़ा,

भीड़ में गुम होने के डर की

पीड़ा है!

राग-मोह-शान्ति-खुशी-द्वेष-दर्प

क्रोध-स्नेह-प्रलाप-जीवट-विवशता

चक्रव्यूह पर चक्रव्यूह से घिरे हुए

तुम्हारी पीड़ा

द्वार न तोड़ पाने की

पीड़ा है!

Yugalsign1

दिसम्बर 12, 2013

कब खुलेंगे रौशनदान?

कर्मगति पर अकर्मण्यताyadein-001

फिसलन की हरियाली-रपटीली राह

बंद कमरों में कैद

बुद्धि और चेतनता –

कोई तो राह होगी?

जहां पर दृष्टि ठहरे पार पथ के –

जहाँ पर त्वरित हो जीवन शक्ति

हो प्रकाशित किसी सार्थक संकल्प से

पर होगी कब मुक्ति मन की-

कब खुलेंगे बंद कमरों के रौशनदान?

Yugalsign1

सितम्बर 27, 2011

दूर और कुछ जाना है

साथ तुम्हारे ही चलकर के दूर और कुछ जाना है
पथ से है पहचान तुम्हारी पथ मेरा अंजाना है
चिर परिचित से मुझे लगे हो
शायद जन्मों साथ रहे हो
या फिर कोई और बात है
सुख-दुख जो तुम साथ सहे हो
मुझको तो ऐसा लगता है मन जाना-पहचाना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
मिलना और झगड़ना मिलकर
यह तो अपनी आम बात है
जीत मिली है हरदम तुमको
मुझको तो बस मिली मात है
सारी उम्र मुझे तो शायद हरदम तुम्हे मनाना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
जब-जब भी मिल जाते हो तुम
मन पर चाँद उतर आता है
दूर तुम्हारे होते ही पर
सुख जैसे सब छिन जाता है
बहुत रोकता हूँ मैं आँसू पर वह तो बाहर आना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
अपने पीछे था कल बचपन
आज द्वार पर आया यौवन
कल तक कोई रोक नहीं थी
आज लग गये मन पर बंधन
इनसे डरकर मेरे मन अब और नहीं घबराना है,
पथ से है पहचान तुम्हारी…
प्रेम हमारा दीया-बाती
या फिर है चातक-स्वाति
निस दिन इसको बढ़ना ही है
जैसे नदिया चलती जाती
हमको भी तो मंजिल अपनी आज नहीं कल पाना है
पथ से है पहचान तुम्हारी…

{कृष्ण बिहारी}

अगस्त 23, 2011

मैं कौन हूँ?

कौन हूँ?
कहाँ से आया हूँ?
कहाँ जाऊँगा?

माटी में धडकन फुंकने के दिन से
निरुत्तर हैं ये सवाल।

पथ, पथिक, गंतव्य,
सब द्रश्य पटल पर धुंधलाते हुए
उतर जाते हैं,
समय के अंधे कुएँ में,
जहाँ गूंज रही हैं प्रतिध्वनियाँ
गुजर गए पलों के अज्ञात परिणाम की।

अपने होने और न होने के बीच
अस्तित्व की अबूझ पहली को सुलझाने में
बुद्धि की समस्त अटकल
तर्क की कसौटी पर होकर गूंगी
तमाशा बने देखती है तमाशाई।

बिसात है किसकी?
क्या है खेल?

(रफत आलम)

अप्रैल 29, 2010

आज का सच

इच्छाओं में वृद्धि,

आमंत्रण है तनावों को,

क्योंकि चाही गयी हर इच्छा पूर्ण नहीं होती,

पर अगर यूँ कामनाओं, आकांक्षाओं को न बढाएं,

तो लगता है कि वक्त से कहीं पीछे चल रहे हैं!

कहीं औरों से पिछड़ न जाएँ, का डर
संतुष्ट नहीं रहने देता !

ऑंखें बंद कर झांक कर देखें अपने वजूद में,

तो दृढ़ बने रहने का संकल्प लेने में हिचक नहीं होती

पर दुनिया की भेड़्चाल देखकर चूर हो जाते हैं

अपने से किये वादे!

अपने ही अंतर्मन की कमजोरी कि

सोच बनती है यदि और लोग सुधरें

तो हम भी सीधे सीधे चलें!

पर क्यों मज़बूरी सहन करनी पड़ती है

सब तरह के रास्तों को अपनाने की?

शायद इसलिए कि

सफल व्यक्ति ही आजकल अच्छा भी माना जाता है

आज मानक सिर्फ मंजिल को पाना ही रह गया है

रास्ता चाहे जैसा भी हो !

…[राकेश]

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