Posts tagged ‘Pankh’

जनवरी 30, 2014

दूर नज़र के छुपा बैठा है

मन की भटकन Dk-001

खोज में किसकी

पता नहीं क्यूँ

चैन नहीं है

क्या पाना है

क्या खोया है

दूर नज़र के पार देश में

कोई छुप के जा बैठा है

कैसे उसको पास बुलाये

पंख लगा कोई कैसे जाए

मन के साथ में तन भी तो है

तन के साथ रहे न पल भर

मन बस उसके संग हो जाए

Rajnish sign

जनवरी 22, 2014

सर्दी के सफ़ेद बादल और रक्तिम लौ

सर्दी में बादल fireplace-001

पुकार लगाते तो हैं

पर बहुधा बिन पानी चले आते हैं

आते हैं

तो हर चीज को सफेदी से ढक देते हैं

चारों ओर ऐसा प्रतीत होता है

जैसे धुंध ने घर कर लिया हो

शामें धुंधला जाती हैं

मेरे कमरे में अंधियारा बढ़ जाता है

मैं गमन कर जाता हूँ

बीते काल में –

मोमबत्ती के हल्के प्रकाश से

भरे कमरे में!

जब आतिशदान में लकडियाँ जलती हैं

तो कभी भी बोल नहीं पाता हूँ

बस खो जाता हूँ

आग की लपटों से बनती बिगड़ती आकृतियों में|

तुम्हारी त्वचा का गोरापन ओढ़ने लगता है

हल्का लाल-गुलाबी रंग

जब तपन की गहन तरंगें

और लालसा घेर लेती है

तुम्हारा खूबसूरत चेहरा

दमकने लगता है ऐसे

जैसे तालाब से कमल खिलकर निकलना शुरू करने लगता है

जिस्मानी  उतार चढ़ाव

चमकने लगते हैं

और एक गर्म एहसास चारों ओर बहने लगता है

और तुम्हे और मुझे अपने पंखों में समेट लेता है

सब कुछ उड़ने लगता है

ऐसे जैसे सब कुछ बादल ही हो गया है

कमरे में निस्तारित होने लगता है

श्वेत धीरे-धीरे लाल में

ऐसा लगने लगता है

हमारे जिस्म पिघल जायेंगे

मोमबत्ती की लौ

मोटी हो और तेजी से जलने लगती है

बादल रक्तिम लाल हो जाते हैं

और मुझे प्रतीत होता है

कि सर्दी के बादल लाल तप्त हो गये हैं

और वास्तव में

वे बिन पानी के ही हैं!

Yugalsign1

जनवरी 4, 2014

दिल का जख्मी परिंदा

हर रोज़ एक नया अरमानdev-001

दिल की कोख में जन्मता है..

और शाम होते होते अपने पंख फैलाकर

मंडराने लगता है

मेरे सर पे…

मेरे दिल पे…

मेरे जिस्म पे…

अपने पंजों में दबोच लेता है

ले उड़ चलता है मुझे बेबस करके

हर नए रोज़…

नए नए अरमानो के परिंदे उड़ते है…

फडफडाते हैं…

और हर रोज़

उनके पंजो से नीचे गिरा मैं

उनके टूटे पंखो में

खुद को तलाशता रहता हूँ|

Rajnish sign

जुलाई 31, 2011

अंत का प्रारंभ (रघुवीर सहाय)

सुप्रसिद्ध कवि स्व. रघुवीर सहाय ने मनुष्य के जीवन की गति और दिशा और जीवन-दर्शन और जीवन के प्रति समझ में आने वाले उतार-चढ़ाव पर बहुत ही अच्छी कविता लिखी थी।

मधुर यौवन का मधुर अभिशाप मुझको मिल चुका था
फूल मुरझाया छिपा कांटा निकलकर चुभ चुका था
पुण्य की पहचान लेने, तोड़ बंधन वासना के
जब तुम्हारी शरण आ, सार्थक हुआ था जन्म मेरा
क्या समझकर कौन जाने, किया तुमने त्याग मेरा
अधम कहकर क्यों दिया इतना निठुर उपलंभ यह
अंत का प्रारंभ है यह!

जगत मुझको समझ बैठा था अडिग धर्मात्मा क्यों,
पाप यदि मैंने किये थे तो न मुझको ज्ञान था क्यों
आज चिंता ने प्रकृति के मुक्त्त पंखों को पकड़कर
नीड़ में मेरी उमंगों के किया अपना बसेरा
हो गया गृहहीन सहज प्रफुल्ल यौवन प्राण मेरा
खो गया वह हास्य अब अवशेष केवल दंभ है यह
अंत का प्रारंभ है यह!

है बरसता अनवरत बाहर विदूषित व्यंग्य जग का
और भीतर से उपेक्षा का तुम्हारा भाव झलका
अनगिनत हैं आपदायें कहाँ जाऊँ मैं अकेला
इस विमल मन को लिये जीवन हुआ है भार मेरा
बुझ गये सब दीप गृह के, काल रात्रि गहन बनी है
दीख पड़ता मृत्यु का केवल प्रकाश स्तंभ है यह
अंत का प्रारंभ है यह!

(रघुवीर सहाय)

मई 26, 2011

सुंदरता अभिशाप बना दी जाती है!

पँखों का महत्व
पिंजरे में कैद पंछी के लिए
अर्थहीन है,
उसकी घायल चोँच
आज़ादी का सपना लिए
लोहे के तारों से लड़ रही है।

दो पल बहलने का सामान है
पँखों के रुपहले रंग,
लहू टपकाती चोँचों का क्रंदन
मनमोहक लगता है
संवेदनहीन अहसास को।

सुंदरता सदा से अभिशाप है!

वरना क्यों हरम भरे जाते
कहाँ रनवासों में मुरझाते
बेमिसाल हुस्न?
अपने पौरुष का दंभ भरने वाले भूपति
नपुंसकों की टोलियों से
अश्गाहों की रखवाली क्यों करवाते?

आह!
किस तरह लुटे होंगे
मासूम अरमान!

आज भी रईसों की जामत
कमसिन सोंदर्य की
वही बाइज्ज़त खरीदार है,
कला का नाम देकर
नग्नता का नाच देख रही हैं
अय्याशों की मदमस्त आँखें।

ये उन्मुक्तता यदि प्रगति का पैमाना है
क्यों आत्महत्या कर लेती है
सफलतम मॉडल?

(रफत आलम)

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