Posts tagged ‘Panchi’

अक्टूबर 4, 2011

बेज़ुबान अहसास

यूँ ही भटकते हुए पता नहीं
क्यों लौटा था बरसों बाद
पार्क के उस कोने की ओर
जहाँ खुशबू भरे माहौल में
रंगीन सपने बुने जाते थे कभी।

लकड़ी की बेंच अब वहाँ नहीं है
जिस पर बिखरा करता था
अल्हड़ उमंगों का ताना-बाना।

चहचहाते पंछी कब के उड़ गये
प्रेमगीत गाकर
नीम के मोटे तने पर,
नादान उम्मीदों ने गोदे थे नामों
के पहले अक्षर
सूखा ठूठ बना खडा है वह।

आज भी हवाओं के दामन पर
मंज़र दर मंज़र धुंधलाई हुई कहानियाँ
फव्वारों की इंद्रधनुषी फुहारों में
बिखर रही हैं कतरा कतरा।

खामोशी की भाषा पढ़ने वाली आँखे
अब कहाँ उस अहसास के साथ
जिसके पास केवल बेज़ुबानी बची है।

(रफत आलम)

Advertisements
मई 26, 2011

सुंदरता अभिशाप बना दी जाती है!

पँखों का महत्व
पिंजरे में कैद पंछी के लिए
अर्थहीन है,
उसकी घायल चोँच
आज़ादी का सपना लिए
लोहे के तारों से लड़ रही है।

दो पल बहलने का सामान है
पँखों के रुपहले रंग,
लहू टपकाती चोँचों का क्रंदन
मनमोहक लगता है
संवेदनहीन अहसास को।

सुंदरता सदा से अभिशाप है!

वरना क्यों हरम भरे जाते
कहाँ रनवासों में मुरझाते
बेमिसाल हुस्न?
अपने पौरुष का दंभ भरने वाले भूपति
नपुंसकों की टोलियों से
अश्गाहों की रखवाली क्यों करवाते?

आह!
किस तरह लुटे होंगे
मासूम अरमान!

आज भी रईसों की जामत
कमसिन सोंदर्य की
वही बाइज्ज़त खरीदार है,
कला का नाम देकर
नग्नता का नाच देख रही हैं
अय्याशों की मदमस्त आँखें।

ये उन्मुक्तता यदि प्रगति का पैमाना है
क्यों आत्महत्या कर लेती है
सफलतम मॉडल?

(रफत आलम)

मई 6, 2011

पेड़ों पंछियों बिना सूना जीवन

कभी महसूस कर विकास का विनाश
भारी है धरती पर विकास का विनाश
कटे जंगल और मैला आसमान गवाह
जान पर है ज़हर विकास का विनाश
…..

न हवा की आमद न धूप मयस्सर
जीना कैसा जीना है कॉम्पलेक्सों में
सर छुपाने का ठिकाना कहिये वरना
खाक जिंदगी है कंक्रीट के दड़बों में
…..

कट गए पेड़ चौड़े हुए रास्ते बहुत
कागजों में पौधे भी रोपे गए बहुत
इस विकास यात्रा का मोल न पूछ
कल रुलाएंगे हरियाली के सपने बहुत
…..

पिंजरे में जो हैं उन्हें फिर भी मिल गया दाना
आज़ाद परिदों की भूख-प्यास को किसने जाना
लाखों घोंसले उजड़े हैं खेतों के शहर बनने तक
हर गिरते पेड़ के साथ छिना पंछी का ठिकाना
…..

सास की मौत के बाद बहु ने तिनके नोंच फेंके
कभी घर में हुआ करता था चिड़िया का घोंसला
नए कमरों के बनने में हुई थी आँगन की मौत
बूढ़े पेड़ के साथ मिट गया चिड़िया का घोंसला
…..

दो लीटर पानी और एक मिटटी का बरतन
एक मुट्ठी दाने में है सौ चिड़ियों का जीवन
लुप्त होते घरेलु परिंदों की दुआ भी लीजिए
मालिक बनाये रखे साहब आपका घर-आँगन

(रफत आलम)

Pic: Courtesy Kolkatabirds.com

%d bloggers like this: