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जनवरी 4, 2014

दिल का जख्मी परिंदा

हर रोज़ एक नया अरमानdev-001

दिल की कोख में जन्मता है..

और शाम होते होते अपने पंख फैलाकर

मंडराने लगता है

मेरे सर पे…

मेरे दिल पे…

मेरे जिस्म पे…

अपने पंजों में दबोच लेता है

ले उड़ चलता है मुझे बेबस करके

हर नए रोज़…

नए नए अरमानो के परिंदे उड़ते है…

फडफडाते हैं…

और हर रोज़

उनके पंजो से नीचे गिरा मैं

उनके टूटे पंखो में

खुद को तलाशता रहता हूँ|

Rajnish sign

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