Posts tagged ‘Pair’

मार्च 21, 2016

चलना हमारा काम है… (शिवमंगल सिंह सुमन)

ShivMangalSinghSumanचलना हमारा काम है
गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूँ दर दर खड़ा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पड़ा
जब तक न मंज़िल पा सकूँ,
तब तक मुझे न विराम है, चलना हमारा काम है।

 

कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया
कुछ बोझ अपना बँट गया
अच्छा हुआ, तुम मिल गईं
कुछ रास्ता ही कट गया
क्या राह में परिचय कहूँ, राही हमारा नाम है,
चलना हमारा काम है।

जीवन अपूर्ण लिए हुए
पाता कभी खोता कभी
आशा निराशा से घिरा,
हँसता कभी रोता कभी
गति-मति न हो अवरुद्ध, इसका ध्यान आठो याम है,
चलना हमारा काम है।

इस विशद विश्व-प्रहार में
किसको नहीं बहना पड़ा
सुख-दुख हमारी ही तरह,
किसको नहीं सहना पड़ा
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, मुझ पर विधाता वाम है,
चलना हमारा काम है।

मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा
प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ
रोड़ा अटकता ही रहा
निराशा क्यों मुझे? जीवन इसी का नाम है,
चलना हमारा काम है।

साथ में चलते रहे
कुछ बीच ही से फिर गए
गति न जीवन की रुकी
जो गिर गए सो गिर गए
रहे हर दम, उसीकी सफलता अभिराम है,
चलना हमारा काम है।

फकत यह जानता
जो मिट गया वह  गया
मूँदकर पलकें सहज
दो घूँट हँसकर पी गया
सुधा-मिश्रित गरल, वह साकिया का जाम है,
चलना हमारा काम है।

(शिवमंगल सिंह सुमन)

Advertisements
फ़रवरी 5, 2014

काई जम गई इंतज़ार की मुंडेर पे

इस सावन में बरसी आँखें

काई जमी इंतज़ार की मुंडेर पे

रखे हाथ कंपकपाते हैं

सब कुछ छूट जाने को जैसे

पैरों के नीचे से ज़मीन

बहुत गहरी खाई हो गयी

आँखे पता नहीं किसके लिए

आकाश ताकती हैं…

साँसों की आदमरफ्त रोक के

जिसको फुर्सत दी सजदे के लिए

उस खुदा को और बहुत

एक मेरी निगहबानी के सिवा…

मुझे कोई गिला नहीं…

शिकवा कमज़र्फी है…

हाथ कंपकपाते ज़रूर हैं

अभी मगर फिसले नहीं हैं…

Rajnish sign

नवम्बर 24, 2013

प्रथम प्रेम-मिलन

तब क्या होगाsilentlove-001

जब मुखातिब होंगे

हम तुम,

होंठो पे जमी बर्फ को

कैसे पार करेंगे लफ्ज़ तब?

बहुत समय से लफ्ज़ जमे हैं लब पे

तपते हुए लबों से अपने पिघला सको तो

पी सकोगे इन्हें

पर देह के कम्पन अनुनाद में

पुल टूट नहीं जायेंगे क्या?

थरथराते लब

क्या इतनी ही आसानी से

कह सकेंगे तब –

मुझे तुमसे प्यार है…

होगी दरकार आवाज़ की मौन को

या कि

मौन खुद ही आवाज़ बनेगा?

अगर सुनोगी मेरे सीने पे अपना सर  रखकर

तुम अपना नाम

मेरी आती जाती साँसों में

ये तो झंझावत में न

बदल जायेंगी क्या?

तुम्हारी मादक  देह गंध

रहने देगी ज़मीन पैरों तले क्या?

गिरने से कैसे बचाएंगी बाहें तुम्हारी?

क्या होगी उतनी ही तेज़ तुम्हारी सांसें भी?

उठाना गिरना वक्ष का कैसे सिमट पायेगा आँखों में?

हाथ में रखा हाथ कापेंगें नहीं क्या?

शिकायत

इनकार

इज़हार

मनुहार

रूठना

मनाना

लाज शर्म

मिलन विरह

पास दूर

सारे ये शब्द खो नहीं  जायेंगे क्या

आवेशित हृदयों के स्पंदन में?

प्रथम प्रेम मिलन में होगा क्या?

इसी सब में

घिरा बैठा रहता हूँ

दिन रात आजकल…

Rajnish sign

मई 4, 2013

सहयात्री के लिए शुभकामनाएँ

वह कामगार मैं कामगार

दोनों लौटते थे घर

कभी वह बैठती मैं खड़ा रहता

कभी मैं बैठता और वह खड़ी रहती थी|

कभी-कभी मैं देख लेता था

उसकी आँखों की ओर

और उतर जाती थी मेरी थकान,

कभी-कभी मैं खोल देता था

उसकी खिड़की का शीशा

उससे जो खुलता न था|

इससे ज्यादा मेरा उससे नाता न था

वह कामगार मैं कामगार

दोनों लौटते थे घर

बहुत दिनों तक वह नहीं दिखी

बहुत दिनों तक खिडकी के पास वाली

वह सीट खाली रही

बहुत दिनों तक याद आती रही उसकी आँखें

आज वह दिखी तो वह वह न थी

आज उसकी आँखें रोज से कुछ बड़ी थी

होंठ रोज से कुछ ज्यादा लाल

पैर रोज से कुछ ज्यादा खूबसूरत

सिर से पाँव तक

सुहाग-सिंदूर में लिपटी ओ स्त्री|

मैं तुम्हारा कोई नहीं था

पर तुम्हारे कुंआरे दिनों का साक्षी हूँ

भले ही ठसाठस भरी बस में

मैं तुम्हारे लिए थोड़ी-सी ही जगह बनाई है

अच्छे-बुरे रास्तों से गुजरा हूँ तुम्हारे साथ|

मैं तुम्हारा कोई नहीं

पर भले दिन रहें हमेशा तुम्हारे साथ

दुख तुम्हारे दरवाजे दस्तक न दे

तुम्हारा आदमी कभी राह न भूले,

और ठौर-कुठौर न चले

तुम्हारा घर और घडा कभी खाली न हो

तुम्हारे भोजन में कभी मक्खी न गिरे

तुम्हारी गृहस्थी में दूध न फटेअचार में फफूंद न पड़े

तुम्हारे फल कभी सड़े नहीं

तुम्हारे पाले पंछे पिंजरों में मरे नहीं

कोई भूखा-प्यासा न जाए तुम्हारे घर से

तुम पहचान लो भीख मांगते

रावण को और देवता को

वह दिन भी आये

जब तुम्हे इस बस का मोहताज न होना पड़े|

(राजेन्द्र उपाध्याय)

,

अप्रैल 30, 2013

प्रेम में आकाश

जब हम नहीं करते थे प्रेम

तब कुछ नहीं था हमारे पास

फटी हथेलियों

और थके पैरों से

हल लगाते थे हम

कोहरे में घाम को देते थे

आवाज

हम देखते थे आकाश

जिसका मतलब

आकाश के सिवाय

कुछ नहीं था हमारे लिए

जब हम प्रेम में गिरे

हम यादों में गिरे

जब यादों में बहे

प्रेम में डूब गये हम

घाटी से चलकर

हमारे घर तक आने वाली

पगडंडी था तब आकाश

हमारे खेतों में

आँख ले रहे होते अंकुर

आकाश में हम सुनते रहते

हवा की गूँज

जो हमारी सांस थी दरअसल

प्रेम में आकाश

आकाश जितना ही दूर था

उसे ज़रा सा उठाकर

हम अपने

मवेशियों को देते थे आवाज

उसकी आँखों में

हम देखते थे अपनी दुनिया

पहाड़ों को काटकर बने घर

जो हमारे थे

हम जो रहते थे एक गाँव में

प्रेम करते हुए|

(हेमंत कुकरेती)

मार्च 9, 2013

अद्भुत औरत

Maya Angelou की प्रसिद्द कविता Phenomenal Woman का हिन्दी अनुवाद

औरतें उत्सुक रहती हैं  

जानने को कि कहाँ छिपे हैं

मेरे चुम्बकीय व्यक्तित्व के रहस्य?

 

खूबसूरती की उनकी परिभाषा की समझ से

मैं किसी भी हिसाब से खूबसूरत नहीं हूँ

न ही मैं फैशन माडल्स जैसे आकार प्रकार वाली हूँ

लेकिन जब में उन्हें अपनी गोपनीयता बताना शुरू करती हूँ

तो वे सोचती हैं

मैं झूठ बोल रही हूँ |

 

मैं कहती हूँ

रहस्य मेरी बाहों के घेरे में है

मेरे नितंबों के फैलाव में है

लंबे-लंबे डग भरती मेरी चाल में है

मेरे होठों के घुमावों और कटावों में है|

  

मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत

हाँ वह हूँ मैं |

 

मैं प्रवेश करती हूँ किसी कक्ष में

जैसी मैं हूँ

अपने सारे वजूद को साथ लिए

और पुरुष,

वे सब खड़े हो जाते हैं

या अपने घुटनों के बल बैठ जाते हैं

वे मेरे इर्द गिर्द

ऐसे एकत्रित हो जाते हैं

जैसे छत्ते के करीब मधुमक्खियाँ

मैं कहती हूँ

रहस्य छिपा है

मेरी आँखों में बसी आग में

मेरे दांतों की चमक में

मेरी कमर की लचक में

मेरे पैरों के जोश में|

 

मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत

हाँ वह हूँ मैं |

 

पुरुष खुद अचरज करते हैं

कि वे क्या देखते हैं मुझमे

वे कोशिश तो बहुत करते हैं

पर कभी छू नहीं पाते

मेरे अंदुरनी रहस्य को

जब मैं उन्हें दिखाने की कोशिश करती हूँ

वे कहते हैं –

वे देख नहीं पा रहे अभी भी|

मैं कहती हूँ,

रहस्य तो छिपा है

मेरी रीढ़ की चाप में

मेरी मुस्कान के सूरज में

मेरे वक्षों के उठान में

मेरे मनोहरी सलीके में|

 

मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत

हाँ वह हूँ मैं |

 

अब तुम्हे समझ में आ गया होगा

क्यों मेरा सिर झुका हुआ नहीं रहता है

मैं शोर नहीं मचाती,

कूद-फांद नहीं मचाती

अपने को जाहिर करने के लिए

मुझे प्रयास नहीं करने पड़ते

पर जब तुम मुझे देखो

पास से जाते हुए

तुम्हारे अंदर मुझे लेकर गर्व का भाव जगना चाहिए|

 

मैं कहती हूँ,

मेरे चुम्बक का रहस्य  

छिपा है –

मेरे जूते की हील की खट-खट में

मेरे बालों की घुंघराली लटों में

मेरे हाथों की हथेलियों में

मेरी देखरेख की जरुरत में,

‘क्योंकि’ मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत,

हाँ वह हूँ मैं |

[Maya Angelou]

%d bloggers like this: